एक अकेली औरत!

  • 7 मार्च 2014
सुरुचि शर्मा

सुरुचि शर्मा की उम्र 28 साल है, वह मुंबई में एक अच्छे पद पर कार्यरत हैं और उनकी अभी तक शादी नहीं हुई है. वह कहती हैं कि पुरुष हो या महिला, अगर आपको अच्छी शिक्षा मिली हो और थोड़ी चतुराई का इस्तेमाल करें तो भारत में मौकों की कमी नहीं है और आपको एक बढ़िया वेतन वाली नौकरी मिलने की संभावना रहती है.

लेकिन अगर आप महिला हैं तो इन हालात में भी ये ज़रूरी है कि 20 की उम्र पार करने के कुछ साल के अंदर आपकी शादी हो जानी चाहिए.

अगर 30 साल के क़रीब पहुंचते-पहुंचते भी आपकी शादी नहीं हुई है, तो लोग आपसे सहानुभूति जताते हैं, सवाल करते हैं, आपसे पूछा जाता है कि क्या आपको कोई मिला नहीं और आपको एक नाक़ामयाब इंसान समझा जाता है.

भारत में इस आयु वर्ग की हर अविवाहित महिला को इस तरह के सवालों और बातचीत का सामना लगभग हर वक़्त करना पड़ता है.

(दाढी वाली महिलाः मुझे ख़ुद से प्यार है)

मैं एक शहरी मध्यम वर्ग परिवार से हूं. मेरा बचपन वडोदरा में बीता, कॉलेज की पढ़ाई वडोदरा और दिल्ली में हुई और अब मुंबई में एक बड़ी कंपनी में डिजीटल कम्युनिकेशन विभाग की प्रमुख हूं.

मेरी ज़िंदगी उन बहुत सी युवतियों की तरह है जो काम के लिए घर से दूर रहती हैं. अकेले रहना एक ग़ज़ब का अनुभव है.

शादी का दबाव

मैं आत्मनिर्भर हूं और मेरी जीवनशैली ऐसी है जिसका मैं हमेशा सपना देखती थी. भारतीय महिलाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने और आगे बढ़ने के मौका मिल रहा है. हमें हर क़दम पर लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है लेकिन हम फिर भी रास्ता ढूंढ लेती हैं और आगे बढ़ जाती हैं.

लेकिन फिर भी भारत में लड़कियों पर शादी दबाव हमेशा रहता है. हमसे हमेशा पूछा जाता कि हम कब शादी करेंगे. भारत में एक लड़की की पहचान और व्यक्तित्व शादी के इर्द-गिर्द घूमता है और बचपन से ही हमें समझाया जाता है कि बड़े होकर हमें शादी करनी होगी और दूसरे परिवार में बहू बन कर जाना होगा.

हम जो भी सीखते हैं, वो भविष्य में एक पत्नी और बहू की भूमिका को ध्यान में रखकर सिखाया जाता है. हमें खाना बनाना, घर के काम करना, अच्छा बर्ताव करना और सही छवि बनाना सिखाया जाता है.

अगर आप शादी की किसी वेबसाइट पर नज़र डालें तो उपयुक्त वधू के लिए 'फैमिली-ओरिएंटेड', 'घरेलू' और 'बहुत ज़्यादा नौकरी या करियर में दिलचस्पी नहीं लेने वाली' जैसे गुण पाएंगे. हर कोई ऐसी पत्नी चाहता है जिसकी करियर से पहले गृहस्थी में दिलचस्पी हो.

(भारतीय महिलाएंः एक सदी का सफर)

किसी भी पुरुष की ज़िंदगी में आदर्श महिला बनने के लिए ज़रूरी है कि उसे अच्छी शिक्षा मिली हो, वह देखने में आकर्षक हो, उसका एक बढ़िया करियर हो और इसके बावजूद वह इस सबको ठंडे बस्ते में डालने के लिए भी तैयार हो.

Image copyright AFP
Image caption भारत में लड़कियों पर शादी दबाव हमेशा रहता है. एक लड़की की पहचान और व्यक्तित्व शादी के इर्द-गिर्द घूमता है.

सही साथी का इंतज़ार

मैंने शादी इसलिए नहीं की क्योंकि मुझे अब तक उन्हें अपने लिए सही साथी नहीं मिला है. सुनने में शायद ऐसा लगे कि मैं शादी के ख़िलाफ़ हूं लेकिन ऐसा नहीं है.

भारतीय मान्यताओं के मुताबिक तो अब तक मेरी शादी हो जानी चाहिए थी और इस मामले में अब देर हो गई है. शादी के लिए योग्य महिलाओं की सूची में मैं शायद काफ़ी नीचे हूं. लेकिन मैं फिर भी 'सिर्फ़ घर बसाने' के लिए कोई समझौता नहीं करना चाहतीं और किसी से भी शादी नहीं करना चाहती.

मेरे लिए कौन सा व्यक्ति सही या उपयुक्त है, इसका फ़ैसला दूसरों को नहीं बल्कि मुझे करना है.

भारत में आज भी एक महिला के लिए अविवाहित होना एक धब्बा है. अगर कोई महिला अपनी मर्ज़ी से शादी नहीं करती, तो ये मान लिया जाता है कि वह इज़्ज़तदार नहीं है.

मुश्किलें

सुरुचि बताती हैं कि कई बार उन्होंने किसी बढ़िया इलाक़े में किराए पर मकान लेने की कोशिश की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.

अकेली, कामकाजी महिला को लोग मकान किराए पर नहीं देना चाहते. उन्हें डर होता है कि मुझ जैसी महिला का बर्ताव अनैतिक होगा, मेरे घर में पार्टियां होंगी, रात भर पुरुष रहेंगे और मैं आस-पास के परिवारों पर बुरा असर डालूंगी. कोई ये सोच भी नहीं सकता कि मैं एक सामान्य इंसान हो सकती हूं जो एक सामान्य जीवन बिता रही है.

(लाख की खेती बदल रही है इन महिलाओं की ज़िंदगी)

मकान मालिक अकेली महिला किराएदारों को निकालने का मौका हमेशा तलाशते रहते हैं. थोड़ी सी भी कमी या भूल होने पर उन्हें मकान खाली करने के लिए कहा जाता है. अकेली महिला के लिए हर जगह क़ायदे-क़ानून हैं और हम सामान्य जीवन नहीं बिता सकतीं.

दूसरे शब्दों में, ये मान लिया जाता है कि अपने परिवार से दूर, एक स्वतंत्र जीवन बिता रहीं अकेली महिला चरित्रहीन होगी.

जितना ज़्यादा समय मैं इस तरह की ज़िंदगी बिताउंगी, उतना ही एक प्रतिष्ठित परिवार में मेरी शादी होनी की संभावना कम होगी. कई बार मैं सोचती हूं कि अपने माता-पिता को लोगों की बातें सुनने से बचाने के लिए क्या मैं समझौता कर लूं और किसी ठीक-ठाक इंसान से शादी कर लूं.

मैं ख़ुशकिस्मत हूं क्योंकि मेरे माता-पिता मेरा पूरा साथ देते हैं.

Image caption सुरुचि शर्मा ख़ुद को ख़ुशकिस्मत मानती हैं कि उनका परिवार उनका पूरा साथ दे रहा है.

परिवार का सहयोग

जब मैं सही इंसान के लिए इंतज़ार करने की बात करती हूं तो मेरे माता-पिता मेरा साथ देते हैं. लेकिन उन पर भी रिश्तेदारों और जान-पहचान के लोगों का बहुत ज़्यादा दबाव है. उनसे हर रोज़ पूछा जाता है, 'सुरुचि कब शादी कर रही है?' और इस तरह के सवालों से वे परेशान हो जाते हैं.

वे सोचने लगते हैं कि अपनी बेटी को ख़ुद फ़ैसले करने की छूट देकर वे कहीं कुछ ग़लत तो नहीं कर रहे. उन्हें नहीं लगता कि अगर मैंने शादी नहीं की तो भारतीय समाज मुझे ख़ुशहाल ज़िंदगी बिताने देगा.

इन दबावों से जूझने के लिए मैं अपनी मां-बाप की शुक्रगुज़ार हूं. मुझे अपने बारे में इतनी चिंता नहीं है लेकिन मैं हमेशा सोचती हूं कि अपने मां-बाप के लिए कैसे हालात कैसे आसान बना सकती हूं.

जब तक मैं इस समाज का हिस्सा हूं, तब तक मुझ पर शादी करने का दबाव बढ़ता रहेगा. सच कहूं तो अगर मैं अगले एक-दो साल में शादी नहीं करती, तो मैंने विदेश जाने के बारे में भी सोचा है.

समाज की ताक-झांक और दखलअंदाज़ी से बचने और एक शांत ज़़िंदगी बिताने का एकमात्र तरीक़ा भारत से चले जाना ही है. अगर मैं किसी दूसरे देश में रहूंगी तो लोग मुझसे मेरी शादी की योजना के बारे में नहीं पूछेंगे. मुझे लगता है कि विदेश में शादी करने का दबाव इतना नहीं होता.

28 साल की उम्र में अविवाहित होना आसान नहीं है. मैं इस दबाव को 24 घंटे सहती हूं. मैंने इसके साथ रहने का फ़ैसला किया है.

(बीबीसी हिंदी की रूपा झा से बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार