'राजनीति दलदल है पर उतरना तो पड़ेगा'

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जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के पास एक दफ्तर के सामने पिछले कुछ दिनों से तड़के सुबह से ही मजमा जुटने लगता है. दर्ज़नों लोग गले में मफलर, माथे पर टोपी, हाथ में अख़बारों की कतरनों और आँखों में एक सपने के साथ यहाँ जमा होना शुरू कर देते हैं.

एक पूरा समाज है इस मुट्ठी-भर रेले में- सेवानिवृत्त लेफ़्टिनेंट जनरल, सेना के लड़ाके, लड़ाकू पायलट, डॉक्टर, आईआईटी स्नातक, आप्रवासी महिलाएं और पुरुष, नौकरशाह, जेपी आन्दोलन के गवाह, रिक्शाचालक, फल-सब्जी की रेहड़ी वाले और युवा- आप नाम लो और हाजिर. दो बातें इन अलहदा लोगों को जोड़ती हैं. लोकसभा चुनाव की राह और आम आदमी पार्टी (आप) के टिकट की चाह.

‘आप’ इन दिनों राजस्थान की 25 लोकसभा सीट के लिए उम्मीदवारों का साक्षात्कार ले रही है. कुल 368 लोगों ने आवेदन किया, अब 25 की तलाश है. सरसरी निगाह पचास प्रतिशत पेशेवर नेताओं को इस समूह में पहचान जाती है. ‘यहाँ दाल गली तो ठीक नहीं तो किसी और पार्टी के दरवाज़े पर’ फलसफे वाले लोग भी हैं यहाँ.

पर कुछ ऐसे भी हैं जो समाज को बदलने के इरादे से अपना घर, परिवार, नौकरी यहाँ तक की देश भी छोड़कर राजनीति में कूदने को तैयार हैं.

आखिर क्या है ‘आप’ में जो राजनीति से दूर रहने वाले भी अब इसे गले लगाने को तत्पर हैं?

आखिर क्यों राजनीति को दलदल कहने वाले भी इसकी ओर दौड़े आ रहे हैं? इसका जवाब छुपा है इन लोगों की कहानियों में. पेश है इनमें से तीन आपकी नज़र.

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शंभू सिंह, 35 साल, रिक्शा चालक

जयपुर के व्यस्त ज्योति नगर इलाके के कुछ लोग शंभू सिंह को ‘क्रांतिकारी रिक्शावाला’ के नाम से अक्सर छेड़ते हैं. उसके विचार ही कुछ ऐसे हैं.

सिंह अपना आक्रोश बयां करते हैं, “सरकार ने हमारे साथ धोखा किया, हमारी नौकरी छीन ली, अब उसे सबक सिखाना है.”

शंभू सिंह बिहार के रहने वाले हैं. कोई छह साल पहले उनको नौकरी देने वाली कंपनी रातोंरात उड़न छू हो गई. खूब धक्के खाए, कोर्ट-कचहरी गए.

आखिर में जयपुर में रिक्शा खींचने की नौबत आ गई. वह कहते हैं, “जो सरकार अन्याय के खिलाफ मदद नहीं कर सकती उसका ना होना ही ठीक है.”

वह तीन साल पहले अरविंद-अन्ना के आन्दोलन से जुड़े थे. अब ‘आप’ जहां-जहां, सिंह वहां-वहां. हर आन्दोलन में उनकी भागीदारी तय मानिए.

चुनाव लड़ना चाहते हैं पर इतने पढ़े लिखे भी नहीं कि जानें कौन से इलाके से.

“ज्योति नगर से लड़ेंगे,” वह कहते हैं. जयपुर? “वह तो बहुत बड़ा शहर है, हम जैसे छोटे आदमी के लिए तो हमारा इलाका ही बहुत है,” बहुत भोलेपन के साथ कहते हैं.

उनका दिल तोड़ने के लिए इतना कहना काफी होगा की ज्योति नगर से सिर्फ नगर पार्षद का चुनाव लड़ा जा सकता है. पर इस निरीह गरीब की आख़िरी उम्मीद की लौ कोई क्यूं बुझाए?

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हिमांशु शर्मा, 30 साल, सॉफ्टवेयर कंपनी के मालिक और आईआईटी स्नातक

आज से छह वर्ष पहले देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी खड़गपुर से निकलकर हिमांशु सीधे जयपुर आ गए. सपना था अपनी सॉफ़्टवेर कंपनी शुरू करने का, उन्होंने वो शुरू कर दी. सोचा भविष्य को मेहनत और लगन से संवार लेंगे सो शादी कर घर बसा लिया.

हिमांशु बताते हैं, “बेईमान, भ्रष्ट तंत्र से सामना पहले दिन से शुरू हो गया. इंजीनियरिंग स्कूलों में सॉफ़्टवेयर के टेंडर निकलते थे. पर उन्हें पास करवाने के लिए सब पैसा और हिस्सा मांगते थे. मैंने नहीं दिया तो टेंडर भी नहीं मिले.”

अन्ना के आन्दोलन से भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में कूद पड़े, अरविंद केजरीवाल से मुलाक़ात हुई, उनसे प्रभावित हुए और चल पड़े नई राह पर. “अरविंद ने कहा दो साल देश को दे दो. उनसे किया वादा निभा रहा हूँ. सब कुछ छोड़ कर देश के लिए लड़ रहा हूँ.” हिमांशु अपनी दास्तां बताते हैं.

हिमांशु अब जयपुर से चुनाव लड़ना चाहते हैं. हिमांशु ने कहा, “मुझसे बेहतर कोई होगा तो उसके साथ हो जाऊँगा, असली मकसद है अच्छे लोगों को राजनीति में लाना.”

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Image caption शर्मीला कनाडा की स्थाई निवासी हैं. पर दिल खालिस हिन्दुस्तानी.

वह कहते हैं, “मैं आम आदमी का प्रतीक हूँ. तमन्ना है मुझे देख कर लोग कहें ये चुनाव लड़ सकता हैं तो हम भी राजनीति में आ सकते हैं. पॉलिटिक्स को बेईमान, भ्रष्ट और वंशवादी लोगों से तभी मुक्ति मिलेगी जब हर किसी के लिए राजनीति के दरवाज़े खुलेंगे."

शर्मिला दारा, 32 साल, अप्रवासी राजस्थानी

“अभी तो हम झाड़ू यात्रा निकाल रहे हैं. कैन आई कॉल यू इन वन आवर?”

शर्मीला हिंदी और अटलांटिक-पार के पुट वाली अंग्रेजी के मिश्रण में फ़ोन पर बात करने वाले से कहती हैं. शर्मिला कनाडा की स्थाई निवासी हैं. पर दिल खालिस हिन्दुस्तानी.

देश प्रेम की अलख कई दशकों से ठंडी पड़ी थी. कहती हैं कि ‘आप’ ने उसे जला दिया और भारत के ताज़ा हालात ने हवा दे दी. सो लौट आईं देश, बोरिया-बिस्तर और झाड़ू लिए.

शर्मिला झुंझनू से लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहती है. वह उनका ससुराल है. कनाडा में उनका अच्छा-ख़ासा व्यापार था. अन्ना के आन्दोलन के बाद सब छोड़ दिया.

शर्मिला कहती हैं, “इस सिस्टम को ठीक करना है तो इसके अन्दर आना पड़ेगा, बाहर से कुछ नहीं बदलेगा.”

शर्मिला अनशन कर चुकी हैं, रामलीला मैदान से ले कर रालेगण सिद्धि में धरने पर बैठ चुकी हैं. दिल अब देश में ही रम गया है.

शर्मिला खिलखिलाते हुए कहती हैं, “एक साल का बच्चा, पति, सास, ससुर सब झुंझनू आ गए हैं. अब जीना यहाँ, लड़ना यहाँ.”

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