गेस्ट हाउस में 'बंद' सुब्रत रॉय कार से दिल्ली रवाना

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सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत रॉय को लखनऊ पुलिस सोमवार को कार से दिल्ली ले गई. उन्हें मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के सामने अदालत की अवमानना के मामले में पेश किया जाएगा.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने रॉय के ख़िलाफ़ गैर-ज़मानती वारंट जारी किया था. लखनऊ पुलिस को उन्हें गिरफ़्तार कर के उच्चतम न्यायलय में पेश करना था. लेकिन लखनऊ पुलिस ने ऐसा नहीं किया.

रॉय के गैर-ज़मानती वारंट की तामील और उसके बाद का घटनाक्रम अत्यंत नाटकीय रहा था.

27 फ़रवरी को जब लखनऊ के गोमती नगर क्षेत्र की पुलिस वारंट की तामील के लिए सहारा शहर स्थित रॉय के घर पहुँची तो वे वहाँ मौजूद नहीं थे. करीब दो घंटे इंतज़ार के बाद पुलिस वापस लौट गई.

28 फ़रवरी की सुबह उच्चतम न्यायलय ने रॉय की गैर-ज़मानती वारंट को वापस लेने की याचिका को खारिज कर दिया था.

उसके बाद शुरू हुआ रॉय को गिरफ्तार करने का ड्रामा. सारा दिन इंतज़ार कराने के बाद लखनऊ पुलिस ने लगभग 5.30 बजे रॉय को लेकर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट आनंद कुमार यादव की अदालत में पेश किया.

याचिका और आदेश

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न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उच्चतम न्यायालय के आदेश को अक्षरशः लिखते हुए कहा, "प्रभारी निरीक्षक द्वारा अभिरक्षा के संबंध में आदेश निर्गत कराने की याचिका की गई है."

उन्होंने कहा, "प्रस्तुत याचिका के साथ सर्वोच्च न्यायालय का आदेश व संजीव जैन रजिस्ट्रार के पत्र दिनांक 26 फ़रवरी 2014 को पेश किया गया."

न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ध्यान में रखते हुए प्रभारी निरीक्षक गोमतीनगर को सुब्रत रॉय को उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए अधिकृत किया. ऐसा करते समय न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पुलिस से सीआरपीसी की धारा 76 के तहत कार्रवाई की अपेक्षा की.

क्या है सीआरपीसी की धारा-76? धारा 76 के अनुसार पुलिस या अन्य उस व्यक्ति को जो वारंट की तामील कर रहा हो उसे गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति को बिना अनावश्यक विलंब के अदालत के सामने प्रस्तुत करे. साथ ही इस धारा के अनुसार अदालत के सामने पेश करने में विलंब भी 24 घंटों से अधिक देर नहीं होनी चाहिए. इसमें यात्रा का समय शामिल नहीं है.

लखनऊ पुलिस ने रॉय को सीधे दिल्ली ले जाने की बजाय उन्हें उत्तर प्रदेश के वन विभाग के कुकरैल स्थित गेस्ट हाउस में रात में ठहरने की व्यवस्था करा दी.

दूसरे दिन, यानी एक मार्च को गोमतीनगर के प्रभारी निरीक्षक ने सुब्रत रॉय को चार मार्च दोपहर दो बजे तक पुलिस अभिरक्षा में रखने के लिए एक याचिका दायर की.

कोर्ट का कड़ा रुख

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इस याचिका को ख़ारिज करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट ने कठोर रुख अपनाया और अपने आदेश में लिखा, "उल्लेखनीय है कि दिनांक 28-02-2014 को उपरोक्त वारंटी सुब्रत रॉय सहारा को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया था और न्यायालय द्वारा दिनांक 28-02-2014 को आदेश पारित किया जा चुका है.

आवेदक द्वारा उक्त आदेश का अनुपालन सुनिश्चित न कर पुनः पुलिस अभिरक्षा की याचना की जा रही है. जिसका कोई आधार नहीं है और न ही क़ानून के अनुसार इसके पुनर्वालोकन का प्रावधान है. अतः आवेदक का प्रार्थना पत्र तदनुसार निस्तारित किया जाता है."

लखनऊ के सीनियर सुपरिटेंडेट ऑफ़ पुलिस प्रवीण कुमार ने एक लिखित जवाब में कहा कि यह सही नहीं है कि न्यायिक मजिस्ट्रेट के 28 फ़रवरी के आदेश का अनुपालन नहीं किया गया. उन्होंने कहा, "हम कोर्ट के 28 फरवरी के आदेश का पूर्णतः पालन कर रहे हैं."

दूसरी ओर सुब्रत रॉय ने अपने कर्मचारियों को संबोधित करते हुए एक पत्र में लिखा, "देश के कुछ लाख कर्णधार लोगों में से काफ़ी ऐसे हैं जो केवल अपने अधिकारों को पहचानते हैं, अधिकारों को ही समझते हैं लेकिन यह नहीं समझना चाहते कि अधिकार कर्तव्यों के निर्वाह के लिए दिए जाते हैं न कि अपनी सनक, मिथ्याभिमान, या लोभ-लालच को पूरा करने के लिए."

यह कहना मुश्किल है कि रॉय का इशारा सेबी की तरफ था या सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों की तरफ.

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