केजरीवाल पर एफ़आईआर की राजनीति क्या है?

  • 14 मार्च 2014
अरविंद केजरीवाल

गुजरात के कच्छ में टोल टैक्स न चुकाने पर अरविंद केजरीवाल की कार चला रहे व्यक्ति पर एफ़आईआर दर्ज की गई है.

आरोप है कि छह मार्च को केजरीवाल का क़ाफ़िला टोल टैक्स चुकाए बिना ही गुज़र गया था.

इससे पहले इसी हफ़्ते मुंबई में केजरीवाल और समर्थकों के ख़िलाफ़ एयरपोर्ट पर अफ़रा-तफ़री मचाने और यातायात नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में भी एफ़आईआर दर्ज की जा चुकी है.

इसी महीने आम आदमी पार्टी के कई नेताओं और समर्थकों के ख़िलाफ़ दिल्ली में बीजेपी कार्यालय के बाहर प्रदर्शन करने के आरोप में भी एफ़आईआर दर्ज की गई. इस मामले में तो कई कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार भी किया गया था.

लोकसभा चुनावों के वक़्त अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर हो रही एफ़आईआर ख़ूब सुर्ख़ियाँ बटोर रही हैं.

जवाब देगी 'आप'

लेकिन क्या ये मामले राजनीति से प्रेरित हैं और क्या आम आदमी पार्टी इन्हें गंभीरता से ले रही है?

इस सवाल पर आम आदमी पार्टी का विधि प्रकोष्ठ देख रहे ऋषिकश कुमार कहते हैं, "एफ़आईआर शुरुआती प्रक्रिया है. जब चार्जशीट होकर यह अदालत में जाएंगी तो हम क़ानूनी रूप से इनका जवाब देंगे. जिस मामले में भी अदालत को लगेगा कि हमें पेश होने की ज़रूरत है तो हम अदालत के सामने ज़रूर पेश होंगे."

ऋषिकेश कहते हैं कि जहां-जहां भी एफ़आईआर हो रही हैं वहां-वहां हम पेश होंगे.

ऋषिकेश के मुताबिक़ अरविंद केजरीवाल के ख़िलाफ़ अब तक क़रीब एक दर्जन एफ़आईआर और अदालती मामले दर्ज हो चुके हैं.

दिल्ली में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन के दौरान हुए प्रदर्शनों से जुड़े पाँच मामले भी अरविंद केजरीवाल के ख़िलाफ़ चल रहे हैं. अरविंद के ख़िलाफ़ मानहानि की भी कई शिकायतें की गई हैं.

ऋषिकेश कहते हैं कि ये एफ़आईआर राजनीति से प्रेरित हैं और अदालतें भी इन्हें इसी रूप में लेंगी.

सिर्फ़ अरविंद केजरीवाल पर ही नहीं बल्कि पार्टी के कार्यकर्ताओं पर भी एफ़आईआर हो रही हैं. ऋषिकेश के मुताबिक़ पार्टी के पास 30 से 40 अधिवक्ताओं की टीम है जो पार्टी के कार्यकर्ताओं को क़ानूनी मदद देने के लिए तैयार हैं. ये अधिवक्ता अलग-अलग राज्यों में सक्रिय हैं.

राजनीति से प्रेरित

लेकिन चुनावी मौसम में अरविंद केजरीवाल के ख़िलाफ़ दर्ज हो रही इन एफ़आईआर को किस रूप में देखा जाना चाहिए?

राजनीतिक विश्लेषक सतीश मिश्र कहते हैं, "चुनावी साल में जो भी पार्टी सत्ता में होती है वह किसी भी ढंग से राजनीतिक विरोधियों की ग़लतियों को सामने लाने की कोशिश करती है. ऐसे में ये एफ़आईआर राजनीति से प्रेरित हो सकती हैं. आम आदमी पार्टी ख़ुद को सही और बाक़ी सभी को ग़लत बताती रही है ऐसे में इस पार्टी की छोटी-छोटी ग़लतियों को भी बड़े रूप में सामने लाया जा रहा है."

सतीश मानते हैं कि ये एफ़आईआर सोची समझी योजना का हिस्सा हो सकती हैं. वे कहते हैं, "इसके पीछे ज़रूर कुछ है. राजनीति के दंगल में जिसके पास जो हथियार होता है वह उसे इस्तेमाल करता है. एफ़आईआर को भी इसी रूप में देखा जाना चाहिए. लेकिन बाक़ी पार्टियों के मुक़ाबले में आम आदमी पार्टी को ऐसी ग़लतियों के प्रति ज़्यादा सावधान होगा."

वे कहते हैं, "अरविंद केजरीवाल ने गाँधीवादी तरीक़ा अपनाया है. महात्मा गाँधी अपनी ग़लतियों को स्वीकारने में ज़रा भी वक़्त नहीं लगाते थे. जब भी उनकी कोई ग़लती बताई जाती थी तो वे कहते थे कि अगर मैं ग़लत हूँ तो मुझे गिरफ़्तार कर लीजिए. अरविंद को भी यही तरीक़ा अपनाना चाहिए."

फ़ायदा किसका

लेकिन इन एफ़आईआर का होगा क्या? क्या जिन पर आरोप हैं उन्हें जेल भी भेजा जाएगा?

सतीश मिश्र कहते हैं, "कुल मिलाकर यह सिर्फ़ राजनीतिक इस्तेमाल बनकर रह जाती हैं. अदालत पहुँचने पर या तो इन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है या फिर प्रतीकवादी सज़ा दे दी जाती है."

ऐसे में इन एफ़आईआर से आम आदमी पार्टी को फ़ायदा होगा या नुक़सान?

सतीश मिश्र मानते हैं, "इस तरह के जो मामले दर्ज होंगे इससे आम आदमी पार्टी को ही फ़ायदा होगा क्योंकि भारत में जब भी किसी का शोषण किया जाता है या किसी को दबाया जाता है तो जनता के मन में उसके प्रति सहानुभूति जाग जाती है."

मिश्र कहते हैं, "आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता मध्यमवर्ग और निम्नवर्ग में ज़्यादा है. मध्यमवर्ग को यह लग सकता है कि केजरीवाल आदर्शवाद की बातें करते थे लेकिन उन पर टिक नहीं पा रहे हैं लेकिन निम्नवर्ग में ऐसी एफ़आईआर के बाद केजरीवाल के प्रति समर्थन बढ़ेगा ही."

दूसरे नेताओं के लिए सबक़

सतीश मिश्र यह भी मानते हैं कि केजरीवाल के सार्वजनिक आचरण को लेकर होने वाली शिकायतें या एफ़आईआर से दूसरी पार्टी के नेताओं पर सार्वजनिक व्यवहार सुधारने के लिए दबाव बनेगा. दूसरे नेताओं पर भी निगरानी बढ़ जाएगी.

जिस तरीक़े से एफ़आईआर हो रही हैं क्या केजरीवाल को चिंता करनी चाहिए?

सतीश मिश्र कहते हैं, "आदर्श स्थिति में तो उन्हें चिंता करनी चाहिए लेकिन केजरीवाल जितना आदर्शवादी ख़ुद को दिखाते हैं इतने वे हैं नहीं इसलिए वे इनका भी राजनीतिक इस्तेमाल करके आगे बढ़ते जाएंगे."

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