नवीन निवास में बिछी है राजनीति की बिसात

  • 16 मार्च 2014
नवीन पटनायक Image copyright AFP

वैसे तो नवीन निवास ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल (बीजद) के अध्यक्ष नवीन पटनायक का निवास है, लेकिन जब से आम चुनाव की घोषणा हुई है राज्य की पूरी राजनीति इसी इमारत के इर्द-गिर्द घूमती नज़र आ रही है.

सुबह से शाम तक यहां सैंकड़ों लोगों का जमघट लगा रहता है, जिनमें बीजद के नेता, कार्यकर्ता और टिकट चाहने वाले तो होते ही हैं, बीजद में शामिल होने आए दूसरी पार्टियों के नेता और उनके समर्थक भी होते हैं.

पिछले एक हफ़्ते में एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब राज्य के दो प्रमुख विरोधी दलों कांग्रेस और भाजपा का कोई छोटा या बड़ा नेता नवीन निवास आकर बीजद 'सुप्रीमो' से न मिला हो और फिर बीजद में शामिल न हुआ हो.

बीजद में शामिल होकर टिकट हथियाने की होड़ में फ़िल्मी दुनिया के सितारे भी पीछे नहीं है. पिछले कुछ दिनों में चोटी के स्टार आकाश दास नायक सहित फ़िल्म और टेलीविज़न की दुनिया के कई कलाकार सत्तारूढ़ पार्टी में शामिल हुए हैं.

परेशानी

लेकिन ऐसा नहीं है कि यहाँ आए सभी लोग टिकट की फ़िराक़ में होते हैं. कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपने इलाक़े के विधायक या सांसद को टिकट न दिए जाने की मांग करने नवीन निवास पहुंचते हैं.

ऐसे ही एक शख्स हैं बडंबा नरसिंघपुर के भिन्नक्षम बीरबर साहू जो नवीन से यह अनुरोध करने आए हैं कि उनके इलाक़े के विधायक और मंत्री देवी प्रसाद मिश्र को टिकट न दिया जाए.

यहाँ सय्यद शेर अली जैसे लोग भी मिल जाते हैं, जो उत्सुकतावश चले आते हैं. भुवनेश्वर से लगभग 500 किलोमीटर दूर सुनाबेडा से आए शेर अली कहते हैं कि वह नवीन पटनायक के 'दर्शन' करने यहाँ आए हैं.

लेकिन इतनी दूर से क्या वह केवल नवीन का 'दर्शन' करने ही आए हैं?

इस पर उन्होंने कहा, "जी नहीं. मुझे भुवनेश्वर में कुछ काम था. लेकिन जब इतनी दूर से आया हूँ तो सोचा कि लगे हाथ नवीन जी का 'दर्शन' करता चलूँ."

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कुछ लोगों को उनकी छोटी-मोटी ज़रूरतें यहाँ खींच लाती है. जैसे कि नवीन पटनायक से एक बीपीएल कार्ड के लिए गुहार लगाने आस्का से आईं 70 साल की महिला तारा पात्र.

उन्हें शिकायत थी कि उन्हें अंदर नहीं जाने दिया जा रहा, "मैंने सुरक्षाकर्मियों से हाथ जोड़े. लेकिन कोई मेरी बात सुन ही नहीं रहा."

नवीन निवास के सामने वाले रास्ते से रोज़ गुजरने वालों को आजकल कई दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.

एक तो यह रास्ता बहुत चौड़ा नहीं है. उस पर सड़क के दोनों ओर गाड़ियों की लम्बी क़तार और मुख्यद्वार के पास सैकड़ों लोगों की मौजूदगी के कारण यहाँ यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है. ऊपर से भारी संख्या में सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी के कारण यहाँ से गुजरने वालों की परेशानियां कई गुना बढ़ गई हैं.

अगर नवीन को कहीं जाना हो या कहीं से आना हो, तब तो राह गुजरने वालों की ख़ैर नहीं.

इस सड़क से रोज़ गुज़रने वाले परीक्षित राउत कहते हैं, "कई बार मुझे ऑफ़िस पहुँचने की जल्दी होती है, लेकिन यहाँ आधे घंटे तक रुक जाना पड़ता है. मुझे ग़ुस्सा इस बात का होता है कि मुख्यमंत्री के घर से निकलने से 10-15 मिनट पहले ही सुरक्षाकर्मी हमें रोक देते हैं और उनके जाने के 5-7 मिनट बाद ही छोड़ते हैं."

राउत की समस्या यह है कि घर से ऑफ़िस जाने के लिए उनके पास कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है.

उपेक्षित पत्रकार

वैसे तो यहाँ साल के किसी भी दिन सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम होते हैं. लेकिन इस समय पूरा इलाक़ा मानो पुलिस छावनी बना हुआ है. आते-जाते वालों को अक्सर बिना वजह चेकिंग का सामना करना पड़ता है.

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नवीन निवास के सामने सुरक्षा ड्यूटी में तैनात एसएसबी के जवान चन्दन सामल के अनुसार वर्ष भर यहाँ दिन के किसी भी समय कम से कम 140 सुरक्षाकर्मियों की ड्यूटी लगी रहती है. लेकिन इस समय यह संख्या 200 पार कर चुकी है.

लेकिन हर किसी को इस भीड़भाड़ और चाक-चौबंद सुरक्षा से शिकायत नहीं है. नवीन निवास से थोड़ी दूरी पर पान की दुकान चलाने वाले नागेश्वर दास ख़ुश हैं कि जबसे यहाँ चुनावी गहमागहमी शुरू हुई है उनके व्यापार में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है.

पास ही रहने वाले सुनील माझी कहते हैं, "हमें इस भीड़ से कोई परेशानी नहीं होती, बल्कि अच्छा लगता है क्योंकि कई दिनों तक एक उत्सव का माहौल लगा रहता है."

नवीन निवास से केवल आधे किलोमीटर कि दूरी पर बीजद का मुख्य कार्यालय है. लेकिन वहाँ कोई ख़ास चहलपहल नज़र नहीं आता. इक्के-दुक्के पार्टी के कार्यकर्ता होते हैं. पूरी भीड़ नवीन निवास में ही देखने को मिलती है.

सुबह से शाम तक यहाँ दर्ज़नों पत्रकार दिखते हैं. कभी-कभी तीन-चार ओवी वैन भी लगी होती हैं.

अगर आप यह सोच रहे हैं कि मीडिया के लिए कोई ख़ास इंतज़ाम किए गए हैं तो आप ग़लत हैं. बेचारे पत्रकार गेट के बाहर धूप में आते-जाते नेताओं के पीछे-पीछे भागते नज़र आते हैं. कोई उन्हें पानी तक नहीं पूछता.

एक स्थानीय टेलीविज़न चैनल के रिपोर्टर शुभ्रांशु शेखर त्रिपाठी से जब मैंने पूछा कि वह बाहर क्यों खड़े हैं तो उनका कहना था; "हमें तभी अंदर बुलाया जाता है जब दूसरी पार्टी का कोई बड़ा नेता बीजद में शामिल हो रहा हो या फिर उम्मीदवारों की सूची जारी करनी हो. बाक़ी समय हमें बाहर ही खड़ा रहना पड़ता है."

'वह पुराने दिन'

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स्वाभाविक रूप से मन में यह प्रश्न उठता है कि यह सब कुछ आधे किलोमीटर दूर पार्टी ऑफिस में क्यों नहीं होता?

इस सवाल का जवाब देते हुए राज्य के ऊर्जा मंत्री और बीजद नेता अरुण साहू कहते हैं, "पार्टी के कार्यकर्ता इसे अपना घर मानते हैं. इसीलिए यहाँ आ जाते हैं. घर आए मेहमान को आप भगा तो नहीं सकते न."

लेकिन नवीन कार्यकर्ताओं से पार्टी ऑफिस में भी तो मिल सकते हैं? इस पर साहू का कहना था; "बीजू बाबू के ज़माने से इस घर के साथ हम लोगों का एक भावनात्मक सम्बन्ध रहा है. यही कारण है कि यह पार्टी का केंद्र बिंदु बन गया है."

अरुण साहू का कहना भले ही सच हो. लेकिन इस सच्चाई को नज़रअंदाज़ नहीं जा सकता कि जब तक बीजू पटनायक इस मकान में रह रहे थे, तब तक न इसे कोई नवीन निवास के नाम से जानता था और न ही यह पार्टी (उन दिनों जनता दल) का केंद्र बिंदु हुआ करता था.

सन 1990 से 1995 तक जब बीजू मुख्यमंत्री थे तब भी यहाँ सुरक्षा नहीं के बराबर होती थी.

कई लोग आज भी वे दिन बड़े प्यार से याद करते हैं जब एक रिक्शावाला भी बीजू से बिना किसी रोक-टोक के मिल सकता था. बीजू आम लोगों से यहां मिलते थे और पार्टी कार्यकर्ताओं से पार्टी ऑफिस में.

लेकिन नवीन के राज में उन्हीं के नाम बनी यह हवेली केवल बीजद ही नहीं बल्कि ओडिशा की पूरी राजनीति की केंद्र बिंदु बन गई है.

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