जब 70 की उम्र में बनी मां..

  • 12 मार्च 2014
Image caption नवीन पांच साल की है और उसकी मां, राजो देवी 75 साल कीं.

जब मेरी उम्र पांच साल की थी तो मेरे आगे-पीछे दौड़ती मेरी मां की उम्र क्या थी? यही सवाल मेरे मन में कौंधा जब मैं मिली पांच साल की नवीन से.

पांच साल की नवीन की मां 75 साल की हैं. वो अपनी बच्ची के आगे-पीछे नहीं दौड़तीं. वो तो चलती भी हैं, तो पैर ख़ूब जमा-जमा कर रखती हैं. ठीक मेरी नानी की तरह, जिन्हें अपनी अधेड़ उम्र में गिरकर हड्डी टूटने का डर ज़्यादा रहता है.

पर नानी-दादी जैसी अपनी उम्र की फ़िक्र छोड़ राजो देवी पांच साल पहले मां बनीं. ऐसा नहीं कि इससे पहले उन्होंने कोशिश नहीं की. शादी के 55 साल बच्चा पैदा करने की नाकाम कोशिशों में ही बीते.

फिर आईवीएफ़ (इन-विट्रो-फर्टिलाइज़ेशन) तकनीक के बारे में पता चला. अलेवा के अपने गांव से हिसार के एक क्लीनिक का दो घंटे का रास्ता तय किया और अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी पड़ाव में अपने सबसे मुश्किल सफ़र की शुरूआत कर डाली.

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लेकिन नौ महीने अपने गर्भ में बच्ची को पालकर, फिर सिज़ेरियन के ज़रिए बच्ची पैदा कर और उसके एक साल बाद ओवरी में बने सिस्ट का ऑपरेशन करवाने पर, बूढ़ी हड्डियों में बची जान भी जाती रही है.

अब सिकुड़ती जा रही हैं, वज़न कम हो गया है और कमर झुक गई है. पर राजो के मुताबिक़, "सिर ऊंचा है, क्योंकि मां ना बन पाने का ‘कलंक’ धुल गया है".

अपने पति बाला राम से नज़र चुराकर दबी आवाज़ में मुझे कहती हैं, “बेऔलाद थे तो गांव में हंसी होती थी, ताने सुनने पड़ते थे, मां बन गई तो इज़्ज़त बढ़ गई, जान का क्या है, भगवान की देन है, इस वजह से थोड़े ही रुक जाते, नई तकनीक का पता चला तो कोशिश तो करनी ही थी.”

Image caption बाला राम ने औलाद की चाहत में अपनी पत्नी की छोटी बहन से भी शादी कर डाली.

बच्चे के लिए दूसरी शादी

भारत में इस व़क्त एक औरत औसतन 68.7 साल की उम्र तक जीती है. राजो ने तो 70 साल की उम्र में बच्ची पैदा की.

मैंने फिर पूछा कि अब बिगड़ती सेहत को देखती हैं तो बच्ची पैदा करने के फ़ैसले पर कोई मलाल नहीं होता? पहले तो हंसी और बोलीं, "आज भी इतना दम है कि तुझ जैसी जवान लड़की को पटक सकती हूं".

पर हल्की सी हंसी के बाद झुर्रियों से भरे उनके चेहरे पर शिकन गहराया, और बताने लगीं कि बच्चे की चाह में बाला राम ने उनकी छोटी बहन से शादी तक कर डाली, पर दूसरी शादी से भी बच्चा नहीं हुआ.

बिना लाग लपेट के राजो बोलीं, “परिवार की दो बहनें बांझ निकल गईं, इसलिए ज़रूरी था कि बच्चा हो, ज़रूरी था इसीलिए इस उम्र में भी किया.”

पर अब आगे क्या? नवीन जब बालिग होगी, तब राजो की उम्र 88 साल हो चुकी होगी. बच्ची पैदा होने के बाद से राजो बीमार रहीं हैं, डॉक्टरों के चक्कर आम हो गए हैं.

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बाला राम कहते हैं कि राजो से आठ साल छोटी उनकी दूसरी पत्नी नवीन का ख़्याल रखेगी, “फिर हमारा कुनबा बड़ा है, पांच भाई हैं, सब देख लेंगे, घर बस गया हमारा, और क्या चाहिए.”

वैसे नवीन के पैदा होने के बाद चाहत और भी थी. बेटे की चाहत. पर राजो का शरीर एक और बच्चा पैदा करने लायक नहीं बचा. और उनकी बहन को हाई ब्ल्ड प्रेशर होने की वजह से, उनका आईवीएफ इलाज हो नहीं सकता था.

अब नवीन भी ख़ुद को लड़का बताती है. मैंने पूछा क्यों? तो बोली, “लड़का कमा कर खाएगा ना, मैं तो बड़ी होकर थानेदार बनूंगी.”

Image caption हिसार के एक गांव में रहनेवाली भटेरी देवी के पति खेती करते हैं.

सैकड़ों को उम्मीद

राजो देवी ने जो 70 साल की उम्र में किया, भटेरी देवी ने वही 66 साल में किया. हिसार के उसी क्लीनिक में उनके ट्रिप्लेट्स यानि तीन बच्चे पैदा हुए – एक बेटा और दो बेटियां.

एक बेटी की कुछ ही हफ़्तों में मौत हो गई. बाक़ी दोनों बच्चे अब स्कूल जाने लगे हैं और भटेरी देवी 70 साल की हो गई हैं.

हिसार में नेशनल फ़र्टिलिटी सेंटर चला रहे डॉक्टर अनुराग बिश्नोई बताते हैं कि अधेड़ उम्र के सैकड़ों दंपति बड़ी उम्मीद के साथ उनके पास आते हैं. सभी की उम्मीदें पूरी नहीं हो सकतीं, पर वह कोशिश करते हैं.

अपनी टेबल पर रखीं एक दर्जन फ़ाइलों की तरफ़ इशारा कर कहते हैं, “एक समय था जब यहां 150 फ़ाइलें होती थीं, लोगों की लाइन लगी रहती थी, फिर हमें इसे रोकना पड़ा, जितने ज़्यादा केस लेंगे उतना ही सफलता की दर कम होती जाएगी.”

अपने पिता द्वारा साल 2001 में शुरू हुए इस आईवीएफ क्लीनिक में डॉक्टर बिश्नोई ने 2005 से काम करना शुरू किया. उनके मुताबिक़ अब वहां सालाना 1,000 महिलाओं का इलाज होता है जिनमें से क़रीब 30 प्रतिशत महिलाएं 50 से 70 वर्ष की उम्र की होती हैं.

इनमें से ज़्यादातर की माहवारी बंद हो चुकी होती है, यानी शरीर में अंडे बनने बंद हो चुके होते हैं. ऐसे में किसी और महिला के दान किए गए अंडों को इनके पति के शुक्राणु से कृत्रिम तरीक़े से मिलाया जाता है और फिर भ्रूण को मां के गर्भ में डाला जाता है.

एम्स अस्पताल में स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉक्टर नीरजा भाटला के मुताबिक़ 50 वर्ष की आयु तक आईवीएफ का इलाज आम हो गया है पर उसके बाद एहतियात की ज़रूरत होती है, “अगर औरत 60 वर्ष की है तो उसकी सेहत का आकलन करना होगा, यानी गर्भ धारण करने से उनके दिल पर दबाव तो नहीं पड़ेगा? उनकी हड्डियां इतना बोझ सह सकती हैं? आदि.”

डॉक्टर बिश्नोई कहते हैं कि वह बहुत ध्यान से आईवीएफ के लिए महिलाओं का चयन करते हैं, उनका दावा है कि उनके क्लीनिक में किसी अधेड़ महिला की प्रसव के दौरान मौत नहीं हुई है.

उन्होंने कहा, “किताबें कहती हैं कि प्रसव के दौरान ख़ून का ज़्यादा रिसाव, हाइपरटेंशन, सेरिब्रल स्ट्रोक से लेकर मौत तक का ख़तरा है, लेकिन हमारा अनुभव कहता है कि बड़ी उम्र की महिलाओं को 40-45 साल की उम्र की महिलाओं से ज़्यादा परेशानी नहीं होती.”

Image caption डॉक्टर बिश्नोई के मुताबिक गांववालों में आईवीएफ से बहुत उम्मीदें हैं.

लाखों का क़र्ज़

भारत में आईवीएफ का इलाज करवाने वाली महिलाओं की उम्र पर कोई सीमा नहीं है. इलाज की सफलता की दर 30 फ़ीसदी है और ख़र्च लाखों का.

राजो देवी का आईवीएफ इलाज करवाने में बाला राम ने बैंक और साहूकार से क़रीब 2,70,000 रुपए का कर्ज़ा लिया था, जो वो पिछले पांच साल में भी चुका नहीं पाए हैं.

पर कहते हैं कि सुकून का कोई मोल नहीं, “लड़की हो गई, घर बस गया, जायदाद की मालिक हो गई, वर्ना पड़ोसी ले जाते, तो क्या फ़ायदा होता.”

भटेरी देवी के पति देवा सिंह भी मानते हैं कि आईवीएफ के बाद ख़र्च खूब आया और पत्नी की सेहत गिर गई, पर कहते हैं, “पहले हम जब घर से निकलते थे, तो गांववाले सुबह मुंह नहीं देखते थे, कहते थे ‘बेऔलादा’ जा रहा है और मुंह मोड़ लेते थे.”

भटेरी पूरे गांव में दादी के नाम से मशहूर हैं. देवा कहते हैं जब वो इलाज करवा रहे थे तो पूरा गांव उनपर हंस रहा था कि ‘इस उम्र में मां बनने चली हैं’.

भटेरी के चेहरे पर भी वैसी ही थकान है जो राजो देवी की झुर्रियों में झलकती है, पर दोनों के चेहरों पर एक ग़ुरूर है. ज़िद मानो या मजबूरी. मां बनने की शान बनाए रखने में मां बनने की थकान को वो जगह नहीं देतीं.

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