झारखंड: क्यों हैं राजनीति में गिनी-चुनी महिलाएं?

  • 12 मार्च 2014

संसदीय चुनावों की तारीखों में एकीकृत बिहार से लेकर अलग राज्य बनने के बाद तक झारखंड के इलाके सिर्फ नौ महिलाएं सांसद बन सकीं.

इनमें किसी की यादें शेष हैं, तो कोई चुनावी राजनीति के हाशिए पर है. वैसे महिलाओं को उम्मीदवार बनाने में पार्टियां भी डंडी मार जाती हैं.

2009 के आमचुनाव में झारखंड से कुल 249 उम्मीदवारों में महिलाओं की संख्या 14 थीं. इनमें सभी चुनाव हार गईं.

इस बार भी सभी राजनीतिक दलों में एक बात साफ़ दिख रही है कि वह महिला उम्मीदवारों को उतारने से परहेज़ कर रहे हैं. हालांकि अभी सभी पार्टियों की ओर से सभी सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन महिलाएं नहीं के बराबर दिख रही हैं.

यह हाल तब है जब पिछले चुनाव में झारखंड की 14 लोकसभा सीटों के लिए 40 लाख 33 हजार 59 महिलाओं ने वोट दिए थे. यह कुल वोट का यह 47.33 फीसदी था. इससे पहले 2004 में झारखंड से 13 महिलाएं चुनाव लड़ीं, लेकिन जीती सिर्फ़ एक.

चुनाव लड़ने का इरादा

1951 से अब तक के चुनावों में रांची, चाईबासा, गिरिडीह, दुमका, कोडरमा, गिरिडीह, राजमहल, गोड्डा सीट से कभी किसी महिला उम्मीदवार की जीत नहीं हुई.

2007 में सुमन महतो जमशेदपुर लोकसभा उपचुनाव में विजयी हुई थीं. उनके सांसद पति सुनील महतो की हत्या के बाद झामुमो ने उन्हें चुनाव लड़ाया था.

2009 में वे भाजपा से हार गईं. इसके बाद 2010 के उपचुनाव में झामुमो ने उन्हें टिकट नहीं दिया, तो वह तृणमूल के टिकट पर चुनाव लड़ीं, पर हार गईं.

उन्होंने बताया कि अभी वह तृणमूल में हैं और फिलहाल झामुमो में लौटने का इरादा नहीं है.

चुनाव लड़ने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, "थोड़ा इंतज़ार कीजिए, लड़ना तो चाहती हूं, लेकिन किस हैसियत से, इसे परख रही हूं."

वह दो टूक कहती हैं, "महिलाओं को चुनाव लड़ाने के मुद्दे पर राजनीतिक दलों की नीति, नीयत में फ़र्क हो जाता है."

बच्चों को वक़्त

Image caption (भारतीय जनता पार्टी की सांसद रहीं रीता वर्मा अपने एक चुनाव प्रचार के दौरान.)

जमशेदपुर से दो बार चुनाव जीतीं आभा महतो बताती हैं कि 2004 में चुनाव हारने के बाद उन्होंने बच्चों को वक़्त देने का निर्णय लिया. उस वक़्त बच्चे बहुत छोटे थे.

2009 में पार्टी ने टिकट नहीं दिया. उनका कहना है कि वे भाजपा में हैं और रहेंगी.

उन्होंने टिकट के लिए आवेदन भी दिया है. वह भी मानती हैं कि महिलाओं को चुनाव लड़ाने से पार्टियां कन्नी काटती हैं.

धनबाद से लगातार चार बार चुनाव जीतने वालीं भाजपा की रीता वर्मा 2004 में हार गईं और 2009 में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया. हालांकि धनबाद से भाजपा ही जीती.

रीता वर्मा का कहना है कि वे भाजपा की राजनीति में लगातार सक्रिय रही हैं.

हिंदी दैनिक प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा कहते हैं, "मौजूदा राजनीति में पार्टियां हर हाल में सीट जीतना चाहती हैं. वह पहले सीट फ्रेम करती हैं और जब कोई विकल्प नहीं मिलता या सहानुभूति वोट हासिल करना होता है, तो महिलाओं को टिकट दिया जाता है."

"सच यह है कि महिलाओं को चुनाव लड़ाने की दलों में अंदर से हिम्मत नहीं है. नए चेहरों के लिए चुनावी राजनीति में टिकना बहुत कठिन है."

पलामू से कांग्रेस की कमला कुमारी का चार बार चुनाव जीतना अब तक का रिकॉर्ड रहा है. लोग उनके स्वभाव की चर्चा आज भी करते हैं.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राधाकृष्ण किशोर बताते हैं कि 1980 में पहली बार छतरपुर से उन्हें विधायक बनाने में कमला जी की अहम भूमिका थी. वह कार्यकर्ताओं का मान-सम्मान रखती थीं और जनता के बीच एकदम साधारण व्यक्ति के तौर पर पेश आती थीं.

खूंटी से सांसद बनीं सुशीला केरकेट्टा बिहार सरकार में मंत्री (1985-89) भी रहीं.

अहम आदिवासी नेता कार्तिक उरांव की पत्नी सुमति उरांव कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर 1984 और 1989 में चुनाव जीतीं और उन्हें दोनों बार केंद्र सरकार में मंत्री बनाया गया. गुमला के वयोवृद्ध जोखन उरांव बताते हैं कि आदिवासियों के बीच कार्तिक बाबू के नाम पर सुमति का प्रभाव भी खूब रहा.

रामगढ़ राजघराने की ललिता राज लक्ष्मी हजारीबाग के अलावा धनबाद और औरंगाबाद से भी चुनाव जीती थीं. इसी राजपरिवार की विजयाराजे तीन बार लगातार चतरा से चुनाव जीतीं.

हेलीकॉप्टर

चतरा के वरिष्ठ अधिवक्ता रामप्रसाद तुलस्यान बताते हैं कि उस जमाने में रामगढ़ राजपरिवार का बहुत महत्व था.

वह बताते हैं, "महारानी जब हैलिकॉप्टर से चुनाव प्रचार करने आती थीं, तो एक झलक पाने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती थी. लोगों की राजपरिवार के प्रति आस्था-निष्ठा का परिणाम था कि उनकी गाड़ियों के चक्के के चिह्न को देखकर ही लोग खुश हो जाते थे."

लेकिन चुनाव जीतने के बाद वह आज के नेताओं की तरह जनता के बीच घूमती नहीं थीं.

रामगढ़ राजपरिवार पर आम लोगों का कितना विश्वास था, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 1957 में हजारीबाग इलाके की सभी 16 सीटों पर उनके परिवार के लोग जीते. बाद में यह प्रभाव खत्म हुआ.

ललिता राजलक्ष्मी के विधायक पौत्र सौरभ इस बार भी कांग्रेस के टिकट से हजारीबाग सीट पर खड़े हैं. 2009 में वे भाजपा के यशवंत सिन्हा से हार गए थे.

राजपरिवार के राजनेताओं की यादों के बारे में पूछने पर वह इतना भर कहते हैं, "उन्हें राजनीति करते तो देखा नहीं. लेकिन इतना जानता हूं कि जनता की समस्याओं के समाधान के लिए वह बहुत संवेदनशील होते थे."

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