क्या राजग के नए 'राम' का वनवास ख़त्म होगा?

रामविलास पासवान इमेज कॉपीरइट PTI

शब्दों को अपने फ़ायदे के लिए उपयोग करने की रामविलास पासवान की पुरानी आदत है. वो पूर्व समाजवादी राममनोहर लोहिया की वाकपटुता से काफी प्रभावित रहे हैं.

उन्होंने राजनीति में काफी लंबा सफर तय किया है. पिछले तीन दशकों में वो क़रीब सभी सरकारों में मंत्री रहे हैं. लेकिन अभी भी वो शब्दों के साथ खेलने की क्षमता रखते हैं.

वो अभी हाल तक भारतीय जनता पार्टी को 'भारत जलाओ पार्टी' कहते रहे हैं. वह कहते हैं कि भाजपा तो माध्यम भर है, जबकि आरएसएस ट्रांसमीटर है. अब उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया है, तो वो यह कह सकते हैं कि भाजपा दरअसल 'भारत जगाओ पार्टी' है.

पढ़ें- रामविलास पासवान को मोदी क़ुबूल

निवर्तमान लोकसभा चुनाव में वो ख़ुद चुनाव हार गए थे और उनकी पार्टी एक भी सीट जीत पाने में नाकाम रही थी.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दलितों में महादलित नाम की एक श्रेणी बनाई है, इससे पासवान की जाति को बाहर रखा गया है.

वो पिछले पाँच साल से सत्ता से बाहर हैं, ऐसे में 2014 का लोकसभा चुनाव उनके लिए ख़ुद को राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाए रखने का अंतिम मौक़ा है.

सत्ता से बाहर

इमेज कॉपीरइट Reuters

उनकी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) अकेले लोकसभा चुनाव लड़ पाने की स्थिति में नहीं है, यह गठबंधन के लिए उनकी हताशा से साफ हो गया था.

दुर्भाग्य से उन्होंने पिछले पाँच सालों में बिहार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बहुत कम काम किया है.

यहाँ तक कि उनके उम्मीदवारों की सूची नहीं बदली है, जिसमें उनका, उनके भाई, उनके बेटे और सूरजभान और रामा सिंह जैसे कथित माफियाओं के नाम शामिल हैं.

पासवान मीडिया प्रेमी व्यक्ति हैं और दिल्ली के पत्रकार जानते हैं कि वह कैसे वह पत्रकारों को गैस और टेलीफ़ोन के कनेक्शन दिलवाते थे.

उनकी दूसरी योग्यता यह है कि वो सार्वजनिक रूप से बोलने वाले हैं, जो यूपीए के काम आ सकता था. लेकिन लालू प्रसाद यादव के साथ देते हुए यूपीए ने फैसला किया कि वह पासवान के बिना ही रहेगी.

पिछले हफ़्ते यूपीए नेताओं ने इसकी पुष्टि की थी, जब उन्होंने कहा था कि लालू प्रसाद यादव पासवान को रखने के लिए इच्छुक नहीं हैं.

चिराग पासवान: 'यह पार्टी के अस्तित्व की लड़ाई है

गठबंधन का फ़ायदा

भाजपा के लिए पासवान के साथ गठबंधन करना एक भावनात्मक और मनोबल बढ़ाने वाली बात है. भाजपा और आरएसएस दोनों में ही तथाकथित ऊंची जातियों का कब्जा है, ऐसे में लोजपा के साथ उसका गठबंधन फ़ायदेमंद होगा.

इसके साथ ही यह लोकसभा चुनाव के लिए बिहार में 40 उम्मीदवार खोजने की समस्या का भी समाधान करेगा. भाजपा ने लोजपा के लिए सात और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के लिए तीन सीटें छोड़ी हैं.

ऐसे में भाजपा को केवल 30 सीटों पर ही चिंता करनी है. हालांकि राजनीतिक गलियारे में इस बात की भी चर्चा है कि भाजपा लालू प्रसाद यादव के साले साधु यादव को लोजपा के टिकट पर चुनाव लड़ाने का प्रयास कर रही है.

बदलता गठबंधन

इमेज कॉपीरइट PTI

अंग्रेजी अख़बार 'इंडियन एक्सप्रेस' के पत्रकारों के साथ चर्चा वाले कार्यक्रम 'आइडिया एक्सचेंज', जो 23 फ़रवरी के अंक में प्रकाशित हुआ था, में पासवान को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि कांग्रेस-राजद और उनकी पार्टी के गठबंधन की अनौपचारिक घोषणा का इंतजार है.

इस चर्चा में उन्होंने यह भी कहा कि बिहार में इन तीनों पार्टियों में से कौन सी पार्टी कितने सीट पर चुनाव लड़ेगी, इस पर कोई चर्चा नहीं हुई है.

यह सबको पता है कि कांग्रेस अपने कोटे की एक भी सीट उन्हें देने को तैयार नहीं है और लालू प्रसाद यादव उन्हें केवल तीन सीटें ही देने को तैयार थे, जबकि वो 12 सीटों की मांग कर रहे थे.

राजद में 'टूट' से बिहार की राजनीति गरमाई

उसी कार्यक्रम में पासवान ने दावा किया था कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे और भाजपा को बहुत अधिक सीटें नहीं मिलेंगीं. लेकिन अब वो राजग का दलित चेहरा बन गए हैं. इस तरह का उतार-चढ़ाव अक्सर उस आदमी में आता है जो अपने वादे पर ख़रा नहीं उतरता.

उन्हें देश का एक शक्तिशाली दलिता नेता होना चाहिए था. लेकिन अब वो केवल एक राज्य की अपनी ही जाति के नेता बनकर रह गए हैं. अपनी राजनीतिक संभावनाओं से समझौते करने के बाद भी वो देश के धनी नेताओं में से एक है, इस चुनाव के समय उनकी ओर से दाखिल किए जाने वाले हलफनामे में दिखाने से कभी परहेज नहीं किया.

विमान यात्रा

इमेज कॉपीरइट AFP

मैंने 1990 के दशक के शुरुआती दिनों में लालू प्रसाद यादव, पासवान और वरिष्ठ पत्रकार जुगुनू शारदेय के साथ अमेठी के लिए विमान यात्रा की थी.

लालू प्रसाद वहाँ जनता दल के उम्मीदवार का प्रचार करने जा रहे थे. हम उनको चुनाव प्रचार करते हुए देखने के लिए जा रहे थे. यह छह सीटों वाला एक छोटा सा विमान था. लालू प्रसाद और पासवान आमने-सामने बैठ थे और हम लोग किनारे बैठे थे.

विमान के उड़ान भरने के बाद लालू प्रसाद ने कहा कि वो सोना चाहते हैं. यह कहते ही उन्होंने अपने पैर पासवान की गोद में रख दिए. यह देखकर वो हतप्रभ थे लेकिन मुख्यमंत्री के पैरों को जगह देने के लिए पासवान अपनी सीट पर सिकुड़ कर तब तक बैठे रहे, जब तक कि विमान कानपुर में उतर नहीं गया.

यह घटना अभी भी दिमाग में इसलिए बनी हुई है, क्योंकि यह यह जानने की अंतर्दृष्टि देती है कि पासवान उस ऊंचाई तक क्यों नहीं उठ पाए जिसका उन्होंने वादा किया था.

यह इन दोनों नेताओं के रिश्तों को भी दिखाता है और उस अपमान को भी जिसे राजद प्रमुख ने सावधानी से बढ़ावा दिया.

पढ़ें - क्या लालटेन की लौ बचा पाएँगी राबड़ी देवी?

गुजरात दंगों के बाद

पासवान ने 2002 में राजद को तब छोड़ दिया था, जब उन्हें संचार मंत्रालय नहीं मिला. लेकिन उन्होंने इसे गुजरात दंगों के विरोध में उठाया गया क़दम बताया था. क्योंकि उन्हें लालू प्रसाद यादव का सहारा मिला था.

लेकिन यहाँ यह भी याद रखने लायक है कि अगर मीडिया में आ रही ख़बरों पर भरोसा किया जाए तो उन्होंन केवल दो सीटों के लिए पाला बदला है. ख़बरों के मुताबिक़ यूपीए उन्हें दो सीटें देने के लिए तैयार थी, जबकि भाजपा ने उन्हें सात सीटें दी हैं.

हो सकता है कि उन्होंने चुनाव पूर्व या चुनाव के बाद वाला कोई और भी समझौता किया है, जिसपर न तो वह चर्चा कर सार्वजनिक करना चाहते हैं और न भाजपा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार