गोधरा: गांधी को चरखा दिया तो देश को डांडियां

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किसी बाहरी व्यक्ति के लिए गोधरा रंग या तो हरा है या फिर केसरिया, लेकिन ट्रेन दुर्घटना के लिए कुख्यात ये शहर अपने भीतर कई रंगों को समेटे हुए है.

गुजरात में आदिवासी आबादी की अधिकता वाले ज़िले पंचमहल में स्थित गोधरा को कई वजहों से इतिहास में महत्वपूर्ण जगह हासिल है.

ये गोधरा ही था जिसने चरखे की खोज में महात्मा गांधी की मदद की. वही चरख जिससे उन्होंने भारत को एक सूत्र में बांधने के लिए धागा बुना.

अपनी आत्मकथा में गांधी 1917 में हुई गोधरा सभा का ज़िक्र करते हैं जहां उनकी मुलाकात गंगाबेन मजूमदार से हुई. गंगाबेन ने उसने वादा किया कि वो उनके लिए चरखा खोजकर लाएंगी, जिससे लोग घर में ही धागा बुन सकेंगे. आखिरकार गांधी जी को चरखा गंगाबेन ने ही लाकर दिया.

आज भी इस क़स्बे में ऐसा बहुत सी कहानियां बिखरी पड़ी हैं जो अपने साथ अन्याय और घृणा नहीं बल्कि ख़ुशियों का पैग़ाम लाती हैं.

सिनेमा और गोधरा

भारतीय सिनेमा के जनक कहे जाने वाले दादासाहब फाल्के ने अपने करियर की शुरुआत गोधरा से की थी. उन्होंने कैमरे के पीछे एक प्रोफेशनल के तौर पर अपने शुरुआती दिन गोधरा में ही बिताए थे.

धुंडिराज गोविंद फाल्के 1890 में एक पेशेवर फोटोग्राफर बनने के लिए गोधरा आए. वो यहां दो साल तक रहे. प्लेग में अपनी पहली पत्नी और बच्चे की मौत होने के बाद वो गोधरा छोड़कर चले गए.

गोधरा छोड़ने के करीब दो दशक के बाद फाल्के ने 1913 में अपनी पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाई. इस फिल्म को भारत की पहली फुल-लैंथ फिल्म माना जाता है. फाल्के ने अपने 19 साल के करियर में 95 फिल्में और 26 छोटी फिल्में बनाईं.

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गोधरा स्टेशन रोड पर स्थित फाल्के स्टूडियो को गिराकर वहां लक्ष्मी सिनेमा का निर्माण किया गया. हालांकि 1947 के दंगों में इस थियेटर में आग लग गई और अब इस जगह पर दूसरी दुकानें बन गई हैं.

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नाच-गाने की दुनिया

गोधरा की सिग्नल फालिया कालोनी के लोग शायद ही जानते हैं कि गरबा या रास में कैसे थिरका जाता है, लेकिन वो ये तय करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे कि उनकी बनाई डांडियां की रंगत में कोई कमी न रह जाए.

सिग्नल फालिया उस रेलवे पटरी से लगी एक मुस्लिम कालोनी है, जहां साबरमती एक्सप्रेस को 12 साल पहले जला दिया गया था. ये बस्ती उस समय कुख्यात हो गई जब यहां के कई लोगों को रेलगाड़ी में आग लगाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया.

हालांकि नौ साल तक चली जांच और सुनवाई के बाद इनमें से कई लोगों को बरी कर दिया गया.

इस बस्ती के कारीगर कई सालों से रंग-बिरंगी डांडियां बना रहे हैं, जो मांग देश-विदेश में है.

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रंगीन डांडियां

सिराज हुसैन चरखा बताते हैं, "मैं हर दिन करीब 400 डांडिया बनाता हूं, जिनकी मांग देश भर में है. पहले हम सादी डांडिया बनाते थे, लेकिन इन दिनों डांडिया बेहद रंगीन और चमकदार होती हैं."

आसानी से लकड़ी मिल जाने और कारीगरों की उपलब्धता के कारण डांडिया बनाने के लिए गोधरा का काफी नाम है.

केवल सिग्नल फालिया में ही 300 से अधिक ऐसे परिवार हैं जो साल भर डांडियां ही बनाते हैं.

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शाबिद याकूब बताते हैं, "अब कई परिवार डांडियां बना रहे हैं. इन दिनों कई लोग स्टील या प्लास्टिक की डांडियां से रास खेलना चाहते हैं, लेकिन परंपरागत लकड़ी से बनी डांडियां की मांग कम नहीं हुई है."

हालांकि उनमें से कोई भी डांडियां के साथ डांस नहीं करता है.

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कन्यादान कबूल है

ऐसे कई उदाहरण हैं जहां गोधरा में लोगों ने हिंदू और मुसलमान के बीच दूरी को कम करने के लिए पहल की है.

इन उपायों से न सिर्फ़ दोनों समुदायों को क़रीब लाने में मदद मिली है बल्कि इससे अभावग्रस्त लोगो को भी फ़ायदा मिला है.

गोधरा में कारोबार करने वाले सादिक तिजोरीवाला बताते हैं, "गोधरा 2002 के बाद विभाजित हो गया. 2008 में हमने हर साल फरवरी में मुसलमानों का सामूहिक विवाह करने का फैसला किया. इसके लिए आर्थिक मदद हिंदू देते थे."

तिजोरीवाला और उनके दोस्त अभी तक कुल 172 जोड़ों का विवाह कर चुके हैं और इन शादियों में स्थानीय हिंदू कन्यादान करते हैं.

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सिमटती दूरियां

एलपीजी गैस सिलेंडर एजेंसी के मालिक चंदू परमार बताते हैं, "इस साल हमने 18 जोड़ों की शादी कराई. इस काम के लिए 50 से अधिक हिंदू परिवारों ने मदद की और उन्होंने इन जोड़ों को उपहार दिए."

इस साल जिन लोगों की शादी हुई हैं उनमें यामीन नाहना भी हैं. 18 साल के यामीन 2002 में गोधरा के बाद हुए दंगों को पीड़ित भी हैं.

वो कहते हैं, "दंगों के दौरान मेरे घर को तोड़ दिया गया और मेरे परिवार वालों को मारा गया. एक दूसरे के प्रति नफरत बुरी है. मुझे एक ऐसे आयोजन में शादी करने की खुशी है जिसका मकसद हिंदू और मुसलमानों के बीच दूरी को पाटना है."

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