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फ़ांसी पर राजनीति

तमिलनाडु की जयललिता सरकार ने जिस तरह आनन-फानन में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में सात लोगों को रिहा करने का फ़ैसला किया, उसकी तीखी आलोचना हुई. राज्य सरकार के इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. सु्प्रीम कोर्ट शुक्रवार को इन तीन दोषियों को रिहा किए जाने पर रोक लगा दी.

जहां राजीव गांधी की हत्या मामले में कांग्रेस दोषियों की फांसी की सज़ा बरकरार रखने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस नेता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह 1993 के दिल्ली धमाके में दोषी करार दिए जा चुके चरमपंथी देविंदर पाल सिंह भुल्लर को माफ़ किए जाने की बात कर चुके हैं. इसके लिए वो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी मुलाकात कर चुके हैं.

अकाली दल पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या मामले में दोषी बलवंत सिंह रजोआना को माफ़ किए जाने की मांग कर रही है.

वर्ष 2001 में भारतीय संसद पर हमले में शामिल होने के आरोप में अफज़ल गुरू को पिछले साल जिन परिस्थितियों में फांसी दी गई थी, उसकी भारत-प्रशासित कश्मीर में भारी आलोचना हुई. कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी अफ़जल गुरू को फांसी दिए जाने की कड़ी आलोचना की.

कश्मीर के एक वर्ग का मानना है कि अफ़जल गुरू को भारतीय अदालतों में न्याय नहीं मिला. अफ़जल गुरू का परिवार उनके शरीर को वापस किए जाने की मांग भी कर रहा है लेकिन सरकार ने ऐसा करने से मना कर दिया है.

सवाल ये कि फांसी की सज़ा पर क्या राजनीति किया जाना सही है?

बीबीसी इंडिया बोल सुनिए विनीत खरे के साथ.