नवीन पटनायक ने तीसरे मोर्चे से झाड़ा पल्ला?

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पिछले एक वर्ष से लगातार एक 'गैर कांग्रेस-गैर भाजपा' गठबंधन की वकालत करने के बाद ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल (बीजद) अध्यक्ष नवीन पटनायक अब इस गठबंधन के साथ अपनी पार्टी के रिश्ते पर फिर से विचार करते हुए नज़र आ रहे हैं.

इस बात का पुख़्ता संदेश पिछले सोमवार को मिला जब नई दिल्ली में 11 राजनीतिक दलों की बैठक में बीजद ने हिस्सा नहीं लिया.

वैसे सीपीएम नेता प्रकाश करात ने यह साबित करने की भरपूर कोशिश की कि तीसरे मोर्चे में कोई फूट नहीं है और बीजद गठबंधन के साथ है. उनका कहना था, "पटनायक ने हमें पहले से ही इत्तला कर दी थी कि किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के कारण वह इस बैठक में हिस्सा नहीं ले पाएंगे."

लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर पटनायक सचमुच अपने 'पूर्व निर्धारित' कार्यक्रम में इतने ही मसरूफ़ थे तो उन्होंने पार्टी के किसी अन्य नेता को अपने प्रतिनिधि के रूप में क्यों नहीं भेजा जैसा कि उन्होंने इससे पहले हुई मोर्चे की दोनों बैठकों में किया था?

पिछले वर्ष 30 अक्टूबर को नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हुई 'सांप्रदायिकता के खिलाफ रैली' और फरवरी के आरंभ में संसद में 'फ्लोर मैनेजमेंट' के लिए हुई बैठक में बीजद के एक नहीं, तीन-तीन सांसद उपस्थित थे. तो फिर इस बार ऐसा क्या हुआ कि संसद के अधिवेशन के दौरान भी तीसरे मोर्चे की बैठक में भेजने के लिए पटनायक को एक भी सांसद नहीं मिला?

बीजद की अनुपस्थिति के बारे में पूछे जाने पर पार्टी के उपाध्यक्ष और ओडिशा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री डॉ. दामोदर राउत ने बीबीसी से कहा, "हो सकता है कि पार्टी के अध्यक्ष ने किसी से जाने के लिए कहा नहीं होगा. लेकिन इससे यह अंदाज़ा लगा लेना उचित नहीं होगा कि हम तीसरे मोर्चे के साथ नहीं हैं."

उलझन बढ़ी

डॉ. राउत के इस बयान के दो अर्थ निकाले जा सकते हैं. एक तो यह कि उन्हें पता था कि तीसरे मोर्चे की बैठक में हिस्सा लेने के लिए पटनायक ने किसी को भेजा नहीं है. दूसरा यह कि इस प्रश्न पर पटनायक के दिमाग में क्या चल रहा है, उसका अंदाज़ा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी नहीं है.

Image caption (30 अक्टूबर को नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हुई सांप्रदायिकता के खिलाफ रैली में तीसरे मोर्चे में शामिल होने वाले संभावित दलों के नेता शामिल हुए.)

ख़ुद पटनायक ने इस विषय पर जो कहा कि उससे गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझ गई. उन्होंने कहा, "इस बारे में कोई निर्णय लेना जल्दबाजी होगी."

अगले एक हफ्ते में चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की घोषणा किए जाने की पूरी संभावना है. ख़ुद पटनायक चुनाव की घोषणा से पहले रोज़ किसी नए वर्ग के लिए रियायत की घोषणा कर रहे हैं और नए कार्यक्रमों का शिलान्यास कर रहे हैं.

ऐसे में उनका 'जल्दबाज़ी' वाला बयान हलक से उतरना कठिन साबित हो रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि वह पिछले एक वर्ष से ऐसे मोर्चे की पैरवी करते आ रहे हैं. इस बीच तीन वरिष्ठ वामपंथी नेता ए बी वर्धन, प्रकाश करात और सीताराम येचुरी ने भुवनेश्वर आकर उनसे इस संदर्भ में विस्तृत बातचीत भी की है.

तीनों नेताओं ने बीजद के साथ सीटों पर समझौते की बात कही थी. लेकिन इस बीच बीजद ने यह घोषणा कर दोनों प्रमुख वामपंथी दलों के इरादों पर पानी फेर दिया है कि पार्टी राज्य के सभी 21 लोकसभा चुनाव क्षेत्रों और 147 विधानसभा क्षेत्रों से उम्मीदवार खड़ी करेगी.

आखिर ऐसा क्या हुआ कि पटनायक अचानक तीसरे मोर्चे से पल्ला झाड़ने की फिराक़ में हैं?

इस प्रश्न का उत्तर शायद उन चुनावी सर्वेक्षणों में है, जिनके अनुसार भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के प्रति जन समर्थन लगातार बढ़ रहा है. अगर ये सर्वेक्षण सही साबित होते हैं और नरेंद्र मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री बनते हैं तो ज़ाहिर है कि तीसरे मोर्चे का दामन पकड़े रहना पटनायक के हित में नहीं होगा.

पटनायक के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य में हुए हज़ारों करोड़ों के खान और चिट फंड घोटालों की सीबीआई जांच के आदेश की संभावना.

वैसे खनिज घोटाले के मामले में सीबीआई जांच के ख़िलाफ़ पटनायक सरकार की पैरवी का संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने पूरा समर्थन किया है.

एनडीए की ओर झुकाव

चूँकि कांग्रेस की सरकार को अब डूबती नैया के रूप में देखा जा रहा है, ऐसे में पटनायक अब इस कोशिश में जुट गए हैं कि उन्हें केंद्र में बनने वाली अगली सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त हो.

पिछले कुछ दिनों में दो ऐसी घटनाएं हुईं जिसके आधार पर ये कहा जा सकता है कि पटनायक और भाजपा के बीच कुछ चल रहा है. 11 फ़रवरी को ओडिशा में अपनी पहली रैली को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने पटनायक की चुटकियां तो लीं लेकिन सीधे वार करने से कतराते हुए नज़र आए. न उन्होंने खनिज घोटाले का जिक्र किया और न ही चिट फंड घोटाले का.

मोदी से पहले भाजपा के जितने भी राष्ट्रीय नेता ओडिशा आए, किसी ने पत्रकारों की लाख कोशिशों के बावज़ूद पटनायक के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा.

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Image caption (सीपीएम नेता प्रकाश करात ने यह साबित करने की भरपूर कोशिश की है कि गठबंधन में कोई फूट नहीं है और बीजद गठबंधन के साथ है.)

दोनों पक्षों के बीच कुछ पकने का संदेश 7 फ़रवरी को राज्यसभा चुनाव के दौरान भी मिला जब राज्य के नेताओं के कड़े विरोध के बावज़ूद भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने पार्टी के सात विधायकों को राज्य के चौथी सीट के लिए बीजद समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार पद्म विभूषण रघुनाथ महापात्र को वोट देने का आदेश दिया.

यह बात और है कि भाजपा विधायकों के समर्थन के बावज़ूद महापात्र आखिरकार कांग्रेस के उम्मीदवार और आईपीएल चेयरमैन बिश्वाल से चुनाव हार गए.

इसमें अब शायद ही कोई संदेह रह गया है कि चुनाव के नज़दीक आने के साथ-साथ पटनायक का झुकाव अब एनडीए की तरफ़ है. हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि बीजद पहले की तरह राजग में शामिल होगी या सिर्फ बाहर से समर्थन देगी.

रही बात भाजपा के 'सांप्रदायिक' होने की तो उसका मुक़ाबला यह कहकर किया जा सकता है कि इस समय 'बड़ी बुराई' (कांग्रेस) को हराना पार्टी कि सबसे बड़ी प्राथमिकता है. आख़िर राज्य में कांग्रेस ही बीजद की प्रमुख विरोधी है. वैसे भी बीजद भाजपा के साथ केंद्र में ही नहीं ओडिशा में भी लगातार 11 वर्ष तक सरकार में साझेदार रही है.

बाक़ी बचा गुजरात दंगों में मोदी कि भूमिका का मुद्दा तो उस पर भी लोक जनशक्ति पार्टी नेता रामविलास पासवान ने पहले ही रास्ता दिखा दिया है.

उनकी तरह पटनायक भी यह कह पाएंगे कि "जब अदालत ने उन्हें 'क्लीन चीट' दे दी है तो हम होते कौन हैं उस पर सवाल करने वाले?"

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