राजस्थानः सज-धज के निकलती हैं ऊंट हसीनाएं

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जैसलमेर की रेतीली धरती पर पौ फटने में कुछ पल बाक़ी हैं. फरवरी की सर्दी और रात के धुंधलके का असर अभी छंटा नहीं है, पर गोरी को उठने की ज़रा जल्दी है और हो भी क्यूँ न? गोरी को मेले में जाना है और आज ब्यूटीशियन से उसका वक्त मुक़र्रर है.

रईस खां, जो जैसलमेर से 40 किलोमीटर दूर एक गाँव की एक ढाणी में रहते हैं, वो गोरी को अल्हड़ युवती की तरह सजाएँगे.

पहले होगा विशेष केश विन्यास, फिर सोलह श्रृंगार. बोरला, नथ, घुंघरू, लूम्बी बाँधने के बाद चमचम करते शीशे की कारीगरी के वस्त्र धारण करवाए जाएंगे और इसका खर्चा बैठेगा मात्र 15-20 हज़ार रुपए.

आप सोचेंगे कि साज-श्रृंगार की कथा में नया क्या है, यह तो घर-घर की कहानी है? है जनाब, ये गोरी किसी गाँव की सामान्य युवती नहीं है, बल्कि एक ऊँटनी है!

गोरी थार रेगिस्तान में अकेली श्रृंगार-प्रेमी ऊंटनी नहीं है. राजस्थान के मरू प्रदेश के दर्ज़नों ऊँट मेलों के अवसर पर ब्यूटीशियन के पास करीने से संवरने जाते हैं.

इसे शहरीकरण का असर कहें या व्यावसायिक मजबूरी, ऊँट-साज ख़ुद को ब्यूटीशियन और अपने घर, झोंपड़े, टेंट को पार्लर कहलाना ज़्यादा पसंद करते हैं.

क्यूँ होती है सज्जा?

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आज से कुछ वर्ष पहले ऊँटों का श्रृंगार करने वाले लोग जैसलमेर और बाड़मेर के गाँव-गाँव में हुआ करते थे. ये सामान्यतः ऊँट-पालक प्रजातियों जैसे रेबारी और देवासी परिवारों के सदस्य थे.

पर ऊंटों की घटती संख्या के साथ ऐसे लोग भी कम होते गए. इसका असर ये हुआ की ऊंटों की श्रृंगार कला, इसे खांटी मारवाड़ी में ‘लव’ करना कहा जाता है, अब सिर्फ कुछ विशेषज्ञों के पास सिमट कर रह गई है.

बीकानेर विश्वविद्यालय के पर्वायवरण विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर अनिल छंगाणी कहते हैं, “ऊंटों का लव करना पहले एक सामान्य ग्रामीण कला थी. प्रतिष्ठित और धनाढ्य परिवारों के लोग खाली समय में अपने ऊँट की सज्जा रेबारी और देवासी लोगों से करवाते थे, बदले में कुछ अन्न, धान दे देते थे.”

वे कहते हैं, “चूँकि अब लोग कम रह गए तो यह कला अब व्यवसाय के रूप में परिवर्तित हो गई है. बचे-खुचे ब्यूटीशियन अब पैसा बना लेते हैं, अपनी मांग ज़्यादा और आपूर्ति कम होने के कारण.”

आजीविका

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आज से कुछ वर्ष पहले तक ऊंटों का श्रृंगार दो कारणों से किया जाता था.

पहला उन्हें अलग पहचान देने के लिए, दूसरा मालिक का सामाजिक रसूख जताने के लिए. जितना रईस मालिक, उतना सजा-धजा उसका ऊँट. पर अब यह काम मेलों में आने वाले सैलानियों के लिए होता है.

जैसलमेर और बाड़मेर में ऊंटों के लिए सालाना तीन जलसे होते हैं. इनमें सबसे मशहूर जैसलमेर का मरू उत्सव माघ पूर्णिमा से तीन दिन पहले शुरू हो कर ख़त्म होता है.

इसमें मेले में करीब 50,000 पर्यटक और 300-400 ऊंट आते हैं. इसके अलावा बाड़मेर का उत्सव और एक लूनी नदी के पेटे में लगने वाला मेला भी थार के रेगिस्तान में ऊंट और पर्यटक आकर्षित करते हैं.

रईस खां और उनके ब्यूटीशियन भाइयों का पार्लर इन्हीं दिनों चलता है और कारोबार भी.

वह कहते हैं, “हम लोगों को बीकानेर और पुष्कर के मेलों में भी बुलाया जाता है,”

कुल मिला कर एक साल में चार-पांच जगह अपनी कला के प्रदर्शन से ये परिवार अपना पेट पाल लेते है. रईस के अनुसार “कभी-कभी मेले-ठेले में प्रतियोगिता जीत कर कुछ पैसा मिला जाता है.”

भविष्य असुरक्षित

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प्रोफेसर छंगाणी के अनुसार राजस्थान में ऊंटों की संख्या हर साल 10 प्रतिशत की दर से घट रही है. इसके कई कारण हैं, जैसे कि सड़कों का फैलाव, गाड़ियों का चलन और चरागाहों का अभ्यारण्यों में शामिल हो जाना.

जैसलमेर के बाशिंदे और मीडियाकर्मी अनिल रामदेव कहते हैं पहले हर घर के आगे ऊंटों की संख्या गृहस्वामी की संपन्नता का प्रतीक होती थी. पर अब समय बदल गया है. उनके खुद के परिवार में भी पहले ऊँट हुआ करते थे, पर अब उनकी जगह वाहन खड़े होते हैं.

रामदेव कहते हैं, “जजमान कम होने से कारीगर भी विलुप्त होते जा रहे है. अगर ये मेले नहीं होते तो 'लव' करना ख़त्म हो गया होता.”

कुछ लोगों ने 'लव' करने के लिए आधुनिक उपकरणों का उपयोग करने का प्रयास किया था, पर हाथ के हुनर जैसा मज़ा नहीं आया. घूम-फिर कर लोग रईस जैसे लोगों के पास ही वापस आ गए.

विलुप्त होती इस कला को बचाने में मेलों से मदद मिली है. ऊंट प्रेमी और विशेषज्ञ कहते हैं ऐसे आयोजन और होंगे तो कारीगर बचे रहेंगे और गाँव की गोरियां भी सजती रहेंगी.

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