पुरुष क़ुलियों की भीड़ में वो अकेली औरत

  • 23 मार्च 2014

रेलवे प्लेटफार्म पर भारी शोरगुल और भीड़भाड़ के बीच बोझा उठा कर चलना आसान तो नहीं है. ख़ास तौर पर तब जब सामान ढोने का यह पेशा आम तौर पर मर्दों का ही माना जाता है. पर जब मन पर ममता का भार हो तो माँ अपने बच्चों के लिए हर बोझ ढोने की हिम्मत उठा ही लेती है. मैंने भी यही किया.

जयपुर के हमारे इस स्टेशन पर 177 पुरुष कुली काम करते हैं. मेरे पति (नाम महादेव) भी यहीं सामान ढोने का काम करते थे. लीवर ख़राब हो गया. वे गुज़र गए. एक साल हुए हैं, मुझे भी अपने बच्चों की परवरिश करनी थी तो दूसरा कोई रास्ता नहीं था. मेरी बांह पर लगा 15 नंबर का बिल्ला उन्हीं का है.

जब पति जिंदा थे तब तो मैं अपने गाँव सुन्दरपुरा, फुलेरा तहसील में रहती थी. मेरा गाँव जयपुर ज़िले में ही पड़ता है. पर पति की मौत के बाद बिना कमाई के आखिर गाँव में गुज़ारा कैसे होता?

ससुराल में भी तो कोई नहीं है—न सास, न ससुर न कोई देवर जेठ जिनसे कोई आस हो. बाप भी नहीं है और मेरा एक भाई और छह बहिनें भी अपना गुज़ारा मुश्किल से ही कर पाते हैं.”

बेहद मुश्किल था काम

ऐसे मुझे ही हिम्मत करनी पड़ी. डेढ़ सौ से ज्यादा “जेंट्स” के बीच में काम करना आसान थोड़े ही है. मैंने तब सोचा था आदमी लोग 500-700 रुपया कमाते होंगे तो मैं भी 200-300 रुपये तो कमा ही लूंगी.

पर शुरू में मुझे यह काम बहुत मुश्किल लगा. मर्द कुलियों की ज़मात में बैठने में बहुत झिझक लगती थी. काम करने में भी बहुत झिझक लगी. शर्म में मारे पांच किलो वज़न भी ऐसा लगता था जैसे पहाड़. जूते पहनने की आदत नहीं थी तो पाँव की उँगलियों में छाले भी पड़ गए.

शुरू के छह महीने बड़ी मुश्किल में गुज़रे. हर दिन रोते-रोते निकला. यही सोचती रहती कि ज़िन्दगी कैसे सफल होगी. न खाना अच्छा लगता न नींद आती. ज़्यादा सोचते रहने से मैं बहुत बीमार भी पड़ गयी और अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. करीब 30-35 हज़ार इलाज टेस्ट में पूरे हो गए.

फिर माँ ने समझाया कि ना हमारे पास ज़मीन है ना खेती-बाड़ी फिर बच्चों को कैसे पालेगी? माँ की बात ठीक थी.

मुझे भी जल्दी ही समझ में आ गया कि गाँव में सौ रुपये में गुज़ारा हो जाता था पर जयपुर में 500 बिना नहीं चल सकता. फिर समझ गई कि खुद का काम खुद को ही करना पड़ता है. भूख बड़ी चीज़ है. सब सिखा देती है.

सर्दी के मौसम में मैं तीन पारी में काम करती हूँ सुबह पांच से आठ, फिर बारह से तीन और शाम को पांच से आठ. पर गर्मी में बोझ उठाने की अभी भी आदत नहीं हुई है. गर्मी में सिर्फ़ सुबह और शाम ही काम कर पाती हूँ. मेरा दम भर आता है और ज्यादा काम करूँ तो जैसे घायल ही हो जाती हूँ. कम से कम छह राउंड ऊपर नीचे चढ़ने के हो जाते हैं.

कई बार नहीं होती आमदनी

वैसे स्टेशन पर सब कुलियों का और कुली यूनियन के अध्यक्ष शिव दयाल का काफी सहयोग रहा है. सब अपनी बारी के हिसाब से सामान उठाते हैं. और सामान लोड करने में मदद भी.

पर मोल-भाव तो करना ही पड़ता है. वो पैसेंजर–पैसेंजर के ऊपर है. कोई ख़ुशी-ख़ुशी 500 रुपये दे देता है तो कोई पचास के लिए भी काफी हो-हुज्ज़त करता है. कई बार कुछ आमदनी नहीं होती तो माथा ख़राब हो जाता है.

स्टेशन के पास ही मैंने एक कमरा ले रखा है 2500 रुपये महीने किराये पर. इस तीन मंजिला इमारत में रहने वाले अधिकतर कुली ही हैं. यहाँ की लोहे की संकड़ी सीढ़ियों पर चढ़ना उतरना भी सरल काम नहीं है. पर जीवन के उतार चढ़ावों की ही तरह मैंने इसे भी अपने जीवन का हिस्सा मान लिया है.

इस छोटे से कमरे में मेरी छोटी सी गृहस्थी समाई है. एक आले में हनुमानजी, लक्ष्मीजी और गणेशजी की मूर्ति लगाई है तो एक में पति की तस्वीर है. यही कमरा हमलोगों की रसोई भी है, सोने का कमरा भी, बच्चों की स्टडी भी और तो और उनका टेलीविज़न भी यहीं है.

गाँव के खुले घर और चूल्हे के बने खाने का स्वाद तो वो पीछे छोड़ आए हैं पर उस सोंधी सुगंध की याद दिलाने वाला मिटटी का तवा मैं ज़रूर अपने साथ ले आई है. इस पर रोटी सेंकते वक़्त मैं अमूमन खो जाती हूं पुरानी यादों में और पल भर को भूल जाती हूं दिन भर की थकान. रेलगाड़ी का शोर.

मेरे तीन बच्चे हैं. दो बेटी, एक बेटा. बड़ी बेटी आरती आठवें में गई हैं जबकि पूजा पांचवें पढ़ती है. सबसे छोटा बेटा राहुल दूसरी कक्षा में है.

मैं ख़ुद तो बिलकुल पढ़ी-लिखी नहीं हूँ वर्ना शायद कोई और नौकरी कर पाती. अब चाहती हूँ कि कम से कम मेरे बच्चे तो पढ़-लिख कर ऊँचे बन जाएँ.

इस मेहनतकश ज़िंदगी के बीच मुझे इंतज़ार है उस सुबह का जब मेरे बच्चे पढ़ लिखकर कुछ बन जाएंगे. तभी मेरी मेहनत कामयाब होगी.

(बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए राजस्थान से आभा शर्मा की प्रस्तुति)

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