'नेता तब आए जब सब कुछ लुट चुका था'

  • 12 मार्च 2014
उत्तर प्रदेश के दंगा राहत शिविर में बच्चे

दोपहर के बाद का समय है. उत्तर प्रदेश स्थित एक छोटा सा अस्थाई घर. यह घर सामान्य घरों से काफ़ी अलग है.

42 वर्षीय रेहाना और सात लोगों का परिवार मिट्टी के कच्चे चूल्हे पर रात के लिए खाना बनाने में व्यस्त है. यह नज़ारा है पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के एक दंगा-राहत शिविर का.

उन्होंने मुझे पानी के लिए पूछा. उनकी आवाज़ में बेइंतिहा दर्द साफ़ झलक रहा था.

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रेहाना कहती हैं, "हमें छह महीने पहले अपना घर घर छोड़ना पड़ा. उसके बाद से हम घूमंतू की तरह जी रहे हैं. घर छोड़ते समय हम केवल अपने बच्चों को ही ला पाए. अब हमारी कोई पहचान नहीं है और न ही इस पहचान का कोई प्रमाण. हमें अब तक कोई मदद नहीं मिली है. ऐसे में हम चुनाव में वोट देने कैसे जाएँगे?"

सरकारी अस्पताल में चार महीने रहने के बाद उनके पति अब वापस आ चुके हैं लेकिन उनके पास कोई रोज़गार नहीं है.

बेघर और बेकाम

रेहाना का गाँव इस दंगा राहत शिविर से ज़्यादा दूर नहीं है. पिछले साल हुए दंगे में उनके पति बुरी तरह घायल हो गए थे. वो स्वस्थ तो हो गए लेकिन उन्हें मिस्त्री के काम के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया.

इस शिविर में 300 से ज़्यादा परिवार अस्थाई घरों में रह रहे हैं.

रेहाना के परिवार जैसे इस शिविर और भी कई परिवार हैं जिनके लिए आम चुनाव ने विस्थापन की याद को ताज़ा कर दिया है. एक ऐसी याद जिसे वे बिल्कुल भुला देना चाहते हैं.

76 वर्षीय अख़्तरान विधवा हैं. उनके परिवार में नौ लोग हैं. उनके दो बेटे बेरोज़गार हैं. उनके घर को भी उनके पैतृक गाँव कुटबा में छह महीने पहले उपद्रवियों की भीड़ ने जला दिया था.

अख़्तरान कहती हैं, "मैंने दसियों लोक सभा चुनाव में वोट दिया है. इसके बदले में मुझे मिला क्या, दर बदर की ठोकर और निराशा. मैं क्यों वोट दूँ और कैसे दूँ जब मुझे मेरे घर से अपनी एक तस्वीर या काग़ज़ात भी नहीं लाने दिया गया."

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इस इलाक़े में अब से एक महीने से भी कम समय में आम चुनाव के लिए मतदान होने वाले हैं.

हालाँकि हज़ारों बेघर दंगा-पीड़ितों को आर्थिक मदद दी गई है. उन्हें नई जगह बसाया गया है. लेकिन अभी भी हज़ारों ऐसे हैं जिन्हें अपनी बारी का इंतजार है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार दंगे की वजह से 50,000 से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए थे.

उत्तर प्रदेश की सरकार और भारत का चुनाव आयोग कोशिश कर रहा है कि राहत शिविरों में रह रहे लोगों को किसी तरह का पहचान पत्र उपलब्ध कराया जाए.

चुनाव पहचान पत्र

इस ज़िले के ज़िलाधिकारी और इस संवेदनशील संसदीय क्षेत्र में मुख्य चुनाव अधिकारी कौशल राज शर्मा कहते हैं, "नौ मार्च, 2013 तक 3000 से ज़्यादा लोगों को चुनाव पहचान पत्र दिया जा चुका है. नौ मार्च को मतदान सूची में नाम दर्ज कराने की आख़िरी तारीख़ थी. ख़ास बात यह कि इन लोगों को बिना किसी ख़ास दस्तावेज़ के मतदान पहचान पत्र दिए गए."

शर्मा कहते हैं, "हमने इन लोगों को समझाने की कोशिश की थी कि वे अपने गाँवों में वापस चले जाएँ. नतीजन 69 फ़ीसदी लोग वापस जा चुके हैं. 40 फ़ीसदी लोग अभी वापस नहीं जा पाए हैं."

इसके बावजूद रेहाना जैसे कई पीड़ितों के पास अभी भी कोई पहचान पत्र नहीं है.

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इनमें से कुछ लोगों ने एक ख़ास नेता के ख़िलाफ़ अपनी नाराजगी खुल कर जाहिर की. इन लोगों ने तय किया है कि वो इस बार वोट नहीं देंगे.

शिविर के पास ही स्थित सिसौली गाँव के निवासी अमन पर अज्ञात लोगों की भीड़ ने तब हमला किया जब वह खेतों में काम कर रहे थे.

जब वह अपना सरकारी अस्पताल में अपना इलाज करा रहे थे तभी उनका परिवार इस शिविर में रहने के लिए चला आया था.

अमन कहते हैं, "हमें राजनेताओं पर कोई भरोसा नहीं रहा. वे हमें कोई मदद या भरोसा दिलाने में असफल रहे हैं. वे तब आए जब हम सब कुछ खो चुके थे. मैं तो चुनाव पहचान पत्र के लिए आवेदन नहीं करने जा रहा."

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उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर और शामली ज़िले में तक़रीबन 2000 परिवार दंगा राहत शिविर में रह रहे हैं.

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एक सरकारी पैनल की रिपोर्ट में कहा गया है कि कम से कम 12 बच्चों की, जिनकी उम्र 15 साल से कम थी, इन राहत शिविरों में मौत हो चुकी थी. इन शिविरों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं और सफ़ाई का अभाव है.

ये लोग उन हज़ारों में लोगों में हैं जो पिछले साल सितंबर में हुए साम्प्रदायिक दंगों में बेघर हुए थे.

कई लोग मानते हैं कि यह दंगा पिछले एक दशक में देश में हुआ सबसे बड़ा दंगा है.

भारतीय राज्यों में उत्तर प्रदेश की जनसंख्या सबसे अधिक ज़्यादा है. साल 1992 में उग्र हिन्दुओं ने जब बाबरी मस्जिद तोड़ दी थी तो प्रदेश में व्यापक दंगे हुए थे.

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