सोशल मीडिया के फ़र्श से पार्टी के अर्श तक

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मुंबई की प्रीति गांधी सुबह उठकर अपनी आठ साल की बेटी और पांच साल के बेटे को स्कूल छोड़ने जाती हैं. और लौटते हुए अपने मोबाइल से ट्वीट करती हैं. उनके दिन का ज़्यादातर हिस्सा ट्विटर पर भाजपा के विरोधियों पर हमला करते हुए बीतता है.

प्रीति गांधी एक गृहिणी हैं और भाजपा के उन सैकड़ों स्वयंसेवकों में से एक हैं जो नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए ट्विटर और फ़ेसबुक पर अभियान छेड़े हुए हैं. लेकिन प्रीति को जो बात दूसरे स्वयंसेवकों से अलग करती हैं वो उन्हें भाजपा में बहुत जल्दी मिला पद है.

ट्विटर और फ़ेसबुक पर कुछ ही साल तक पार्टी के पक्ष में प्रचार करने के बाद भाजपा ने उन्हें महाराष्ट्र की कम्युनिकेशन सेल का को-कन्वीनर बना दिया है. नरेंद्र मोदी 'की पूजा करने वाली' प्रीति को ट्विटर पर 48,000 से ज़्यादा लोग फ़ॉलो करते हैं. शायद प्रीति की लोकप्रियता की वजह उनका दिलचस्प ट्विटर हैंडल @MrsGandhi भी है.

प्रीति ने बीबीसी से कहा, "तीन साल पहले मेरा ट्विटर पर आने का कोई इरादा नहीं था. लेकिन मैंने शुरू किया और मैंने जो टिप्पणियां की लोगों ने उन्हें पसंद किया. मेरे कुछ दोस्त मस्ती में मुझे मिसेज़ गांधी कह कर बुलाते थे. ये मज़ाक मैं थोड़ा आगे ले गई."

प्रीति के साथ मज़ाक तब भी हुआ था जब उन्हें एक संगठन ने सिर्फ़ इसलिए सबसे बढ़िया 'कांग्रेस प्रवक्ता' का अवॉर्ड दे दिया था क्योंकि उनके नाम में गांधी जुड़ा हुआ है.

'ट्रोलिंग ज़िंदगी का हिस्सा'

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जूलियन असांज के पोस्टर की तस्वीर रिट्वीट करने को लेकर हुए विवाद में भी प्रीति का नाम आया था. हालांकि प्रीति का दावा है कि इससे भाजपा की छवि को कोई नुकसान नहीं हुआ है.

प्रीति की ही तरह कांग्रेस की प्रियंका चतुर्वेदी को भी ट्विटर पर पार्टी का बचाव करने का फ़ायदा मिला. प्रियंका चतुर्वेदी ने कांग्रेस का बचाव ऐसे वक़्त करना शुरू किया था जब कांग्रेस सोशल मीडिया को गंभीरता से नहीं लेती थी.

टेलीविज़न चैनलों पर कांग्रेस का पक्ष रखने वाली प्रियंका कहती हैं, "मैं जिस परिवार से आती हूं वो कांग्रेस के मतदाता रहे हैं. मैं कांग्रेस की विचारधारा को काफ़ी पसंद करती थी. मैंने कांग्रेस को डिफ़ेंड करना शुरू किया और तब मेरी काफ़ी ट्रोलिंग होती थी. मुझे पार्टी से हमेशा प्रोत्साहन मिला है और अब मैं पार्टी की नेशनल कम्युनिकेशन टीम की भी सदस्य हूं."

वो कहती हैं, "सुबह और रात को मैं ट्वीट करती हूं. मेरा जो बिज़नेस था मैंने उसे भी होल्ड पर रखकर इस पर ध्यान दिया. ट्रोलिंग अब ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी है. जब मेरी एक फ़ेक फ़ोटो बनाकर फैलाई गई थी उस समय मुझ पर असर पड़ता था, अब कोई असर नहीं पड़ता. मैं इसे इनाम नहीं मानती, ये मानती हूं कि पार्टी ने काम को समझा है."

'एक आदमी का काम नहीं'

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सोशल मीडिया पर भाजपा को आम आदमी पार्टी ने कड़ी चुनौती दी है.

दिल्ली चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने वाली आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य अंकित लाल 12 साल पहले पटना से दिल्ली आए थे. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अन्ना हज़ारे के आंदोलन के वक़्त वे एक स्वयंसेवक थे. साल 2012 में जब आम आदमी पार्टी बनी तब अंकित ने 'आप' का प्रचार करना शुरू किया.

वो कहते हैं, "आम आदमी पार्टी नई पार्टी थी, लोग जानते नहीं थे. हमने लोगों को इसके बारे में बताया. इसके बाद लोगों को ये बताया कि ये पार्टी किन मुद्दों पर लड़ रही है और फिर ये बताया कि जिन मुद्दों पर हम लड़ रहे हैं उनके लिए हमारे पास क्या हल हैं. मैं अब ट्विटर पर दो से तीन घंटे देता हूं."

अंकित का भी विवादों से रिश्ता रहा है. अभिनेत्री राखी सावंत को लेकर एक चुटकुला ट्वीट करने के बाद विवाद होने पर उन्हें ट्विटर पर माफ़ी मांगनी पड़ी थी.

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हालांकि अंकित 'आप' की राष्ट्रीय परिषद में जगह मिलने को किसी तरह का इनाम नहीं मानते. वो कहते हैं, "ये किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से स्वयंसेवक इस अभियान को सफल बनाने में लगे हुए थे."

लेकिन सवाल ये भी है कि क्या अंकित, प्रीति और प्रियंका जैसे सोशल मीडिया स्वयंसेवक किसी चुनाव क्षेत्र में मतदाताओं को प्रभावित कर पाएंगे.

सपा-बसपा क्यों दूर?

एनडीटीवी और ईटीनाउ के लिए काम कर चुकी पत्रकार और 'द बिग कनेक्ट: विल सोशल मीडिया बि ए गेम चेंजर इन इलेक्शंस 2014' (क्या सोशल मीडिया 2014 के चुनाव में बड़ी भूमिका निभाएगा) की लेखक शैली चोपड़ा कहती हैं. "हर एक पार्टी ने इस बात को समझा है कि सोशल मीडिया का आइडिया इस चुनाव में काफ़ी अहमियत रखता है क्योंकि युवा इस चुनाव में मायने रखते हैं. किस तरह 35 साल से कम उम्र के करीब साढ़े चौदह करोड़ इस चुनाव में वोट करेंगे."

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Image caption पत्रकार शैली चोपड़ा का मानना है कि सोशल मीडिया को समझने में कांग्रेस ने देरी की.

ऐसे में अगर कांग्रेस, भाजपा और आप अगर सोशल मीडिया की ताकत को पहचान रही हैं तो समाजवादी पार्टी और बसपा इनसे क्यों दूर हैं?

शैली चोपड़ा कहती हैं, "लंबे वक़्त तक पार्टियां समझती थीं कि ये टूल नहीं टॉय है. पिछले चुनाव में अखिलेश यादव ने काफी कोशिश थी कि लोगों से सोशल मीडिया के ज़रिए जुड़ें. लालू यादव भी ट्विटर पर आए हैं. ये वही लालू यादव हैं जो एक वक़्त कहते थे कि ये आईटी-वाईटी क्या चीज़ है. बाकी नेता अभी समझ रहे हैं कि ये युवाओं तक पहुंचने का एक ज़रिया है.

वो आगे कहती हैं, "कांग्रेस ने भी ग़लती की थी. कांग्रेस ने पहले कहा था कि हमारे वोटर गांवों में हैं और हमारे वोटर सोशल मीडिया पर नहीं हैं. अब राहुल अपने कार्यकर्ताओं से भी गूगल हैंगआउट पर बातचीत करते हैं."

तो क्या ये सोशल मीडिया स्वयंसेवक चुनाव भी लड़ेंगे. प्रीति और प्रियंका जहां इसका फ़ैसला अपनी-अपनी पार्टियों पर छोड़ने की बात करती हैं, वहीं अंकित इन स्वयंसेवकों की सीमा अपने ही शब्दों में जाहिर कर देते हैं. वो कहते हैं, "अगर ट्विटर पर चुनाव होने लगे तो ज़रूर लड़ूंगा."

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