सरकार को है आपकी जासूसी का हक़?

इमेज कॉपीरइट

जब आप अपने कमरे के एकांत में बैठकर ई-मेल लिखते हैं या सोशल मीडिया साइटों पर चैट करते हैं, तब लगातार एक अदृश्य आँख आपके संदेशों को पढ़ रही होती है और आपको इसका अंदेशा तक नहीं होता.

मोबाइल ऐप पर चैटिंग के रिकॉर्ड से लेकर गूगल सर्च, फ़ोन कॉल और एसएमएस तक, सब कुछ देख रही अदृश्य निगाहें हैं सरकार की.

चाहे सेंट्रल मॉनिटरिंग सिस्टम हो या नेटवर्क ट्रैफ़िक अनालिसिस, सभी प्रोग्राम खुफ़िया तरीके से आपकी जानकारियां जुटाती हैं.

सरकार इसे देश की सुरक्षा के लिए ज़रूरी मानती है लेकिन कई ग़ैरसरकारी संगठन और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग ऐसे प्रोग्राम्स के दुरुपयोग किए जाने की आशंका व्यक्त करते हैं.

(पढ़िए: क्या आप जानते हैं, कौन है इंटरनेट का मालिक?)

अभिव्यक्ति की आज़ादी और इंटरनेट गवर्नेंस पर काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय ग़ैर सरकारी संस्था इंडेक्स ऑन सेंसरशिप की मुख्य कार्यकारी अधिकारी क्रिस्टी ह्यूज़ ने बीबीसी हिन्दी से विशेष बातचीत में कहा, “हमारी जानकारी के अनुसार ब्रिटेन और अमरीका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निगरानी करते हैं, भारत भी राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे कार्यक्रम चलाता है. मुझे लगता है कि इस तरह सभी नागरिकों की असीमित ख़ुफ़िया जानकारियां जुटाए जाने को कतई सही नहीं ठहराया जा सकता.”

आम लोगों की निजता नहीं?

तो क्या ऐसी कोई व्यवस्था हो सकती है जिसमें आम लोगों की प्राइवेसी संरक्षित रहे?

क्रिस्टी ह्यूज़ कहतीं हैं, “तकनीक का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए. मॉनिटरिंग की प्रक्रिया को ऐसा बनाया जाना चाहिए जिसमें सीधे तौर पर हर किसी की ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने की प्रक्रिया पर अंकुश लगे, सिर्फ जिनकी ज़रूरत हो उन्हीं की निगरानी की जाए.”

ह्यूज़ का मानना है कि इंटरनेट गवर्नेंस को लागू करने में सरकारें दिलचस्पी ले रहीं हैं और कई देश इस पर पूरे नियंत्रण के हक़ में हैं.

पर ह्यूज़ का मानना है कि इंटरनेट गवर्नेंस का नियंत्रण एक पक्ष के पास न होकर उसमें सबकी भागीदारी होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, “सैद्धांतिक तौर पर बहुपक्षीय व्यवस्था का कोई स्वरूप ही आगे का रास्ता खोलेगा. लेकिन उसके बारे में और चर्चा की ज़रूरत है, फिलहाल इंटरनेट कंपनियों से लेकर गैर सरकारी संस्थाएँ, और यूज़र्स से लेकर सरकारें, सभी अपना पक्ष चाहतीं हैं.”

सोशल मीडिया कमेंट से जेल

सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात करते हुए उन्होंने महाराष्ट्र के शहर पलघर की उन दो लड़कियों का ज़िक्र किया जिनके फ़ेसबुक कमेंट को राजनीतिक दल शिवसेना के खिलाफ़ माना गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.

वह कहती हैं, “सोशल मीडिया पर किसी की अभिव्यक्ति को अपराध की श्रेणी में रखकर देखा जाना बेहद चिंताजनक है. हमने ऐसा होते हुए ब्रिटेन में देखा है और इसके बारे में यहां भारत में भी सुना है. बेशक ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दायरों में मानहानि से संबंधित क़ानून हैं, लेकिन अगर इस तरह से किसी की कही बात को अपराध की तरह देखा जाए तो एक लोकतांत्रिक बहस का रास्ता ही खत्म हो जाएगा.”

इमेज कॉपीरइट AFP

पलघर की शाहीन ढाडा और रेणु श्रीनिवासन को पुलिस ने बाल ठाकरे की मौत के बाद मुंबई में बंद के खिलाफ़ एक फेसबुक पोस्ट लिखने और लाइक करने पर गिरफ़्तार किया था.

इन लड़कियों पर धार्मिक भावनाएँ आहत करने के आरोप में और आईटी ऐक्ट के तहत कार्रवाई हुई. बाद में उन्हें छोड़ दिया गया.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार