चली तो अकेली ही थी, कारवां बढ़ता गया..

सिंधु ताई
Image caption (सिंधु ताई पिछले 32 सालों से महाराष्ट्र के विभिन्न इलाकों में कई अनाथालय खोल चुकी हैं)

आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है और हम आपको मिलवा रहे हैं पांच ऐसी महिलाओं से जिन्होंने अकेले ही अपने सफ़र की शुरुआत की और ना सिर्फ़ अपने लक्ष्य को हासिल किया बल्कि दूसरों की ज़िंदगी में भी सकारात्मक बदलाव लाने में कामयाब हुईं.

सिंधु ताई

सिंधु ताई पिछले 32 सालों से महाराष्ट्र के विभिन्न इलाकों में कई अनाथालय चला रही हैं. लेकिन इसके पीछे इन्हें लंबा संघर्ष करना पड़ा.

वर्धा ज़िले के नवरगांव की रहने वाली सिंधु ताई ने बीबीसी को बताया, “मेरे ससुराल वालों का बर्ताव मेरे प्रति अच्छा नहीं था. जब मैं सिर्फ़ 20 साल की थी तब मुझे मेरी 10 दिन की बच्ची के साथ घर से निकाल दिया गया.”

सिंधु ताई के मुताबिक़ उन्हें अपनी और बेटी का पेट भरने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा और भीख तक मांगनी पड़ी, लेकिन एक दिन उन्हें लगा कि ये सही तरीक़ा नहीं है ज़िंदगी बिताने का और कुछ ऐसा करना चाहिए कि अपने साथ-साथ दूसरों की ज़िंदगी भी संवारी जा सके.

(बाइकरनी के करतब)

शुरुआत में वो दूसरों के घर काम करके जो पैसे कमाती थीं उस से उन्होंने एक छोटा सा अनाथालय सड़क के किनारे ही खोला जिसमें 3-4 अनाथ बच्चों को उन्होंने गोद ले लिया. उनकी हिम्मत देखकर लोग उनसे जुड़ते गए.

Image caption सिंधु ताई के अनाथालयों में दो हज़ार से ज़्यादा बच्चे हैं.

उन्हें अपने इस नेक काम के लिए चंदा भी मिलने लगा जिससे धीरे-धीरे करके सिंधु ताई ने और भी अनाथालय खोलने शुरू कर दिए.

आज उनके महाराष्ट्र के मुंबई के अलावा, वर्धा, अमरावती और पुणे में भी अनाथालय हैं, जहां दो हज़ार से ज़्यादा बच्चे हैं. सिंधु ताई की बेटी डॉक्टर है जो उनकी इस काम में मदद करती है.

(हर दिन हमारा है!)

अब पुणे में रह रहीं सिंधु ताई बताती हैं, “आज मेरी टीम में डॉक्टर, शिक्षक और वकील भी हैं जो इन अनाथालयों को संभालने में और बच्चों के लालन-पालन में मेरी मदद करते हैं.”

सिंथु ताई को उनकी इस मुहिम के लिए कई सम्मान मिल चुके हैं. वो विदेश जाकर अपने संस्थाओं के लिए चंदा भी इकट्ठा करती रही हैं.

सिंधु ताई सभी महिलाओं को संदेश देते हुए कहती हैं, “जीना सीखो और दूसरों के लिए मिसाल बनो. मां कभी थकती नहीं, वो हमेशा आगे बढ़ती रहती है.”

चेतना गला सिन्हा

Image caption मनन सहकारी देसी बैंक की सदस्यों के साथ इसकी संस्थापक चेतना गला सिन्हा.

चेतना गला सिन्हा ने देसी महिला बैंक की शुरूआत महाराष्ट्र के अकाल ग्रस्त इलाकों में की. उन्होंने साल 1994 में मनन देसी बैंक खोलने की मुहिम शुरू की.

उनके बैंक में ज़्यादातर उन ग्रामीण महिलाओं के अकाउंट्स हैं जो छोटा मोटा काम करके अपनी आजीविका चलाती हैं.

देसी बैंक की शुरुआत कैसे हुई ये बताते हुए चेतना ने बीबीसी से कहा, “एक दफ़ा एक गांव की महिला ने मुझसे कहा कि वो तीन रुपए रोज़ाना जमा करना चाहती है. लेकिन इतनी छोटी रकम के लिए कोई बैंक उसका खाता नहीं खोल रहा था. तब मुझे लगा कि क्या ग़रीब महिलाओं को जो मेहनत करके अपनी रोज़ी रोटी चलाती हैं, बैंक में खाता खोलने का अधिकार नहीं है. वो महिला सरकार से कुछ मांग नहीं रही थी, सिर्फ़ अपना खाता खोलना चाहती थी उस पर भला क्या दिक़्क़त हो सकती है.”

Image caption (मनन सहकारी देसी बैंक में छोटा मोटा व्यवसाय करने वाली क़रीब 18 लाख खातेदार हैं)

चेतना ने बताया कि तब उन्होंने रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया में पूछताछ की कि आख़िर बैंक खोलने के लिए क्या करना पड़ता है ? तब उन्हें पता चला कि गांव की महिलाएं मिलकर सहकारी बैंक खोल सकती हैं.

तब चेतना ने गांव की महिलाओं को इकट्ठा किया. सबने मिलकर बैंक के लिए जमा पूंजी तैयार की और रिज़र्व बैंक में लाइसेंस के लिए अप्लाई कर दिया.

1997 में सतारा ज़िले के एक छोटे से गांव में पहले मनन देसी बैंक की स्थापना हुई. चेतना बताती हैं, “हमने 1,500 महिलाओं के साथ शुरुआत की लेकिन आज हमारे 18 लाख से ज़्यादा खातेदार हैं. ये बैंक सिर्फ़ बचत या कर्ज़ ही नहीं देती बल्कि कोई नया व्यवसाय शुरू करने का प्रशिक्षण भी देती हैं.”

इस बैंक से जुड़ी महिलाओं का अपना रेडियो स्टेशन भी है जिसका नाम है तरंगिनी रेडियो जिस पर ये महिलाएं बैंक से जुड़ी स्कीम के अलावा अपने व्यवसाय का प्रचार भी करती हैं और बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कार्यक्रमों का भी प्रसारण किया जाता है.

शीतल पोल

Image caption मुंबई पुलिस में कॉन्स्टेबल शीतल पोल ने चलती ट्रेन से कूद कर एक चोर को पकड़ा.

मुंबई के मानखोर इलाके में रहने वाली शीतल पोल हिंदी फ़िल्मों की ज़बरदस्त दीवानी हैं. इन्होंने बॉलीवुड की कई हिंदी फ़िल्में देखीं जिनमें हीरो पुलिस अफ़सर बन खलनायकों की चटनी बना देता है.

इसी से प्रेरणा लेकर इन्होंने भी पुलिस में भर्ती होने का फ़ैसला कर डाला. शीतल की मेहनत रंग लाई और 2012 में वो पुलिस सेवा में आ गईं. नागपुर में ट्रेनिंग ली और इसी साल इनकी पोस्टिंग कॉन्स्टेबल के तौर पर मुंबई में हो गई.

फिर नौ फ़रवरी को इन्होंने एक ऐसा करनामा कर डाला जिसका फ़क्र इन्हें आने वाले समय में होगा.

शीतल ने घर जाने के लिए रात तक़रीबन 10 बजे छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से ट्रेन पकड़ी. वो महिला कंपार्टमेंट में थी जिसमें उस वक़्त इतनी भीड़ नहीं थी. शीतल के मुताबिक़ अचानक एक चोर डब्बे में घुसा और एक महिला के गले से सोने का हार खींचकर ट्रेन से कूद गया.

ये देखकर शीतल भी ट्रेन से कूद गई और उस चोर का पीछा करना शुरू किया. और उसे दबोच लिया. फिर उसे पुलिस स्टेशन ले आईं.

शीतल के मुताबिक़, “वो महिला अपना हार वापस लेने आई और फिर वहां मौजूद सारे लोगों ने तालियां बजाकर मेरी हौसला अफ़ज़ाई की. शीतल पोल की मई में शादी होने वाली है, वो कहती हैं, “आगे भी अपने फ़र्ज़ और ड्यूटी को निभाने के लिए जान जोखिम में डालनी पड़े तो पीछे नहीं हटूंगी. हम पुलिस सेवा में भर्ती होते हैं लोगों जान-माल की सुरक्षा करने. फिर हम भला कैसे पीछे हट सकते हैं.”

शीतल सलमान ख़ान की ज़बरदस्त प्रशंसक हैं लेकिन कहती हैं, “पर्दे पर सलमान पुलिस की वर्दी पहनकर जो गुंडों का हाल करते हैं वो काम मैं असल ज़िंदगी में करना चाहती हूं.”

दहेज़ के खिलाफ लड़ने वाली रानी

Image caption (दहेज़ प्रथा के ख़िलाफ़ लड़ने वालीं रानी अपने पति पवन त्रिपाठी के साथ आमिर ख़ान के शो 'सत्यमेव जयते' में आईं)

मुंबई में रहने वाली रानी तिवारी ने दहेज़ के ख़िलाफ़ जो क़दम उठाया उसने उन्हें लड़कियों की हीरो बना दिया. उन्होंने चार साल पहले अपने ससुराल वालों का स्टिंग ऑपरेशन किया जो कई समाचार चैनलों में प्रसारित हुआ.

वो साल 2012 में आमिर ख़ान के बहुचर्चित टीवी शो 'सत्यमेव जयते' में भी आ चुकी हैं. रानी ने बताया कि साल 2009 में जब उनकी शादी तय हुई तो इसके तुरंत बाद लड़के वालों ने उनके पिता से तरह-तरह की मांग करनी शुरू कर दीं जिसे उनके पिता चुपचाप पूरा करते चले गए.

फिर शादी से एक सप्ताह पहले उन्होंने अचानक एक महंगी कार की मांग कर दी. उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं दी. लड़के वालो ने धमकी दी कि उनकी मांग पूरी नहीं की गई तो शादी तोड़ दी जाएगी.

रानी बताती हैं, “एकबारगी तो मुझे ख़्याल आया कि मेरी वजह से मेरे पिता और भाई को इतनी परेशानी झेलनी पड़ रही है तो मैं ख़ुदकुशी क्यों ना कर लूं. फिर मैंने सोचा कि इसमें मेरी क़्या ग़लती है. तब मैंने लड़के वालों को सबक सिखाने की ठानी.”

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Image caption (रानी त्रिपाठी ने अब अपनी मर्ज़ी से शादी की है. उनका दो साल का बेटा भी है)

रानी ने एक बार फिर अपने पिता और भाई को लड़के के परिवार वालों के पास बात करने के लिए भेजा और उनकी शर्ट में एक ख़ुफ़िया पेन कैमरा लगा दिया. जो भी बातचीत हुई वो कैमरे में रिकॉर्ड हुई.

शीतल बताती हैं, “मैं ने मीडिया का साथ लेकर लड़के के परिवार वालों को बेनक़ाब करने का फ़ैसला किया. मुझे मीडिया का साथ मिला और मैं अपने मक़सद में कामयाब हुई.”

उन्होंने बताया कि जब उनकी कहानी का आमिर ख़ान को पता चला तो उन्होंने अपने शो में उन्हें बुलाया. रानी कहती हैं, “आमिर ख़ान ने मेरी बड़ी हौसला अफ़ज़ाई की. वो मुझे रानी लक्ष्मी बाई कहते हैं.”

रानी की कहानी टीवी पर देखने के बाद उनके वर्तमान पति पवन त्रिपाठी ने उनका पता खोज निकाला और उनसे शादी की. रानी आज एक ख़ुशहाल पारिवारिक ज़िंदगी बिता रही हैं. उनका एक दो साल का बच्चा भी है.

वो दहेज़ प्रथा के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई को आगे भी जारी रखना चाहती हैं.

डॉक्टर अरमिडा फर्नांडिंस

Image caption (अरमिडा फर्नांडिस ने 25 साल पहले मुंबई में ह्यूमन मिल्क बैंक की स्थापना की थी)

डॉक्टर अरमिडा फर्नांडिस ने 25 साल पहले मुंबई के सायन इलाके में ह्यूमन मिल्क बैंक शुरू किया. झोपड़ पट्टी में रहने वाली ग़रीब महिलाओं के छोटे-छोटे बच्चों को जिन्हें समुचित मात्रा में मां का दूध नहीं मिल पाता उन्हें इस ह्यूमन मिल्क बैंक से दूध मुहैया कराया जाता है.

अरमिडा बताती हैं, “कई बार कुपोषण की वजह से इन ग़रीब महिलाओं का दूध पौष्टिक नहीं होता या समुचित मात्रा में नहीं होता. मैंने ऑक्सफ़ोर्ड और बर्मिंघम में देखा था कि वहां मां के दूध को प्रिज़र्व करके रखा जाता है तब मुझे भी भारत में ऐसा ही मिल्क बैंक शुरू करने का आइडिया आया.”

अरमिडा ने दावा किया कि मिल्क बैंक का दूध पीने की वजह से बच्चों के स्वास्थ्य पर काफ़ी सकारात्मक असर पड़ा और कुपोषण की वजह से नवजात बच्चों की मौत की दर में भी ख़ासी कमी आई.

अरिमडा ने बताया कि उनके मिल्क बैंक में कई महिलाएं स्वेच्छा से दूध देने आती हैं क्योंकि कई महिलाओं के शरीर में ज़्यादा दूध का उत्पादन होता है और अगर उसका समुचित इस्तेमाल ना हो तो महिलाओं की स्तन संबंधी समस्याएं आ सकती हैं.

क्या कभी इस काम में समस्याएं पेश नहीं आती. इसके जवाब में अरमिडा ने कहा, “कई बार महिलाएं अपने बच्चों को किसी और का दूध नहीं पिलाना चाहतीं. तो हम उन्हें यूं समझाते हैं कि जब भगवान कृष्ण मां यशोदा का दूध पी सकते हैं तो उनके बच्चे किसी और का दूध क्यों नहीं पी सकते. ये बात ग्रामीण इलाके की महिलाओं को समझ आ जाती है.”

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