माओवादियों ने बदली रणनीति, अब 'मोबाइल' युद्ध

छत्तीसगढ़ में माओवादियों के हमले की बाद का दृश्य इमेज कॉपीरइट AP

माओवादियों ने अपनी रणनीति में एक बड़ा बदलाव किया है. जानकारों की मानें तो अब वो छापामार युद्ध की बजाए 'मोबाइल' युद्ध यानी चलंत युद्ध लड़ रहे हैं.

नक्सल विरोधी अभियान में शामिल आला पुलिस अधिकारियों ने इस बात का ख़ुलासा किया है. उनका कहना है कि माओवादियों की रणनीति में आया ये बदलाव अब सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है.

('माओवादी हमले का बदला लेंगे')

बस्तर में लंबे अरसे से नक्सल विरोधी अभियान में शामिल एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि अब माओवादी छोटी-छोटी टुकड़ियों में आते हैं, घटनाओं को अंजाम देते हैं और उसके बाद वो अलग-अलग दिशाओं में भाग जाते हैं.

बस्तर में तैनात केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के सुरजीत अत्री ने बीबीसी से इस बात का ज़िक्र करते हुए कहा कि पिछले एक साल के दौरान माओवादियों ने जिन घटनाओं को अंजाम दिया है, उससे उनकी रणनीति में बदलाव के संकेत मिलते हैं.

छापामार युद्ध

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वो कहते हैं, "चाहे वो पिछले साल दर्भा घाटी में कांग्रेसी नेताओं पर हुआ हमला हो या फिर जीरम घाटी में 11 मार्च को पुलिस बल पर हमला. इन सभी घटनाओं से पता चलता है कि माओवादी अलग-अलग दिशाओं से आकर इकठ्ठा हुए और फिर हमला करने के बाद अलग-अलग दिशाओं में चले गए."

('मौत की घाटी झीरम')

सुरजीत अत्री के तरह ही बस्तर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक एसआर सलाम का भी कहना है कि पहले माओवादी एक ही जगह रहकर घात लगाकर छापामार युद्ध लड़ा करते थे. वो एक ही इलाक़े में अपने आपको मज़बूत बनाकर उस इलाक़े को मुक्त क्षेत्र घोषित किया करते थे.

मगर अब वो चारों दिशाओं से इकठ्ठा होकर घटनाओं को अंजाम देते हैं और फिर वहां से अलग स्थानों की तरफ निकल पड़ते हैं.

11 मार्च को सुकमा की जीरम घाटी में माओवादियों ने सड़क निर्माण के काम में लगे मज़दूरों की सुरक्षा के लिए निकले अर्द्धसैनिक और राज्य पुलिस बल के जवानों पर हमला कर दिया था, जिसमें 15 जवानों की मौत हो गई थी जबकि एक नागरिक भी इस हमले में मारा गया.

कई दिनों से नज़र

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घटना की तफ़्तीश करने वाले पुलिस अधिकारियों का अनुमान है कि हमला करने वाले माओवादियों की संख्या क़रीब 350 थी, जबकि जवानों की संख्या 45 ही थी.

(नक्सल हमले में 16 की मौत)

छत्तीसगढ़ की पुलिस और अर्धसैनिक बल के अधिकारियों का मानना है कि जीरम घाटी के उस स्थान पर माओवादी कई दिनों से नज़र रखे हुए थे. उन्हें पता था कि सुरक्षा बल के जवान रोज़ इस इलाक़े में नियमित गश्त के लिए निकलते हैं.

जांच कर रहे अधिकारियों को लगता है कि हमले के स्थान पर माओवादी अलग-अलग स्थान से आकर इकठ्ठा हुए थे. ऐसा अंदेशा है की इस हमले को अंजाम देने वालों में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दर्भा एरिया कमिटी के अलावा इस दस्ते में अबूझमाड़, ओडिशा और आन्ध्र प्रदेश के माओवादी शामिल हो सकते हैं.

पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि जीरम घाटी की वारदात के बाद ओडिशा की सीमा से लगे सुकमा के दोरनापाल के इलाक़े के पास सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने एक संदिग्ध मोटरसाइकल सवार का पीछा किया तो वो अपना वाहन और बैग वहीं छोड़ दिया और भाग निकला.

बड़ा हथियार

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बैग से पुलिस ने पांच वाकी-टॉकी के साथ एक बड़ी एंटीना छतरी बरामद की. अंदेशा है कि माओवादियों द्वारा इस छतरी का इस्तेमाल पांच किलोमीटर के दायरे में वाकी-टॉकी संचालित करने के लिए किया जाता. ये 'मोबाइल' युद्ध यानी चलंत युद्ध का एक बड़ा हथियार साबित हो सकता है.

(नक्सली हमले में पुलिसकर्मियों की मौत)

जीरम घाटी की घटना सुरक्षा बलों और खासतौर पर बस्तर में चलाये जा रहे नक्सल विरोधी अभियान को एक बड़ा झटका है. पिछले साल दर्भा घाटी में हुए हमले के बाद नक्सली हमलों में आश्चर्यजनक ढंग से कमी आई थी. पुलिस के अधिकारी इसके लिए अपनी पीठ ये कहकर थपथपा रहे थे कि ये बस्तर में चलाये जा रहे अभियान की वजह से हुआ है.

पुलिस ने दावा किया था कि उसने माओवादियों के ठिकानों को ध्वस्त करते समय जो दस्तावेज़ बरामद किए थे, उससे पता चलता है कि उनका संगठन कमज़ोर हो रहा है और वो पीछे हट रहे हैं.

मगर 11 मार्च की घटना से पता चला है कि ये माओवादियों का रणनीतिक फ़ैसला था और वो इस दौरान अपने संगठन में फेरबदल को अंजाम दे रहे थे और वो इस 'मोबाइल' युद्ध के लिए नई रणनीति बना रहे थे.

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