कामवाली खोज रहे हैं? शायद यहाँ कुछ मदद हो जाए

घरेलू नौकर

बंगलौर में रह रहीं कम्प्यूटर प्रोफेशनल प्रिया साथियम स्थानीय प्लेसमेंट एजेंसियों के दरवाजे पर घर के कामकाज और बच्चे की देखभाल के लिए नौकरानी की तलाश में तीन सालों तक दस्तक देती रहीं.

हर बार जब भी नौकरानी या आया रखी गई तो प्रिया को उस प्लेसमेंट एजेंसी को एक महीने का वेतन देना पड़ा. ज्यादातर नौकरानियाँ तीन महीने से ज्यादा टिक नहीं पाईं. प्रिया को लगता है कि ज्यादा कमाई करने के लिए प्लेसमेंट एजेंसी ने उन्हें काम छोड़ने के लिए मजबूर किया होगा.

(घरेलू नौकरों के लिए स्वास्थ्य बीमा)

बंगलौर के उपनगरीय इलाके में अपने फ्लैट में रहने वाली 32 वर्षीया श्रीमती साथियम कहती हैं, "मेरा बहुत ही खराब अनुभव रहा."

इस अनुभव के बाद प्रिया ने प्लेसमेंट एजेंसियों का सहारा छोड़ दिया और इंटरनेट की शरण ली और आखिरकार मैरी रेगिना के रूप में उन्हें एक ऐसी कामवाली मिल गई जो उनकी जरूरतों पर कुछ हद तक खरी उतरती थीं.

भारत के शहरी समाज में घरेलू कामकाज के लिए नौकर या कामवाली, जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा बन जाते हैं और इसका एक बहुत बड़ा बाजार है.

हाल ही में शुरू हुई कुछ तकनीकी कंपनियाँ इस बाजार में कदम जमाने की कोशिश कर रही हैं और उन्होंने इस कारोबार के तौर-तरीकों में बदलाव की पहल की है.

रजिस्ट्रेशन फ़ीस

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'बाबा जॉब सर्विसेज़' ऐसी ही एक ऑनलाइन कंपनी है जिसने प्रिया साथियम को रेगिना से मिलवाया था. ये कंपनी प्रोफेशनल नेटवर्किंग वेबसाइट लिंक्डइन के जरिए काम करती है लेकिन ये कंपनी सिर्फ 'ब्लू कॉलर जॉब्स' (कड़े शारीरिक श्रम वाले काम) ही दिलाती है.

(नौकरों की भारी कमी)

प्रिया साथियम जैसे नियोक्ताओं को एक ऑनलाइन फॉर्म भरना होता है और 1499 रुपए की रजिस्ट्रेशन फ़ीस की अदायगी के बाद वे काम के लिए इच्छुक नौकर या कामवाली की प्रोफाइल देख सकते हैं. इसमें इस बात का भी जिक्र होता है कि उन्हें कितना वेतन चाहिए और किस जगह पर वे काम करना पसंद करेंगे.

काम की तलाश में लगे लोगों को इस ऑनलाइन प्लेसमेंट एजेंसी के पास जाकर अपने बारे में तमाम जानकारियाँ- जैसे कितने सालों का अनुभव है, कौन सी भाषा आती है और कितना वेतन चाहिए, जैसी बातें दर्ज करानी होती हैं.

बड़ी माँग

जब कोई संभावित नियोक्ता काम के लिए इच्छुक व्यक्ति की प्रोफाइल पर अपनी रजामंदी की मुहर लगा देता है तो आवेदक को एसएमएस के जरिए ये संदेश मिल जाता है कि नियोक्ता उनसे संपर्क करेंगे.

बाबा जॉब्स 23 श्रेणियों की नौकरियों के विज्ञापन प्रकाशित करता है और साल 2007 में अपनी शुरुआत के बाद से यह देश भर में उपलब्ध 22 लाख नौकरियों के बारे में जानकारी दे चुका है.

(बदल गई ज़िंदगी)

देश के कम वेतन वाले इस क्षेत्र की ये केवल एक तस्वीर है. ऑनलाइन जॉब प्लेसमेंट एजेंसी 'गेट डोमेस्टिक हेल्प' (जीडीएच) के अनुमान के मुताबिक भारत में इस समय कम से कम 25 लाख लोग घरेलू नौकरों या कामवाली की तलाश कर रहे हैं और ये आंकड़े केवल भारत के चुनिंदा आठ बड़े शहरों से हैं.

दिल्ली के लिए काम कर रही इस एजेंसी का कहना है कि कई घरों में तीन नौकर तक रखे जाते हैं. ऐसी नियुक्तियाँ ज्यादातर अनौपचारिक किस्म की होती हैं. काम करने वाले नौकर सिफारिशों पर रखे जाते हैं और बिना किसी कागज़ी कार्रवाई को अंजाम दिए उन्हें काम दिया जाता है.

दो हाथ, कई काम

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जीडीएच के प्रबंध निदेशक मुरली बुक्कापटनम कहते हैं, "जाँचे-परखे घरेलू नौकरों की बड़ी माँग है."

कंपनी की शुरुआत के साल भर बाद ही उन्होंने हैदराबाद में एक शाखा खोली. अमरीका में 12 साल गुजारने के बाद मुरली बुक्कापटनम अपने गृह शहर हैदराबाद और बंगलौर के बीच सफर किया करते थे.

(लाखों बाल मजदूर)

कामयाबी, डिग्री और तजुर्बे के साथ लौटने पर उन्होंने पाया कि उनके बचपन की वो कामवाली आज भी उसी पेशे में हैं.

वह याद करते हैं, "उनकी जिंदगी जरा सी भी नहीं बदली. वह आज भी वही काम कर रही हैं. वह आज भी कुछ पढ़ नहीं सकतीं और उन्हें आज भी वही वेतन मिल रहा है."

जीडीएच घरेलू नौकरों को प्रशिक्षण देता है और इसके लिए उन्हें सर्टिफिकेट भी दिया जाता है.

जीडीएच का कहना है कि कंपनी की पहल घरेलू नौकरों को तरक्की के रास्ते पर बढ़ाने की एक कोशिश है.

मुरली कहते हैं, "अगर आप अपने घरेलू नौकर को देखेंगे तो पाएंगे कि वे और भी तीन काम कर रहे हैं. एक रसोइया मुमकिन है कि कहीं वेटर के तौर पर भी काम कर रहा हो या कहीं कपड़े धोने का भी काम करता हो."

बड़ा फायदा

जीडीएच को यकीन है कि सर्टिफिकेट मिलने के बाद घरेलू नौकर अपने करियर में सकारात्मक बदलाव महसूस करेंगे और उन्होंने ऐसा पहले कभी भी नहीं महसूस किया होगा. मुरली इसके लिए दोनों पार्टियों से प्लेसमेंट फ़ीस लेते हैं. वे कहते हैं कि सर्टिफिकेट पाए नौकरों का वेतन 20 फीसदी तक बढ़ गया.

(नौकरानियों पर अत्याचार का मामला)

Image caption मैरी रेगिना इस पेशे में पिछले 15 साल से है.

बंगलौर में काम करने वाली बाबा जॉब के चीफ़ ऑपरेटिंग ऑफिसर वीर कश्यप भी ऐसा ही दावा करते हैं कि उनकी सेवाएँ लेने वाले लोगों की आमदनी बढ़ी है.

भीड़-भाड़ भरे व्यस्त शहरों के लिहाज से एक और अहम चीज ये भी है कि ऑनलाइन जॉब प्लेसमेंट एजेंसी की सेवा लेने वाले लोगों का सफर में लगने वाला वक्त 14 मिनट तक कम हुआ.

विनला एक ऐसी महिला हैं जिन्होंने काम पाने के लिए बाबा जॉब की पाँच वर्षों तक मदद ली थी. उन्होंने छह अन्य महिलाओं को भी इस कंपनी से परिचित कराया. 42 वर्षीय विनला खाना बनाने का काम करती हैं और कहती हैं कि इसका सबसे बड़ा फायदा घर के नजदीक काम खोजने में है.

रोजगार की तलाश

वीर कश्यप का इरादा भी इस बिखरे हुए लेकिन अपार संभावनाओँ वाले बाजार को कारोबारी लिहाज से बेहतर बनाना है.

वे कहते हैं, "अब भी हर देश में आप किस तरह से काम तलाशते हैं, यह इस पर निर्भर करता है कि आपका सामाजिक जीवन कैसा है. ये अच्छी बात नहीं है कि सिर्फ बेहतर नेटवर्किंग होने से किसी को काम के बेहतर मौके मिल जाएँ."

बाबा जॉब में कई अमरीकी निवेशकों का पैसा लगा हुआ है. इसमें विनोद खोसला जैसे उद्यमी भी है. कंपनी की योजना अमरीकी कंपनी केयर डॉटकॉम की तर्ज पर स्टॉक मार्केट में लिस्टिंग के जरिए आम निवेशकों से पैसा लेने की भी है. भारतीयों को दुनिया के उन लोगों में शुमार किया जाता है जो रोजगार की तलाश में इंटरनेट पर आते हैं.

लिंक्डइन का दावा है कि इस देश में उसके दो करोड़ यूज़र हैं जो कि दुनिया में उसके अकाउंट होल्डर्स की संख्या का दसवां हिस्सा है. व्हाइट कॉलर जॉब दिलाने वाली वेबसाइट नौकरी डॉटकॉम साल 2006 में शेयर बाजार में उतरी थी. आज वो अरबों रुपयों की कंपनी है.

लेकिन मेहनतकश भारतीयों के लिए इंटरनेट पर जॉब मार्केट की सहूलियतें देने की अपनी मुश्किलें हैं. तकनीक लफ्ज़ से उनका कोई बहुत करीबी रिश्ता नहीं होता है.

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