बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए?

  • 2 मार्च 2014
नीतीश कुमार, बिहार

विशेष राज्य का दर्जा अभी तक पर्वतीय दुर्गम क्षेत्रों, सीमावर्ती, आदिवासी बहुल और ग़रीब राज्यों को ही मिलने का प्रावधान है. बिहार जैसे ग़रीब राज्यों के समावेशी विकास के लिए विशेष राज्य की मांग हाल के कुछ बरसों में काफ़ी सुर्ख़ियों में रही है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में ये मांग ज़ोर से उठती रही है. विभिन्न अख़बारों ने भी इसकी मुहिम चलाई है. केंद्र सरकार ने राजनीतिक दबाव में ग़रीब राज्यों को मिलने वाले वित्तीय प्रावधानों पर पुनर्विचार के लिए रघुराम राजन समिति गठित कर विशेषज्ञों की राय ली है.

हालांकि प्रति व्यक्ति आय की जगह उपभोग को मानक सूचकांक में शामिल करने पर ऋण उपभोग के दबाव में ग़रीब राज्यों को नुक़सान हो गया और बिहार को अपेक्षित लाभ इस समिति से नहीं मिल सकता जिसके लिए बिहार ने इस रिपोर्ट पर अपनी असहमति भी दर्ज कराई है, लेकिन केंद्र से ग़रीब राज्यों को मिलने वाले वित्तीय प्रावधानों में महत्वपूर्ण बदलाव का लाभ ज़रूर मिल सकता है.

अब यह रिपोर्ट संसदीय सेलेक्ट कमेटी में विचाराधीन है. केंद्रीय वित्त मंत्री चिदंबरम ने बीते साल की आर्थिक समीक्षा और बजट भाषण में इसका उल्लेख भी किया जिससे कुछ आशाएं भी बंधीं, किंतु कुछ राजनीतिक कारणों से यह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली गई है.

बिहार भारत का दूसरा सबसे बड़ी आबादी वाला ग़रीब राज्य है, जहां अधिकांश आबादी समुचित सिंचाई के अभाव में मॉनसून, बाढ़ और सूखे के बीच निम्न उत्पादकता वाली खेती पर अपनी जीविका के लिए निर्भर है.

हर साल आने वाली बाढ़

करीब 96 फ़ीसदी जोत सीमांत और छोटे किसानों की है. वहीं लगभग 32 फ़ीसदी परिवारों के पास ज़मीन नहीं है.

बिहार के 38 ज़िलों में से लगभग 15 ज़िले बाढ़ क्षेत्र में आते हैं जहां हर साल कोसी, कमला, गंडक, महानंदा, पुनपुन, सोन, गंगा आदि नदियों की बाढ़ से करोड़ों की संपत्ति, जान-माल, आधारभूत संरचना और फसलों का नुक़सान होता है.

कोसी नदी के बाढ़ के पानी से बिहार के कई ज़िलों में तबाही मचती रही है.

विकास के बुनियादी ढांचे सड़क, बिजली, सिंचाई, स्कूल, अस्पताल, संचार आदि का वहां नितांत अभाव तो है ही, हर साल बाढ़ के बाद इनके पुनर्निर्माण के लिए अतिरिक्त धन राशि की चुनौतियां भी बनी रहती हैं.

पिछले सात-आठ सालों में बिहार की सालाना विकास दर अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर रही है. कहा यह भी जाता है कि जब बिहार की विकास दर ऊंची रही है तो क्यों विशेष दर्जा चाहिए?

'निवेश की ज़रूरत'

बिहार की बढ़ती विकास की दर सामान्यतः निर्माण, यातायात, संचार, होटल, रेस्तरां, रियल एस्टेट, वित्तीय सेवाओं आदि में सर्वाधिक रही है जहां रोज़गार बढ़ने की संभावना अपेक्षाकृत कम होती है.

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खेती, उद्योग और जीविका के अन्य असंगठित क्षेत्रों में, जिन पर अधिक लोग निर्भर हैं, विकास की दरों में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया है. शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई सकारात्मक प्रयास अवश्य हुए हैं जिससे सामाजिक विकास के ख़र्चों में महत्वपूर्ण बढ़ोत्तरी भी हुई है. लेकिन ये अब भी विकसित राज्यों की तुलना में काफ़ी कम है.

इस तरह अर्थव्यवस्था का आधार छोटा होने के कारण उनका सार्थक प्रभाव जीविका विस्तार और ग़रीबी निवारण पर दिखना अब भी बाकी है. इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र में पर्याप्त वित्तीय निवेश की ज़रूरत है.

राज्य को वित्तीय उपलब्धता मुख्यतः केंद्रीय वित्तीय आयोग की अनुशंसा पर केंद्रीय करों में हिस्से और योजना आयोग के अनुदान के साथ केंद्र प्रायोजित योजनाओं के अलावा राज्य सरकार द्वारा लगाए गए करों से होती है.

केंद्र प्रायोजित योजनाओं में अकसर राज्य की भागीदारी 30 से 55 फ़ीसदी होती है. चूंकि ग़रीब राज्यों की जनता की कर देने की क्षमता कम होती है, अकसर बराबर धनराशि के अभाव में ग़रीब राज्य उन योजनाओं का पूरा लाभ नहीं ले पाते हैं.

'विशेष राज्य का दर्जा मिले'

विशेष राज्य का दर्जा न केवल 90 फ़ीसदी अनुदान के लिए बल्कि करों में विशेष छूट के प्रावधान से विकास योजनाओं के लाभ और निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाने में भी मददगार होगा.

यदि राज्यों को मिलने वाले प्रति व्यक्ति योजना व्यय पर नज़र डालें तो बिहार जैसे ग़रीब राज्यों को मिलने वाली धनराशि पंजाब की तुलना में लगभग एक तिहाई से भी कम रही है जिससे विकास और ग़रीबी निवारण का कार्य प्रभावित होता है.

ग़रीब राज्यों की केंद्रीय संसाधनों में हिस्सेदारी बढ़ाने का आधार विकसित करने की ज़रूरत है, तब ही ये राज्य ग़रीबी निवारण के लिये आवश्यक विकास दर बनाए रख सकते हैं.

बिहार से झारखंड के अलग होने के बाद खनिज संपदा से मिलने वाली रॉयल्टी के नुक़सान के साथ ज़रूरी वित्तीय क्षतिपूर्ति नहीं होने के कारण विकास कार्यों में बाधाएं बढ़ी हैं. साल 2008 में कोसी पर कुसहा बांध की विनाशकारी टूट से कोसी अंचल में पुनर्वास की चुनौतियां और भी बढ़ गई हैं.

पिछली तीन पंचवर्षीय योजनाओं में समावेशी विकास की रणनीति की प्रमुखता रही है. आर्थिक मौलिकता मज़बूत होने के करण उदारीकरण का कुप्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ने के खोखले दावे की पोल दुनिया में मंदी के दौरान देश की लुढ़कती विकास दर ने खोल दी है.

ऐसे में ग़रीब राज्यों का तेज़ी से विकास ही देश की गिरती विकास दर को थाम सकता है और क्षेत्रीय विषमता को पाटने में कारगर हो सकता है. इसलिए ग़रीब राज्यों के वित्तीय प्रावधानों को बदलने के लिये विशेष राज्य का दर्जा समावेशी विकास के लिये ज़रूरी है.

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