फांसी का इंतज़ार कर रहे शख़्स के दिमाग में क्या चलता है?

जब किसी शख़्स को फांसी की सज़ा सुनाई जाती है तो उसके दिमाग में क्या उमड़ता होगा, उसकी मानसिक स्थिति क्या होगी? अगर आप यही सवाल लोगों से पूछेंगे तो ज़्यादातर लोग इसका जवाब नहीं दे पाएंगे.

लेकिन, अगर इन्हीं लोगों से यह पूछा जाए कि लंबे समय से मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे लोगों के साथ क्या किया जाए तो अधिकांश लोग कहेंगे कि उन्हें माफ़ कर दिया जाना चाहिए.

ऐसे में यह देखा जाना चाहिए कि समाज में मौत की सज़ा का प्रावधान क्यों बना हुआ है? क्या मौत की सज़ा का प्रावधान इसलिए है कि समाज ने उस व्यक्ति विशेष के बारे में यह मान लिया है कि वह सुधर नहीं सकता?

क्या यह उन लोगों में डर पैदा करता है जो ठीक उसी तरह का अपराध करने के बारे में सोचते हैं?

क्या यह व्यक्ति विशेष के ऊपर समाज के दबदबे को चिह्नित करता है?

या फिर समाज अब तक इस पहलू को लेकर अनिश्चितता में है, पहले वह मौत की सज़ा देता है और फिर मानवीय आधार पर उसे फांसी नहीं देता है?

मौत की सज़ा निंदनीय

समाज में मौत की सज़ा की ज़रूरत है या नहीं, इस पर बहस तो जारी रहेगी.

लेकिन मेरे ख़्याल से किसी भी इंसान को समाज की ओर से मौत की सज़ा देना चिंतित करने वाली निंदनीय बात है.

ऐसे में जिस किसी को मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी हो वह क्या सोचता है, महसूस करता है? अपनी ओर पल-पल पास आनी वाली मौत से उस पर क्या असर होता होगा?

किसी के लिए इसे स्वीकार करना आसान नहीं होता होगा.

ग़ुस्सा, निराशा और उदासी के साथ-साथ कई बार सज़ा पाने वाले के चेहरे पर आपको मौत को स्वीकार कर लेने के भाव नज़र आ सकते हैं. यह बात उसके बातचीत और व्यवहार में भी नज़र आ सकती है.

जब मौत का इंतज़ार लंबा खिंचने लगे, जब एक तरफ आपके जीवन का कोई भविष्य न हो और दूसरी ओर यह भी तय नहीं हो कि यह जीवन कब समाप्त हो जाएगा ऐसे समय में किसी व्यक्ति पर आखिर क्या गुजरती होगी?

ऐसे में समय बेहद लंबा महसूस होने लगता है. कोई आदमी खुद से भाग भी नहीं सकता और हमेशा अपनी मौत के बारे में सोचता भी नहीं रह सकता.

एक अजीब द्वंद्व की स्थिति है जहां एक ओर किसी के पास कोई उम्मीद भी नहीं है और उम्मीदों को ज़िंदा रखने की जरूरत भी.

अपराध के बारे में सोच

कोई भी शख़्स अपने पिछले जीवन को किस तरह से देखता है, ख़ासकर तब जब आसन्न मौत उसका इंतज़ार कर रही होती है.

ख़ुद के किए अपराध पर मौत का इंतज़ार कर रहे लोग अपने जीवन को निरुद्देश्य मान लेते हैं.

यह सोच जैसे-जैसे गहराने लगती है, वह शख़्स समाज से और भी दूर होता जाता है.

ऐसे कई लोग ग्लानि से भरे होते हैं. कई तार्किकता के आधार पर अपने अपराध को सही साबित करने की कोशिश कर सकते हैं? कई उदासीन भी हो जाते हैं?

हालांकि ज़्यादातर लोग यह सोच सकते हैं कि अगर परिस्थितियां दोबारा वैसी हुईं तो वे वैसा ही अपराध नहीं कर पाएंगे.

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ऐसे में एक संभावना तो यह है कि मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे लोग अपने व्यवहार और हाव-भाव में ऐसे नज़र आने लगें, मानो वह सुधर चुके हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि लंबे समय से मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे लोगों की सज़ा पर समाज को पुनर्विचार करना चाहिए? या फिर समाज को उन लोगों को भी फांसी दे देनी चाहिए जो सुधर चुके हैं?

ज़ाहिर है, क़ानून के मुताबिक न तो अपराध बदला है, न ही सबूत तो फिर सज़ा कैसे बदल सकती है?

क़ानून तो यह मानने को तैयार ही नहीं होगा कि व्यक्ति में बदलाव हुआ है या फिर हो सकता है.

मिटने लगते हैं रिश्ते

क्या ऐसे शख़्स को परिवार से सहायता की उम्मीद होती है या उम्मीदें सूखने लगती हैं ?

ऐसे मामलों में लोग परिवार की ख़बरों का इंतज़ार करना बंद कर देते हैं. वे परिवार को त्याग देते हैं.

लेकिन दूसरी ओर परिवार के लिए तो यह न ख़त्म होने वाली पीड़ा होती है. वे दरअसल ऐसे रेलवे स्टेशन पर होते हैं जहाँ रेलगाड़ी के आने की कोई संभावना नहीं होती.

भौतिक रूप से वह शख़्स तो जीवित है लेकिन उसके रिश्ते ख़त्म होने लगते हैं.

ऐसे में सवाल यही है कि क्या यह मानवीय समाज को करना चाहिए? क्या दंड देने के लिए इतनी क्रूरता दिखानी चाहिए?

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दरअसल मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे किसी भी शख़्स की निरुद्देश्यता और बेबसी के बारे में सोचना भी यातनापूर्ण है.

मौत की सज़ा का लंबे समय से इंतज़ार कर रहे लोग अवसाद के शिकार हो जाते हैं.

कई बार वे वास्तविकता से तालमेल बिठाने लायक नहीं होते. हो सकता है कई लोगों को ये इंतज़ार जीवन की मोहलत लगे लेकिन क्या यह गरिमामयी जीवन है?

समाज को कितना अधिकार

अगर ऐसा नहीं है तो क्या समाज को यह अधिकार है कि वह जीवन लेने से पहले गरिमा ले ले?

क्या समाज को इसका एहसास भी है कि मौत की सज़ा पाने वाला शख़्स फांसी पर लटकने से पहले कई बार मर चुका होता है?

क्या समाज को किसी शख़्स को कई बार सज़ा देने का हक है?

हालांकि मुझे इस बात का दुख ज़रूर है कि मैं उस समाज में रहता हूं जहां लोग एक दूसरे की जान ले लेते हैं.

लेकिन मैं ये भी कहना चाहूंगा कि समाज को भी वैसी ही हिंसा करने की जरूरत नहीं है. क्योंकि दंड की कोई भी व्यवस्था समाज में बदलाव नहीं ला सकती.

एक बड़ा सवाल यह भी है कि अगर अदालत किसी को मौत की सज़ा सुनाती है तो क्या वह जीवन लेने से पहले उस शख़्स की गरिमा को भी छीन लेने की सज़ा सुनाती है?

(डॉ. अचल भगत दिल्ली स्थित अपोलो हॉस्पीटल के सीनियर कंसलटेंट मनोचिकित्सक हैं और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर काम करने वाले समूह सार्थक के चेयरपर्सन हैं)

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