'देशद्रोह का मामला अज्ञानता और मूर्खता दोनों है'

  • 7 मार्च 2014
सुभारती विश्वविद्यालय मेरठ

उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक निजी विश्वविद्यालय के कुछ कश्मीरी छात्रों पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया था. हालांकि गुरुवार देर शाम इसे वापस भी ले लिया गया. इन छात्रों पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया जाना क़ानूनी तौर पर कितना वाजिब था. इसी मसले को लेकर बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने बात की उत्तर प्रदेश के डीजीपी रह चुके वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी प्रकाश सिंह से.

किसी देश के पक्ष में नारा लगाने के कारण इन लड़कों के ऊपर देशद्रोह का मामला दर्ज करना कहाँ तक सही था?

मुझे लगता है कि वो लड़के हैं, उनमें अनुभव की कमी है, परिपक्वता की कमी है. ये उनका ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बर्ताव था, मैं इसे यहीं तक सीमित करना चाहूँगा. मैं समझता हूँ कि स्थानीय अधिकारियों का इन लड़कों पर देशद्रोह का मामला दर्ज करना कुछ ज़्यादा ही था. इसका कोई औचित्य नहीं बनता. इन लड़कों के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए कोई दंडात्मक कार्रवाई करके मामले को वहीं ख़त्म कर देना चाहिए था. देशद्रोह का मामला तो नहीं बनता है. इसे न्यायोचित ठहराना मुश्किल होगा.

क़ानूनी तौर पर देशद्रोह क्या है?

देशद्रोह का मतलब देश की संप्रभुता, अखण्डता और एकता को चुनौती देने के लिए ऐसी कोई कार्रवाई करना जिसमें संज्ञेय अपराध का मामला बनता हो, जैसे देश के ख़िलाफ़ हथियार उठाना इत्यादि. ऐसी कोई कार्रवाई जिससे भारत के अस्तित्व को चुनौती दी जाए.

(सुरक्षा के लिए किया कश्मीरी छात्रों को सस्पेंड)

यह खेल का मामला है. अगर खेल के मामले में किसी ने पाकिस्तान को सेलिब्रेट किया तो मैं इसे आपत्तिजनक ज़रूर मानता हूँ क्योंकि उनकी नीयत साफ़ नहीं थी लेकिन मैं इसे देशद्रोह नहीं कहना चाहूँगा.

खेल में पाकिस्तान के समर्थन करने में आपत्तिजनक क्या है. हो सकता है कि हिन्दुस्तान में कुछ लोगों को आफ़रीदी पसंद होगा, पाकिस्तान में कई लोग सचिन के फ़ैन होंगे?

इसका अतिसरलीकरण करना ठीक नहीं होगा. यह मामला केवल खेल के प्रदर्शन के सेलिब्रेशन का नहीं है. इसके पीछे का कारण है कि उनके दिल की गहराइयों में कहीं न कहीं पाकिस्तान के प्रति झुकाव है और हिन्दुस्तान के प्रति विद्वेष की भावना है जो क्रिकेट का मौक़ा लेकर इस रूप में सामने आई है. इसलिए यह आपत्तिजनक ज़रूर है लेकिन इसे इतना नहीं खींचा जा सकता कि इसे देशद्रोह कहा जाए.

Image caption बिनायक सेन पर भी देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया था.

मैच के दौरान आपने ताली बजा दी यहाँ तक तो ठीक है लेकिन जैसा की अख़बारों में छपा उससे लगता है कि पाकिस्तान के जीतने से ज़्यादा उनके लिए भारत का हारना ख़ुशी की बात हो गई. आप रहते इस देश में हैं. प्रधानमंत्री की एक विशेष योजना के तहत आपको पढ़ने की सुविधा दी गई है जबकि आपकी लॉयल्टी, आपका झुकाव पाकिस्तान की तरफ़ है.

(मेरठः पाकिस्तान के पक्ष में नारों की जाँच शुरू)

हम जानते हैं कि पाकिस्तान कश्मीर में रोज़-रोज़ घुसपैठ करता है, हिंसात्मक कार्रवाई करता है, लोगों को भटकाता है. इसलिए यह आपत्तिजनक तो ज़रूर है. लेकिन यह इतना ही आपत्तिजनक है कि उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए. उनको कुछ दंड दिया जाए, उन्हें यह एहसास दिलाया जाए कि आपका व्यवहार ग़लत था. बात वहीं पर ख़त्म की जाए.

उन पर देशद्रोह का आरोप लगाना सही नहीं है. क़ानूनी तौर पर इसे साबित करना संभव नहीं. देशद्रोह का मामला दर्ज करने से इन लड़कों में अलगाव का भाव और बढ़ जाएगा. उनके दिल में एक ऐसा घाव बन जाएगा जिसको वो शायद जल्दी भुला नहीं पाएँगे.

देशद्रोह के आरोप का दुरुपयोग होता है. पहले भी कई लोगों पर ऐसे आरोप लगाए गए हैं.

मेरा मानना है कि देशद्रोह का प्रावधान होना ही चाहिए. बहुत अफ़सोस की बात है कि इस देश में बहुत से लोग ऐसे हैं जिनकी गतिविधियाँ देशद्रोह की श्रेणी में आती हैं. बहुत से लोगों की कार्रवाई देशद्रोह की होती है फिर भी उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. लेकिन देशद्रोह के प्रावधान का उपयोग बड़े विवेक से, बहुत सोच-समझकर एकदम तराज़ू में तौल कर करना चाहिए. इसका राजनीतिक कारणों से या अविवेक या मूर्खतावश प्रयोग नहीं करना चाहिए. मैं समझता हूँ इस मामले में देशद्रोह के प्रावधान का प्रयोग अज्ञान और मूर्खता दोनों का सम्मिश्रण था.

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