जब हिल गई थी भारत के सत्ता प्रतिष्ठान की नींव

आडवाणी का नाम भी इसमें शामिल था इमेज कॉपीरइट

अगस्त की उस उमस भरी दोपहर में जनसत्ता अख़बार के दफ़्तर में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने फ़ोटोकॉपी किए गए काग़ज़ों का एक पुलिंदा भूरे रंग के एक बड़े लिफ़ाफ़े से निकाल कर मेरे सामने रख दिया.

वो नब्बे का दशक था और उस दौर में दिन को दिन और रात को रात कहा जाता था. तब मीडिया में (और जीवन में भी) ‘ट्वंटी-फ़ोर-सेवन’ जैसा जुमला इस्तेमाल नहीं होता था.

उस वक़्त मुझे इस बात का क़तई अंदाज़ा नहीं था कि मेरी डेस्क पर बोफ़ोर्स तोप कांड के बाद सत्ता के केंद्रों में भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी ख़बर के काग़ज़ात रखे थे.

ये वो काग़ज़ात थे जिन्होंने कुछ दिनों बाद ही भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान की बुनियाद हिला कर रख दी थी.

जनसत्ता अख़बार में इन्हीं काग़ज़ात के आधार पर सबसे पहले ख़बर छापी गई कि केंद्रीय जाँच ब्यूरो देश के बड़े मंत्रियों और विपक्ष के नेताओं के ख़िलाफ़ लगभग 64 करोड़ रुपए के हवाला कांड की जाँच को आगे नहीं बढ़ा रहा है.

डायरी में थे किसके नाम

इस कांड के केंद्र में उद्योगपति बी आर जैन और उनके तीन भाई थे, जिनके दफ़्तरों पर छापों के दौरान सीबीआई के हाथ ये दस्तावेज़ लगे थे. ख़ासतौर पर एस के जैन के लिए काम करने वाले एक शख़्स जे के जैन की विस्फोटक डायरी.

जैन बंधुओं में सबसे बड़े भाई बी आर जैन का बीते रविवार को 91 वर्ष की उम्र में भिलाई में निधन हो गया.

दिल्ली के पास नजफ़गढ़ गाँव में पैदा हुए बी आर जैन ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद भिलाई इस्पात कारख़ाने में ठेकेदारी से अपने बिज़नेस की शुरुआत की और कुछ ही बरसों में करोड़ों का कारोबार फैला लिया और विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के महत्वपूर्ण नेताओं तक पहुँच भी हासिल की.

सीबीआई का कहना था कि नेताओं को फ़ायदा पहुँचाने का ब्यौरा जेके जैन की डायरी में दर्ज था और पक्ष-विपक्ष के कई धुरंधरों के नाम हवाला रूट से पैसा हासिल करने वालों की सूची में लिखे गए थे.

आरोपों का सबसे घातक पक्ष भी यही था कि जो लोग कश्मीरी अलगाववादी चरमपंथियों को पैसा मुहैया करवा रहे थे वही लोग पक्ष और विपक्ष के नेताओं की फंडिंग भी कर रहे थे.

दस्तावेज़ मिलने के अगले कुछ दिन तक मैं दिन-रात जैन डायरी में दर्ज सूचनाओं की पुष्टि करने के लिए सीबीआई और दूसरी सरकारी एजेंसियों के चक्कर लगाता रहा.

उसी दौरान केंद्रीय जाँच ब्यूरो के तत्कालीन निदेशक ने मुझे दिए एक इंटरव्यू में ख़बर की पुष्टि करते हुए कहा कि जल्द ही इस मामले की जाँच आगे बढ़ाई जाएगी.

इसी बदनाम ‘जैन डायरी’ और सीबीआई के सूत्रों से मिली सूचनाओं के आधार पर जनसत्ता ने ख़बर छापी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के प्रभावशाली मंत्रियों, काँग्रेस पार्टी के नारायण दत्त तिवारी और विद्याचरण शुक्ल जैसे वरिष्ठ नेता, लोकसभा में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी, शरद यादव आदि कई नामचीन राजनीतिज्ञों के नाम सामने आने के कारण सीबीआई जाँच से हिचक रही है.

हाहाकारी पत्रकारिता

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Image caption इस डायरी में पू्र्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के मंत्रिमंडल के कई सदस्यों के नाम सामने आए थे.

आज की हाहाकारी पत्रकारिता के दौर से तुलना करूँ तो जनसत्ता ने भी जैन हवाला डायरी की इस ख़बर को कुछ हिचकते हुए छापा था. आज का दौर होता तो अख़बार में सबसे ऊपर आठ कॉलम की मोटी हेडलाइन लगी होती और संपादक और रिपोर्टर चीख़-चीख़कर कहते – हमारी ख़बर, हमारी ख़बर, सिर्फ़ हमारी ख़बर.

मुझे याद है कि पहले डायरी में दर्ज नाम छापने के बारे में संपादकीय टीम में कुछ असमंजस था पर फिर इन नामों को छापने का फ़ैसला किया गया, वो भी संभवतया ‘शेष पृष्ठ सात पर’ के साथ. ख़बर छपने के कुछ हफ़्तों बाद विनीत नारायण ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की और अदालत के आदेश के बाद सीबीआई को मजबूरन जाँच तेज़ करनी पड़ी.

अँग्रेज़ी की एक कहावत का हिंदी भावार्थ है – आप घोड़े को तालाब तक खींच कर तो ला सकते हैं, पर उसे पानी पीने पर मजबूर नहीं कर सकते. भारत के मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा ने अपनी निगेहबानी में सीबीआई को हवाला कांड की जाँच करने का आदेश तो दे दिया लेकिन डायरी में दर्ज सूचनाओं की पुष्टि करने के लिए और सबूत ढूँढने का काम तो सीबीआई के सब इंस्पेक्टर और हवलदारों को ही करना था. और उन्हें ये कहने से कौन रोक सकता था कि साहब, सबूत नहीं मिला!

यही हुआ. निचली अदालतों से लेकर हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक में पेश किए गए सबूतों को जजों ने कूड़ेदान में डाल दिया और कहा कि सिर्फ़ एक डायरी के आधार पर कोई केस नहीं बनता.

अदालतें सबूत के आधार पर फ़ैसला करती हैं और अगर ठोस सबूत नहीं हैं तो अभियुक्त को सज़ा नहीं दी जा सकती. यही कारण था कि लालकृष्ण आडवाणी से लेकर विद्याचरण शुक्ल तक सभी नेता और अफ़सर एक-एक करके छूट गए.

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Image caption ये कांड सामने आया तो टीवी का इतना ज़ोर नहीं था

पर उन हंगामाख़ेज़ दिनों में भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ सिद्धांतकार ने मुझे 11 अशोक रोड स्थित बीजेपी मुख्यालय के अपने कमरे में सिलसिलेवार तरीक़े से बताया कि दरअसल जैन बंधुओं ने पार्टी के प्रथम पुरुष को कैसे पैसा दिया.

संघ के इस स्थापित सिद्धांतकार ने मुझे बताया कि किस तरह नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें फ़ोन किया और कहा कि कोई सज्जन उन्हें दो लाख रुपए देना चाहते हैं – क्या किया जाए?

केजरीवाल और भ्रष्टाचार

शरद यादव ने बाक़ायदा एक टेलीविज़न इंटरव्यू में स्वीकार किया कि कोई जैन उनके पास आया था और उन्हें तीन लाख रुपए देकर चला गया.

लेकिन सीबीआई इस आरोप को साबित करने लायक़ सबूत जुटा पाने में कामयाब नहीं हो पाई कि भारतीय जनतंत्र के नायकों तक पहुँचाई जाने वाली रक़म और कश्मीर के अलगाववादी चरमपंथियों को दिया जाने वाला पैसा एक ही हवाला रूट से होकर आ रहा था.

पर अदालत ने अभियुक्तों को बाइज़्ज़त बरी कर दिया था और पूरा जैन हवाला कांड चरमराकर ढह गया.

जब जैन हवाला कांड फूटा था तब अपनी अदृश्य चुटिया खोल, भ्रष्टाचार के पेड़ की जड़ों में नित नियम से मट्ठा डालने का ऐलान करने वाले कुछ लोग हर दोपहर में अदालत और हर शाम अख़बारों के दफ़्तरों में नज़र आते थे ताकि उनकी तस्वीर के साथ कहीं दो कॉलम की ख़बर छप जाए.

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Image caption अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहे हैं

आज उनमें से कई लोग पत्रकारिता और एक्टिविज़्म की गलियों से गुज़रते हुए आध्यात्म और स्व-कल्याण के वियाबान में पहुँच चुके हैं.

पुनश्च: हवाला कांड की गूँज भरे उन दिनों में हरियाणा का एक नौजवान आईआईटी खडगपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद अपना आधार तलाशने की कोशिश कर रहा था.

तब किसी को अंदाज़ा नहीं था कि बीस साल बाद ये नौजवान भी भ्रष्टाचार के वटवृक्ष की जड़ों में मट्ठा डालने का ऐलान करेगा, मगर बिना अख़बार के दफ़्तरों में चक्कर लगाए.

लोग इस नौजवान को अरविंद केजरीवाल के नाम से जानते हैं. ये सवाल अभी अनुत्तरित है कि अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के वृक्ष को सुखा पाएँगे या शोहरत की गलियों से गुज़रकर कुछ बरसों बाद स्व-कल्याण के वियाबान में रम जाएँगे.

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