गोधरा: ‘मैं आज भी नहीं जाता वहां’

अनिल शर्मा, गोधरा फ़ायर सर्विस इमेज कॉपीरइट Daxesh Shah

अनिल शर्मा बीते 12 साल से एक पछतावे और एक डर के साथ जी रहे हैं. अनिल शर्मा गोधरा के दमकल विभाग के कर्मचारी हैं. वो उन शुरुआती लोगों में से थे जो ट्रेन में आग लगने के बाद स्टेशन पर पहुंचे थे.

उन्हें पछतावा इस बात का है कि वो एक ज़िंदगी नहीं बचा सके. बीते 12 सालों में उन्होंने गोधरा स्टेशन जाने से बचने के लिए हर मुमकिन बहाना बनाया है, भले ही परिवार का ही कोई काम क्यों न हो.

अनिल शर्मा गोधरा केस में एक गवाह हैं. उन्हें डर है कि अभियुक्तों के परिवार के सदस्य उन्हें दुश्मन समझ सकते हैं क्योंकि वो एक हिंदू हैं.

अब अनिल शर्मा ने निजी सुरक्षा के लिए एक पिस्तौल के लाइसेंस के लिए आवेदन दिया है.

‘जल्दी जाओ’

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Image caption गोधरा हादसे के बाद जले हुए कोच अब भी गोधरा स्टेशन पर खड़े हैं.

27 फ़रवरी 2002 को अनिल शर्मा और उनके साथियों को पुलिस कंट्रोल रूम से ये संदेश मिला था कि गोधरा स्टेशन पर आग लग गई है.

दमकल की एक गाड़ी और अपने ड्राइवर के साथ अनिल शर्मा स्टेशन के लिए रवाना हुए थे.

अनिल शर्मा कहते हैं, “मैं स्टेशन पर पहुंचने ही वाला था कि कुछ लोगों ने रोक लिया. मुझे लगा कि वो कुछ कहना चाहते हैं लेकिन मैं उनसे कुछ पूछता इससे पहले उन्होंने मेरी गाड़ी पर पथराव शुरू कर दिया. जब हालात नियंत्रण से बाहर हो गए तो हम गाड़ी के शीशों से टकराते पत्थरों की परवाह किए बिना सड़क पर आगे बढ़ गए.”

वो आगे बताते हैं, “हम उस जगह पहुंचे जहां से धुआं उठ रहा था, ये जगह स्टेशन से दूर थी. मुझे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ कि ट्रेन का एक डिब्बा जल रहा है."

उस दृश्य को याद करते हुए अनिल कहते हैं, "मैं ट्रेन के अंदर जल रहे लोगों को देख सकता था लेकिन अंदर नहीं जा सकता था क्योंकि आग बहुत भयानक थी. मुझे देरी से पहुंचने का पछतावा है क्योंकि अगर मैं 10 मिनट पहले पहुंचता तो शायद एक-दो लोगों को बचा पाता.”

‘मैं आज भी नहीं जाता वहां’

गोधरा के स्थानीय लोगों को ट्रेन का जला हुआ एस-6 कोच और गोधरा रेलवे स्टेशन अब भी उन लोगों की मौत और हादसे की याद दिलाता है.

अनिल शर्मा कहते हैं, “मेरी तरह बहुत से लोग उस दिन की याद मिटा देना चाहते हैं. मैं स्टेशन या उस तरफ़ नहीं जाता जहां जला हुआ डिब्बा खड़ा है.”

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वो बताते हैं, “उस बदकिस्मत सुबह मैंने जिन पांच लोगों को देखा था, उन्हें अदालत में भी देखा. मैंने जो किया अपने कर्तव्य को निभाते हुए किया लेकिन जिन लोगों को सज़ा मिली उन्हें मैं दुश्मन लग सकता हूं. इसलिए मुझे सिग्नल फालिया इलाके में जाते हुए डर लगता है और अब मैंने पिस्तौल के लाइसेंस के लिए भी अर्ज़ी दे दी है.”

वो आगे कहते हैं, “उस दिन की वजह से मुझे अब भी रातों को नींद नहीं आती. जिन लोगों की मैंने पहचान की थी उनके परिवार को भी दिखना नहीं चाहता.

मुझे किसी समुदाय के लिए कोई पूर्वाग्रह नहीं है लेकिन दंगों पर राजनीति ने हम सबको बांट दिया है.”

अनिल शर्मा की एक शिकायत भी है, “सभी सरकारें मुद्दों को सुलझाने के बजाय उन पर राजनीति करने में ज़्यादा वक़्त, ऊर्जा और पैसा लगाती हैं. गोधरा हादसे के बाद उम्मीद ये थी कि ऐसे हादसों से निपटने के लिए तैयारी होती लेकिन कुछ नहीं बदला है. कुछ उपकरण मिले हैं लेकिन उनका इस्तेमाल करने के लिए प्रशिक्षित लोग नहीं है और ये उपकरण धूल खा रहे हैं, पता नहीं कि ज़रूरत पड़ने पर काम आएंगे या नहीं.”

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