'चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात'

आशा सपेरा, काल बेलिया कलाकार

"आज आप इंटरव्यू ले रहे हैं. लोग ताली बजा रहे हैं. अच्छा लग रहा है, लेकिन कल हमें कोई नहीं पहचानेगा. कल से वही, जगह-जगह पर जाकर तमाशा दिखाएंगे और इंतजार करेंगे कि कोई फिर ऐसे महोत्सव में बुलाए."

ये शब्द थे राजस्थानी लोकनृत्य 'काल बेलिया' नृतकी आशा सपेरा के.

आशा ने स्पेन की मशहूर फ्लेमेंको डांसर तमार गोंज़ालेज़ के साथ जोधपुर में हुए पहले फ्लेमेंको जिप्सी महोत्सव में जुगलबंदी की. बीबीसी से हुई एक खास मुलाकात में अपना दर्द बयां किया.

जोधपुर के मेहरानगढ़ में राजस्थान और स्पेन से आए जिप्सी संगीतकारों औऱ फ्लेमेंको नृतकों का मजमा लगा. काफी लोग आए और इन कलाकारों की खूब प्रशंसा भी हुई लेकिन जहां स्पेन से आए कलाकार काफी खुश नज़र आए वहीं राजस्थानी लोक कलाकारों के चेहरे थोड़े मुरझाए हुए थे.

इस महोत्सव के खत्म होने के बाद अब एक बार फिर उन्हें काम की तलाश में जुटना होगा.

देखें: कालबेलिया-फ़्लेमेंको की जुगलबंदी

लोगों की उपेक्षा

बंजारा समुदाय के 'लंगा' घराने के खां बंधुओं ने बीबीसी को बताया कि वो इस महोत्सव में आ गए, ये किस्मत की बात है वर्ना बंजारा समुदाय के लोगों को जल्दी काम नही मिलता. पूरे दिन गाने बजाने के बाद दो वक्त की रोटी का ही जुगाड़ हो पाता है.

13 साल से राजस्थानी लोक नृत्य कर रहे क्वीन हरीश का कहना था, "लोग जिप्सी या बंजारों को आज भी जादूगर या चोर समझते हैं. उनके संगीत को सुनना सभी पसंद करते हैं लेकिन कोई उन्हें काम देना पसंद नही करता."

फ्लेमेंको संगीत के लेजेंडरी पियानो वादक चानो डोमिनगुएज़ से जब बीबीसी ने जिप्सी कलाकारों की इस हालत के बाबत बात की तो चानो ने बताया, "भारत हमारे लिए एक आश्चर्यजनक अनुभव है. पहले स्पेन में भी जिप्सी कलाकारों की हालत अच्छी नहीं थी लेकिन अब उनकी संस्कृति और संगीत को पेटेंट दिया गया है साथ ही उन्हें सरकारी संरक्षण प्राप्त है. उन्हें आगे बढ़ने के मौके मिलते हैं. वहां जिप्सी संगीत और जिप्सी कलाकारों को सम्मान दिया जाता."

भारत में वाकई जिप्सी कलाकारों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. 11 साल के जिप्सी गायक आबिद ने बीबीसी को बताया "मैं श्रेया घोषाल जैसा बनना चाहता हूँ लेकिन कुछ शब्द साफ़ नहीं बोल पता, कोई सही उच्चारण सिखाने वाला ही नहीं है. बड़े म्यूजिक स्कूलों में तो पढ़े लिखे बच्चों को ही एडमिशन देते हैं." राजस्थान में बंजारा समुदाय (गडोलिया, सपेरा, लंगा, लांगरिया आदि) की आबादी काफी अधिक है.

देखें: फ़्लेमेंको-जिप्सी महोत्सव

मौलिकता का सवाल

इस महोत्सव का आयोजन जोधपुर के राज परिवार ने किया गया था. पूर्व राज्यसभा सांसद और 1952 से 1971 तक जोधपुर के राजा रहे महाराज गज सिंह ने बीबीसी से विशेष मुलाकात में बताया कि आखिर बंजारों की ऐसी हालत क्यों है?

उन्होंने कहा, "इन समुदायों को सरंक्षण देने में समस्या ये है की विदेशी जिप्सियों की तरह ये इनका मौलिक संगीत नहीं है. ये या तो पुराने समय से चले आ रहे लोक गीत गाते हैं या फिर फ़िल्मी गीत. रचना की मौलिकता का सवाल उठना लाजिमी है."

रचना की मौलिकता भले ही एक जायज़ सवाल है लेकिन बंजारे और उनका संगीत भारतीय संस्कृति का एक हिस्सा हैं और ये बात वाकई तकलीफ पहुंचाती है कि उनके अपने ही देश में बंजारों को उनका हक नहीं मिलता.

वो आज भी अपने संगीत और नृत्य के साथ ऐसे ही किसी महोत्सव या किसी नुक्कड़ या चौपाल पर आपको गाते मिल जाएंगे: "आवो नि माहरे देस… आवो नि माहरे देस."

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