मुसलमानों को लुभा पाएंगी मायावती?

  • 4 मार्च 2014
बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष मायावती

मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद उत्तर प्रदेश के मुसलमान मुलायम सिंह यादव के लिए कितनी हमदर्दी रखते हैं, कहना मुश्किल है. लेकिन जहां समाजवादी पार्टी के मुखिया मुसलमानों का विश्वास जीतने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं, वहीं बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ख़ामोशी से अपने मुस्लिम मतदाताओं को आश्वस्त करने में लगी हैं.

बीते माह जमीयत-उल-उलेमा-ए-हिन्द के प्रमुख मौलाना सैय्यद अरशद मदनी (अरशद मदनी गुट) और मुलायम का सहारनपुर में एक साथ मंच पर आना सुर्ख़ियों में रहा.

यह बात और है कि उसके तुरंत बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों का मुलायम को अपने यहाँ आने से मना करना सहारनपुर की रैली से अधिक चर्चा में रहा.

यदि दंगों से पहले प्रदेश की क़ानून-व्यवस्था मुलायम सिंह यादव के लिए चिंता का विषय थी तो दंगों के बाद मुसलमानों का समाजवादी पार्टी के प्रति नाराज़गी उनकी परेशानी का कारण बनी हुई है.

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष के ठीक विपरीत आज के चुनावी माहौल में भी मायावती सुर्ख़ियों से दूर हैं.

मायावती की आख़िरी बड़ी रैली लखनऊ में 15 जनवरी को हुई थी जबकि नरेंद्र मोदी को रोकने के नाम पर मुलायम यादव अब तक लगभग 12 रैलियां कर चुके हैं.

कौन आगे?

तो क्या मुसलमानों को जीतने की दौड़ में मुलायम ने मायावती को पीछे छोड़ दिया है? और क्या उत्तर प्रदेश में मोदी को सिर्फ़ मुलायम सिंह ही रोकने में सक्षम हैं?

यह सही है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में मायावती को 27.42 प्रतिशत वोट मिलने के बावजूद 80 में से केवल 20 सीटें मिली थीं. वहीं समाजवादी पार्टी का वोटों में हिस्सा मात्र 23.26 प्रतिशत था और लेकिन उन्हें 23 सीटें मिली थीं.

वहीं 2004 में 24.61 प्रतिशत वोट के साथ बसपा को 19 सीटें मिली थीं जबकि सपा को 26.74 प्रतिशत वोट और 35 सीटें मिली थीं.

उत्तर प्रदेश में 2007 के विधानसभा चुनाव में सपा का प्रदर्शन मुस्लिम बाहुल्य 140 सीटों में बहुत प्रभावशाली रहा. पार्टी को 140 में से 72 सीटें मिली.

आंकड़े तो निश्चित ही मुलायम के पक्ष में नज़र आते हैं. लेकिन बसपा के प्रवक्ता रामअचल राजभर कहते हैं कि सपा के पास इस समय एक भी मुस्लिम लोकसभा सांसद नहीं है जबकि बसपा के पास कुल छह सांसद हैं. इनमें से दो राज्यसभा और चार लोकसभा के सदस्य हैं.

राजभर कहते हैं, "अगर मुसलमान मुलायम के साथ हैं और मुलायम उनके सबसे बड़े हितैषी हैं तो क्या कारण है कि सपा के पास एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है?"

यदि ऐसा होता तो सोमवार शाम पत्रकारों से लखनऊ में अनौपचारिक बातचीत में भाजपा के उत्तर प्रदेश के प्रभारी अमित शाह बसपा को अपना मुख्य प्रतिद्वंदी नहीं कहते.

शाह ने कहा, "कांग्रेस और समाजवादी पार्टी तीसरे और चौथे स्थान पर रहेंगी."

सुर्खियों से परे

बहुजन समाज पार्टी प्रवक्ता राजभर कहते हैं कि मुसलमान सपा और भाजपा की नूरा कुश्ती देख रहे हैं और समझ रहे हैं.

वे कहते हैं, "जब-जब प्रदेश में मोदी की रैली होती है, मुलायम भी जनसभा संबोधित करते हैं. दोनों ही समाज को विभाजित करके चुनाव जीतना चाहते हैं. बहन मायावती सर्वजन और सर्वधर्म में विश्वास करती हैं."

भीड़ और चुनाव के शोर से दूर मायावती योजनाबद्ध तरीक़े से आगामी लोकसभा चुनाव की रणनीति बनाने में व्यस्त हैं.

मायावती की आख़िरी बड़ी रैली लखनऊ में 15 जनवरी को हुई थी.

राजभर बताते हैं कि मायावती मुसलमान भाइयों पर काम कर रही हैं और पार्टी बहुत जल्दी एक पुस्तिका बांटेगी जिसमें मायावती द्वारा मुसलमानों के लिए किए गए कार्यों का ब्यौरा होगा.

रामअचल राजभर कहते हैं, "वे मुलायम की तरह दिखावे की राजनीति नहीं करती हैं. यह लोग तो मीडिया में दिखावा ज़्यादा करते हैं. "

राजभर अखिलेश यादव की सरकार को 200 से ज़्यादा दंगों के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं और कहते हैं कि मायावती के शासनकाल में एक भी दंगा नहीं हुआ था.

हालांकि समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने हाल ही में बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा था कि सपा से मुसलमानों की कोई नाराज़गी नहीं है और उनका समर्थन पहले की तरह बरक़रार है.

राजेंद्र चौधरी का कहना था कि मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद भी मुसलमान सपा के साथ हैं.

ये सही है कि मायावती मीडिया से एक लंबी दूरी बना कर रखती है. लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वे अपने वोटर को रिझाने में कोई कसर छोड़ेंगी. विशेषकर ऐसे माहौल में जहाँ धर्म और जाति के नाम पर ही राजनीति हो रही हो.

मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद 'मौलाना' मुलायम का मुसलमानों में दबदबा पहले से कम तो अवश्य हुआ है और कांग्रेस तो कहीं रेस में नज़र नहीं आती. ऐसे में मुस्लिम वोटों के मायावती के पास जाने की संभावना शायद ज़्यादा है.

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