शिव सेना: 'ना तो विचारधारा है, ना ही विज़न'

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शिव सेना के उदय और पिछले नौ वर्षों के दौरान महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के उभार को समझने के लिए राज्य की जटिल रूपरेखा को समझना ज़रूरी है.

इस राज्य का जन्म भी आंध्र प्रदेश राज्य के लिए शुरू हुए आंदोलन के साथ हुआ. जैसा कि सभी जानते हैं कि आंध्र आंदोलन के नेता पोट्टि श्रीरामुलू के आमरण अनशन, जिसमें उनकी शहादत हो गई, के चलते पंडित जवाहर लाल नेहरू को ऐसे राज्य के गठन के लिए तैयार होना पड़ा जिसमें तेलंगाना भी शामिल था.

वास्तव में, तेलंगाना के लोग अपना अलग राज्य चाहते थे, लेकिन इस प्रक्रिया में उनकी मांग को नज़रअंदाज कर दिया गया.

भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का विचार भारत में पहली बार 1920 के दशक के अंत में उठा.

उस समय इसका मॉडल सोवियत रूस था, जहां कई भाषाएं थीं, इसके बावजूद वो एक 'संघ' का हिस्सा थे.

हालांकि, श्रीरामुलू के बलिदान तक इस विचार को ठंडे बस्ते में डालकर रखा गया था.

संयुक्त महाराष्ट्र

मराठी लोगों को एक राज्य के रूप में संगठित करने का विचार 1930 के दशक में भी था, लेकिन आज़ादी के बाद इसमें राजनीतिक उभार आने लगा.

आंध्र प्रदेश राज्य के गठन के बाद तो इसमें चरमपंथी उभार देखने मिले. संयुक्त महाराष्ट्र समिति (एसएमएस) की गतिविधियां 1950 के दशक के अंत में बढ़ने लगी थीं. उस समय तक ये साहित्यकारों, मीडिया, सामाजिक आंदोलनकारियों और वामपंथी दलों के बीच एक सांस्कृतिक विमर्श का मसला था.

भाषा, संस्कृति और अलग पहचान पर गर्व की भावना तेज़ी से राजनीतिक रूप ले रही थी, और एक बार फिर पंडित नेहरू को मुंबई क्षेत्र के जनदबाव के आगे झुकना पड़ा. मुंबई एक द्विभाषी राज्य था, जिसमें आसपास के अंचलों के लोग आकर बसे थे.

'द्विभाषी' यानी एक ऐसा समाज जहां मराठियों और गुजरातियों का प्रभाव था.

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हालांकि मराठी बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक थी, लेकिन ये मुंबई में 50 प्रतिशत से अधिक नहीं थे. गुजराती 15 प्रतिशत से कम थे. लेकिन मोटे तौर पर उद्योग और व्यापार पर गुजरातियों और मारवाड़ियों का नियंत्रण था.

मराठी लोग या तो श्रमिक वर्ग में थे या फिर क्लर्क. महाराष्ट्र आंदोलन इसी वर्ग की भौतिक और सांस्कृतिक आकांक्षाओं की प्रतिध्वनि थी.

इसलिए राज्य के गठन के बाद जल्द ही उनकी राजनीति के केंद्र में मराठी लोगों को नौकरी और आजीविका देने की मांग आ गई. इस वर्ग ने शिव सेना को जन्म दिया.

शिव सेना का कैडर

मुंबई, हालांकि महानगरीय और बहु-सांस्कृतिक, बहुभाषी शहर था, लेकिन मोटे तौर पर यहां उत्तर भारतीय या हिंदी भाषी लोग बहुत अधिक संख्या में नहीं थे.

लिखा-पढ़ी का काम करने वाले निम्न मध्य वर्ग में ज़्यादातर दक्षिण भारतीय थे. इसमें चारों दक्षिणी राज्यों के लोग समान रूप से थे.

साठ का दशक कई तरह की परेशानियों वाला था. अर्थव्यवस्था में मंदी थी और बेरोज़गारी बढ़ रही थी.

जब महाराष्ट्र बना तो दो अन्य राज्य अपने आप बन गए- कर्नाटक और गुजरात. परिणाम स्वरूप पांच साल (1955-60) के भीतर चार राज्यों का जन्म हुआ- आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक.

मराठी भाषी मुंबईकर ये दलील देने लगे कि राज्य का गठन उनके फ़ायदे के लिए हुआ है और वो राज्य के गठन का फ़ायदा दूसरों को देने से इनकार करने लगे.

ऐसे में शिव सेना ने निम्न मध्य वर्ग के दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाना शुरू कर दिया, जो नौकरी की तलाश में मुंबई आते थे. वो कम वेतन वाली नौकरी करते थे. शिव सेना और दक्षिण भारतीयों के बीच टकराव पहचानवादी राजनीति का केंद्र बिंदु बन गया.

उत्तर प्रदेश की तरह महाराष्ट्र भी राजनीतिक रूप से विभाजित राज्य है. राज्य के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने में मराठी भाषा अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

महाराष्ट्र की छवि राजनीतिक और सामाजिक रूप से एक प्रगतिशील राज्य की बनी. इसकी वज़ह 19वीं सदी के अंत में और 20वीं सदी की शुरुआत में वहां हुए सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन थे.

मराठी समाज

लेकिन ये छवि और इस पर बनी राजनीतिक सहमति लंबे समय तक नहीं चली. राज्य के गठन के बाद जल्द ही 1960 में विभिन्न जातियां ख़ुद को राजनीतिक रूप से संगठित करने लगीं.

इनमें सबसे बड़ा हिस्सा मराठों का था, जो कुंभी और मराठों में विभाजित थे. एक छोटा लेकिन सबसे अधिक नफ़रत का शिकार समुदाय ब्राह्मणों का था. ज़्यादातर ब्राह्मण नौकरशाही, शिक्षा और बैंकिंग के क्षेत्र में काम कर रहे थे. वो चार प्रतिशत से भी कम थे लेकिन एक जाति के रुप में पेशवा के तहत आने वाले राज्य के ज़्यादातर हिस्सों में उनका आधिपत्य था.

इसलिए साहित्य, शिक्षा और यहां तक कि राजनीति पर उनकी अच्छी ख़ासी पकड़ थी. वो बुद्धिजीवी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे.

मराठा आमतौर पर खेती के काम में लगे थे. इसमें बड़े खेतिहर किसानों से लेकर भूमिहीन किसान तक शामिल थे. लेकिन वो जाति के आधार पर एक दूसरे से जुड़े थे.

शिव सेना को ऊंची जातियों के असंतोष के साथ ही श्रमिक वर्ग की बेरोज़गारी की शिकायत से फ़ायदा मिला. इसके समर्थक बहुत बड़े काश्तकार या बहुत अधिक पढ़े लिखे लोग नहीं थे. मोटे तौर पर निम्न कौशल और निम्न आय वाले लोग ही इसके सदस्य थे. आक्रामक आंदोलन के लिए ये वर्ग एकदम सही था.

शिव सेना ने 68 सालों के अपने इतिहास में कोई भी संस्थागत आधार, कोई भी जाति आधारित समर्थक नहीं तैयार किया. मराठी समुदाय आमतौर पर उद्योग और व्यापार से दूर रहा है और इस कारण आर्थिक गतिविधियों में वो हाशिए पर रहे.

विज़न का अभाव

बढ़ती बेरोज़गारी के साथ ही शिव सेना की हैसियत भी बढ़ती गई. शिव सेना सिर्फ़ राजनीति करती है और इसकी मदद से ठेकेदारों का नेटवर्क तैयार करती है.

एमएनएस का जन्म भी इसी प्रक्रिया से हुआ है. ये उन लोगों के बीच विभाजन है जिनके पास राजनीति के अलावा दूसरा कोई आजीविका का साधन नहीं है. उनकी कोई विशेष विचारधारा नहीं है, कार्यक्रम नहीं हैं, महाराष्ट्र के लिए कोई विज़न नहीं है, न ही भारत के परिप्रेक्ष्य में कोई विज़न है.

यहां तक कि भाषा को लेकर गर्व भी इतना सतही है कि शिव सेना और एमएनएस के ऊपर से नीचे तक ज़्यादातर नेता अपने बच्चों को पढ़ने के लिए अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजते हैं. लेकिन, भाषाई और सांस्कृतिक पहचानवादी राजनीति के अलावा उनका कोई एजेंडा नहीं है. इसके लिए वो मुंबई, पुणे और नासिक जैसे मुख्य शहरी केंद्रों में हंगामा खड़ा कर सकते हैं.

अगर उन्हें मीडिया और ख़ास तौर से पिछले दो दशक के दौरान इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अनुचित समर्थन न दिया होता तो उनका आंदोलन और संगठन राज्य की राजनीतिक चेतना से मिट गया होता. लेकिन जिन्हें मीडिया ने जन्म दिया है, वो मीडिया के ज़रिए ही ख़त्म हो जाते हैं.

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