माओवादियों को मोहब्बत मंज़ूर, लिव-इन पर ऐतराज़

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भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(माओवादी) का कहना है कि उनके संगठन में विवाह पूर्व और विवाहेतर संबंधों की कोई जगह नहीं है.

माओवादियों ने 'लिव-इन' यानी सहजीवन जैसे संबंधों को भी सिरे से ख़ारिज किया है.

संगठन को ऐसा बयान इसलिए जारी करना पड़ा है क्योंकि उनके एक बड़े नेता जीवीके प्रसाद ने अपने 'लिव-इन रिलेशनशिप' की बात स्वीकार की है.

दरअसल जीवीके प्रसाद ने आठ जनवरी को आंध्र प्रदेश पुलिस के सामने कथित तौर से अपनी 'लिव-इन-पार्टनर' के साथ आत्मसमर्पण किया था.

प्रसाद ने आत्मसमर्पण के वक़्त अपनी 'लिव-इन-पार्टनर' संतोषी मरकाम उर्फ़ जैनी को अपनी पत्नी बताया था.

माओवादी नेताओं ने इस पर आपत्ति जताई है.

अनुशासनहीनता

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लिव-इन पर ऐतराज करने वाले माओवादियों को मोहब्बत करने वालों से परहेज नहीं है. वे मानते हैं कि संगठन में रहते हुए आपस में मोहब्बत करना ग़लत नहीं है.

लेकिन एक शर्त है. शर्त ये है कि पार्टी के कैडर न तो विवाह पूर्व संबंध बनाएं और न ही विवाहेतर संबंध. साथ ही, संगठन को 'लिव-इन रिलेशनशिप' पर भी सख्त ऐतराज है. वे इस तरह के संबंध को संगठन में 'अनुशासनहीनता' मानते हैं.

बीबीसी को भेजी गई एक विज्ञप्ति में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के दंडकारण्य विशेष जोनल कमिटी के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी का कहना है, ''पार्टी में प्यार और शादी पर पाबंदी नहीं है बल्कि कॉमरेड अपनी पसंद के मुताबिक़ जीवनसाथी चुनते हैं और संबंधित पार्टी समितियों की मंज़ूरी लेकर शादी कर लेते हैं. लेकिन शादी के पूर्व या विवाहेतर सहजीवन को मंज़ूरी नहीं है. ऐसे संबंध बनाना अनुशासनहीनता के दायरे में आता है.''

दरअसल जीवीके प्रसाद वर्ष 2006 से संगठन की दंडकारण्य विशेष जोनल कमेटी के प्रवक्ता के रूप में काम कर रहे थे. उन्हें गुड्सा उसेंडी के नाम से जाना जाता था.

संगठन का बदलता चेहरा

गुड्सा उसेंडी के बारे में कहा जाता है कि ये सिर्फ़ एक नाम है. इसके पीछे संगठन के कई चेहरे हैं.

जो भी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की दंडकारण्य विशेष ज़ोनल कमेटी का प्रवक्ता बनाया जाता है, उसे गुड्सा उसेंडी के नाम से ही पुकारा जाता है.

समय-समय पर संगठन के अलग-अलग वरिष्ठ कमांडरों को दंडकारण्य के इलाक़े में गुड्सा उसेंडी के नाम से पुकारा जाता रहा है.

गुड्सा उसेंडी नाम के पीछे की कहानी साल 2000 के जून महीने की है.

बस्तर में अबूझमाड़ इलाक़े के पोटेनार में सुरक्षा बलों ने नक्सली छापामारों के एक दल को घेर लिया था. इसमें एक 17 साल का मडिया जनजाति के छापामार भी थे, जिनका नाम गुड्सा उसेंडी था. गुड्सा उसेंडी सुरक्षा बलों का कई घंटे तक मुक़ाबला करते रहे और आखिरकार मुठभेड़ में मारे गए.

पुलिस कहती है कि उसेंडी की मौत के बाद माओवादियों ने उनका नाम ज़िंदा रखने का फ़ैसला किया. इसी वजह से नाम तो वही रहा, मगर इस नाम के पीछे संगठन के कमांडर बदलते रहे.

स्त्री-पुरूष संबंध

नए गुड्सा उसेंडी ने बीबीसी को जारी की गई विज्ञप्ति में कहा है, "जीवीके प्रसाद ने अपने आत्मसमर्पण के समय संतोषी मरकाम उर्फ जैनी को अपनी पत्नी राजे बताया था. कामरेड रामन्ना के बयान के बाद पाला बदलते हुए उन्होंने यह झूठ बोला कि उनका राजे के साथ तलाक हो गया जबकि वे साल भर से संतोषी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में थे. प्रसाद का राजे के साथ औपचारिक तलाक़ मंज़ूर नहीं हुआ था. उन्होंने पहली बार जनवरी, 2013 में कमेटी के सामने राजे के साथ उनके तनावपूर्ण संबंधों की बात रखी. औपचारिक रूप से उन्होंने तलाक का प्रस्ताव भी नहीं रखा था."

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प्रसाद आंध्र प्रदेश के वारंगल ज़िले के काडीवेल्डी के रहने वाले हैं. वे अस्सी के दशक में ही पीपुल्स वार ग्रुप में शामिल हो गए थे.

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग की दरभा घाटी में कांग्रेसी नेताओं के क़ाफ़िले पर हुए हमले के कुछ महीने बाद पिछले गुड्सा उसेंडी के पद पर रहे कट्टा रामचंद्र रेड्डी को हटा दिया गया था और उनकी जगह वेंकटा कृष्णा प्रसाद को प्रवक्ता बनाया गया था.

माओवादियों की विज्ञप्ति से एक और बात सामने आती है. वो ये कि संगठन के शादीशुदा कैडरों को भी बिना पहली पत्नी से तलाक़ लिए दूसरी शादी करने की इजाज़त नहीं है.

विज्ञप्ति में कहा गया है, "जैनी के साथ रिश्ते को छुपा कर रखना और आखिर में बिना बताए उन्हें लेकर भाग जाना दरअसल स्त्री-पुरूष संबंधों यानी नैतिक मामलों को लेकर प्रसाद के अंदर मौजूद 'पेट्टी बुर्जुआ' अराजकतावादी विचारों की ही पराकाष्ठा थी."

नसबंदी

मगर लंबे अरसे तक बस्तर के विभिन्न इलाक़ों में तैनात रहे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मयंक श्रीवास्तव का कहना है कि माओवादियों की कथनी और करनी में काफी फ़र्क़ है. वो कहते हैं कि प्रतिबंध के बावजूद संगठन के कई शीर्ष नेताओं पर लिव-इन रिलेशनशिप के आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं.

बीबीसी से बात करते हुए श्रीवास्तव ने कहा, "जिन कैडरों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया या फिर जिनकी गिरफ्तारियां हुईं, उन्होंने कई राज़ खोले हैं. मसलन, अगर दो प्यार करने वाले आपस में शादी भी कर लेते हैं तो उन्हें बच्चे पैदा करने की इजाज़त नहीं है. इसलिए महिला हो या पुरूष कैडर, सब को नसबंदी करानी पड़ती है.

माओवादी विचारधारा का समर्थन करने वाले क्रांतिकारी कवि वरवरा राव कहते हैं कि लिव-इन रिलेशनशिप की उन कैडरों को इजाज़त है जो कुंवारे हैं. शादीशुदा लोगों के लिए इस पर प्रतिबंध है.

वो कहते हैं, "कई माओवादी नेता 'लिव-इन-रिलेशनशिप' में हैं. इसमें कोई शक नहीं. मगर जो भी हैं वो शादीशुदा नहीं हैं."

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