छत्तीसगढ़: शराब से होनी वाली मौतें कब रुकेगी?

भारत के छत्तीसगढ़ में शराब की दुकान

बिलासपुर के छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान में सोमवार और मंगलवार को 11 ऐसे लोगों की मौत हो गई, जिन्हें अत्याधिक शराब पीने के बाद तबीयत बिगड़ने के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था. अस्पताल में शराब पी कर बीमार पड़ने वाले ऐसे लोगों की संख्या 34 थी.

शराब पी कर अस्पताल में भर्ती होने या अत्याधिक शराब पी कर मरने की खबरें छत्तीसगढ़ के हरेक ज़िले में आम बात है.

असल में छत्तीसगढ़ में शराब पीने वालों की संख्या पिछले कुछ सालों में तेज़ी से बढ़ती चली गई है. राष्ट्रीय वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण की मानें तो छत्तीसगढ़ के 100 में से 32 लोग शराब पीने के आदी हैं, जो देश में सर्वाधिक है.

राज्य के आबकारी मंत्री अमर अग्रवाल राज्य के स्वास्थ्य मंत्री भी हैं. वे कहते हैं, "हमारा प्रयास ये है कि इसकी खपत कम होनी चाहिये क्योंकि यह एक सामाजिक बुराई है. लेकिन पूरे देश में कहीं भी क़ानून के माध्यम से नशाबंदी सफल नहीं हो सकती."

आंकड़ों को देखें तो राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़ में देसी शराब की खपत 2002-03 में जहां 188.12 लाख प्रूफलीटर थी, वह 10 साल बाद 2012-13 में 395.19 लाख प्रूफलीटर हो गई. वहीं जिस छत्तीसगढ़ में 130.04 लाख लीटर विदेशी शराब खपती थी, वहां अब यह बढ़कर 592.89 लाख लीटर हो गई है.

राज्य सरकार को इस दौरान 362.48 करोड़ रुपये की आय होती थी, जो अब 2485.73 करोड़ रुपये हो गई है.

खाद्य सुरक्षा क़ानून

यह भी दिलचस्प है कि राज्य में जनवरी 2008 में गरीबों को तीन रुपये में 35 किलो चावल दिये जाने की योजना शुरू होने के बाद से राज्य में शराब की बिक्री में आश्चर्यजनक रूप से तेज़ी आई है.

2008-09 में आबकारी विभाग को 965.05 करोड़ रुपये की आय होती थी. जो 2010-11 में 1188.32 करोड़ रुपये हो गई. इसके बाद 2011-12 में इस आय में जबरदस्त उछाल आया और यह 1624.35 पहुंच गई. लेकिन अगले साल का आंकड़ा चौंकाने वाला था. राज्य सरकार के अनुसार 2012-13 में आबकारी आय 2485.73 करोड़ जा पहुंची.

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का मानना है कि पिछले 10 सालों में राज्य में शराब की खपत छह गुणा हो गई है. जोगी का कहना है कि अगर किसी परिवार का कोई सदस्य 10 दिन महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना में काम करता है तो उसे 1500 रुपये मिल जाते हैं. उसके पूरे परिवार का राशन 50 रुपये में मिल जाता है.

जोगी कहते हैं, “सरकार ने जगह-जगह शराब की इतनी दुकानें खोल दी हैं कि गांव का आदमी उसी में अपने बचे हुये पैसे खर्च कर देता है. सरकार को चाहिये कि वह शराब की दुकानें बंद करे और राज्य के लोगों को बर्बाद होने से बचाए.”

समाधान

हालांकि जोगी किसी भी हालत में गरीबों को दिये जाने वाले सस्ते अनाज को बंद करने के पक्ष में नहीं हैं. उनका मानना है कि सरकार शराब की बिक्री को कम करे, यही इसका समाधान है.

पुरी पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती का आरोप है कि छत्तीसगढ़ में लोग धार्मिक होने के बजाये शराबी हो रहे हैं. शंकराचार्य का मानना है कि राज्य में गरीबों को सस्ता चावल देने के कारण लोग शराबी बन गए हैं.

वे कहते हैं- “एक रुपये प्रति किलो के हिसाब से 35 किलो चावल देने के कारण कोई काम नहीं करना चाह रहा है. मज़दूरी महंगी हो गई है, विकास का काम ठप्प पड़ गया है और लोग शराबी बन गए. सस्ता अनाज को बंद करना चाहिये और शराब की बिक्री भी.”

शराबबंदी

ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार राज्य में शराबबंदी का दावा करने से कभी पीछे हटी हो.

राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 17 जून 2011 को सार्वजनिक घोषणा की थी कि- “हमारी सरकार ने राजस्व का नुकसान सहकर भी राज्य में शराब बंदी लागू करने की मानसिकता बना ली है. अब शराबबंदी में भी छत्तीसगढ़ पूरे देश के लिए एक आदर्श राज्य बनेगा. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के छत्तीसगढ़ मॉडल की तरह हम देश को नशाबंदी का छत्तीसगढ़ मॉडल भी देंगे.“

तब राज्य सरकार ने 227 देशी और 36 विदेशी शराब दूकानों को बंद करने की जानकारी देते हुये मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा था कि “इससे 100 करोड़ रुपये की राजस्व की हानि होगी, हमें ऐसे राजस्व की जरूरत नहीं है. राज्य सरकार प्रदेशवासियों के व्यापक हित में राजस्व का नुकसान उठाकर भी छत्तीसगढ़ को नशामुक्त राज्य के रूप में देश में एक नई पहचान दिलाने के लिए वचनबद्ध है.”

आबकारी विभाग के अफसरों का दावा है कि अप्रैल 2011 से प्रदेश में आंशिक नशामुक्ति योजना शुरू की गई है, जिसके बाद देशी शराब की 286 और अंग्रेजी शराब की 49 दुकानें बंद की गई हैं.

लेकिन यह सब होने के बाद भी न तो सरकार को राजस्व का घाटा हुआ और न ही शराब की खपत में ही कहीं कमी आई. इसके उलट शराब की खपत बढ़ गई और ज़ाहिर तौर पर, राजस्व भी बढ़ गया.

जागरुकता की ज़रूरत

राज्य के सत्ता पक्ष के आदिवासी विधायक महेश गागड़ा शराब की बढ़ती खपत को रोकने के लिये सामाजिक जागरुकता पर बल देते हैं.

वहीं राज्य के आबकारी मंत्री अमर अग्रवाल शराब की खपत बढ़ने की बात से इनकार करते हैं. उनका कहना है कि राज्य चोरी-छुपे बनने-बिकने वाले शराब पर उन्होंने नीतिगत तरीके से रोक लगायी है, इसलिये अब सारी खपत कागजों में भी नज़र आने लगी है. वे इसे ‘छुपे हुये राजस्व का उजागर होना’ बताते हैं. वे आंशिक शराबबंदी पर भी ज़ोर देते हैं.

लेकिन इसका असर कितना होगा, इसका अनुमान हम रायपुर शहर की एक शराब की दुकान पर लिखे इस शेर से लगाने की कोशिश कर सकते हैं,

रहे न रिन्द ये वाइज के बस की बात नहीं, तमाम शहर है, दो चार दस की बात नहीँ.”

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