सामने आई भारत की छोटी सोच: पाक मीडिया

  • 9 मार्च 2014
आम चुनावों का एलान

पिछले दिनों आम चुनावों की घोषणा जहां भारतीय उर्दू अख़बारों में चर्चा का सबसे अहम मुद्दा रही, वहीं पाकिस्तान के कुछ उर्दू अख़बारों ने भी इस विषय पर संपादकीय लिखे.

दिल्ली से छपने वाले हिंदोस्तान एक्सप्रेस ने लिखा है कि आम चुनावों की घोषणा के साथ राजनीतिक पारे में ज़्यादा ही तेज़ी आ गई है.

ख़ासकर बिहार को लेकर अख़बार लिखता है कि लालू प्रसाद यादव को कल तक करिश्माई नेता माना जाता था लेकिन बदले राजनीतिक परिदृश्य में उनकी सियासी हैसियत पर विश्लेषक विचार कर रहे हैं.

अख़बार कहता है कि कुछ दिन पहले राष्ट्रीय जनता दल के कई विधायकों के पार्टी छोड़ने की ख़बर आई थी तो अब रामकृपाल ने पार्टी से नाता तोड़ लिया है.

लालू यादव तो ख़ैर चारा घोटाले में दोषी करार दिए जाने के कारण नहीं लड़ सकते हैं.

वामपंथियों की हालत

चुनावों के मद्देनज़र राष्ट्रीय सहारा का संपादकीय है- वामपंथियों की बुरी गत. अख़बार के अनुसार वामपंथियों ने हाल में एक तीसरा मोर्चा बनाया, लेकिन उसका बिस्मिल्लाह ही ग़लत साबित हुआ.

इन चुनावों में भी वामपंथी दल तीसरे मोर्चे को लेकर सक्रिय हैं

संपादकीय में लिखा गया है कि नवीन पटनायक की बीजू जनता दल और असम गण परिषद जैसी पार्टियां जहां इसकी घोषणा के लिए बुलाई बैठक से ग़ैर हाज़िर रहीं, वहीं तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके भी इससे अलग हो गई है.

हमारा समाज ने आम चुनावों के मद्देनज़र मुस्लिम धार्मिक संगठनों की ज़िम्मेदारी का ज़िक्र किया है.

अख़बार कहता है कि उन्हें सभी पार्टियों के घोषणापत्रों का गहराई से जायज़ा लेना चाहिए और उन्हीं पार्टियों को कामयाब बनाने की कोशिश की जाए जो मुसलमानों के कल्याण, उनके शैक्षिक और आर्थिक पिछड़नेपन को दूर करने, सरकारी नौकरियों में उनकी भागीदारी बढ़ाने और सियासी तौर पर उन्हें बराबरी का हक दिलाने की बात करती हैं.

तंग नज़रिया

रुख़ पाकिस्तान का करें तो, भारत में आम चुनावों की तारीख़ों के एलान पर एक्सप्रेस ने संपादकीय में लिखा है कि तमाम सर्वे और विश्लेषक कांग्रेस की हार की भविष्यवाणी कर रहे हैं जबकि गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को बढ़त हासिल है.

लेकिन अख़बार का कहना है कि आम आदमी पार्टी के आने से पूरा खेल दिलचस्प हो गया है.

भारत में जारी चुनावी गहमागहमी का ज़िक्र करते हुए अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान को चुनाव से पहले ही ऐसी नीतियां अपनानी चाहिए जिनसे भारत में जीत कर आने वाली पार्टी या गठबंधन पाकिस्तान के साथ विवादित मुद्दों पर बातचीत के लिए सकारात्मक रवैया अपनाए.

इसके अलावा भारत की जिस ख़बर का सारे पाकिस्तानी अख़बारों में प्रमुखता से ज़िक्र रहा वो थी मेरठ की एक यूनिवर्सिटी में कश्मीरी छात्रों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला दर्ज होना और फिर उसे वापस लिया जाना.

औसाफ़ का इस पर कहना है कि ख़ुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने वाले भारत का तंग नज़रिया सबके सामने आ गया है. 68 कश्मीरी छात्रों पर सिर्फ़ इसलिए देशद्रोह का मामला दर्ज करा दिया गया है क्योंकि वो एशिया कप क्रिकेट टूर्नामेंट में भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की जीत पर जश्न मना रहे थे.

ज़रा सोच समझ कर

तालिबान के साथ बातचीत में आए गतिरोध के बाद अब पाकिस्तान सरकार ने चरमपंथियों से ख़ुफ़िया बातचीत करने का फ़ैसला किया है.

इस मुद्दे पर जंग ने अपने संपादकीय में लिखा है – ख़ुफ़िया बातचीत, ज़रा सोच समझ कर.

पाकिस्तान में लगातार जारी हिंसा बातचीत की प्रक्रिया में बाधा रही है

अख़बार के अनुसार जो लोग ख़ुफ़िया बातचीत के समर्थक हैं, वो दलील देते हैं कि किसी नतीजे पर पहुंचे बिना अगर बातचीत का ब्यौरा सबके सामने आ जाता है तो उससे बहस और तकरार का दरवाज़ा खुल जाता है जिससे बातचीत की प्रक्रिया प्रभावित होती हैं.

लेकिन अख़बार में ख़ुफ़िया बातचीत के विरोधियों की दलील का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि देश की सुरक्षा और एकजुटता जैसे अहम मुद्दे पर होने वाली बातचीत से जनता को बेख़बर रखना और विपक्ष को भरोसे में न लेना राष्ट्रीय हित में नहीं है और इससे अटकलबाज़ियों को हवा मिलती है, जो ज़्यादा नुक़सानदेह हैं.

बच्चों की मौतें

नवाए वक़्त ने जस्टिस (रिटायर्ड) राना भगवानदास को देश का मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए जाने की तैयारी की ख़बर लगाई है.

अख़बार लिखता है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस राना भगवान दास को ये ज़िम्मेदारी दिए जाने पर पाकिस्तानी सरकार और विपक्ष के बीच सहमति हो गई है.

इस पद के लिए जस्टिस राना भगवान दास के अलावा जिन नामों पर विचार किया गया था उनमें ख़्वाजा ज़हीर और जस्टिस (रिटायर्ड) सईद अल ज़मान सिद्दिक़ी के नाम भी शामिल थे लेकिन सहमति जस्टिस राना भगवान दास के नाम पर हुई.

दैनिक खबरें ने अपने संपादकीय में सिंध के सूखा प्रभावित थरपारकर इलाके में भुखमरी से 121 बच्चों की मौत पर संपादकीय लिखा है. अख़बार कहता है कि गोदामों में 60 हज़ार बोरी अनाज सड़ रहा है, उसके बावजूद भोजन की कमी से इतने सारे बच्चे मारे गए हैं.

अख़बार के मुताबिक सिंध सरकार ने स्थिति से निपटने में अपनी नाकामी स्वीकार की है लेकिन क्या इससे उन मांओं को दिलासा दिया जा सकता है जिनकी गोदें उजड़ चुकी है.

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