आम चुनाव: क्यों है यूपी में दम?

  • 22 मार्च 2014
राहुल गांधी, नरेन्द्र मोदी और मुलायम सिंह इमेज कॉपीरइट AFP. AP

एक पुरानी राजनीतिक कहावत है कि 'रायसीना हिल्स' का रास्ता लखनऊ से हो कर जाता है. साउथ ब्लॉक में जिन 13 पुरुषों और एक महिला ने प्रधानमंत्री के पद पर काम किया है उनमें से आठ उत्तर प्रदेश से आते हैं.

भारत की राजनीति में उत्तर प्रदेश का जितना महत्व है, उतना शायद किसी अन्य राज्य का नहीं. न सिर्फ़ भारत की आबादी का सातवाँ हिस्सा यहाँ रहता है बल्कि अगर वो एक स्वतंत्र देश होता तो आबादी के हिसाब से चीन, भारत, अमरीका, इंडोनेशिया और ब्राज़ील के बाद उसका दुनिया में छठवाँ नंबर होता. लेकिन बात सिर्फ़ आबादी की ही नहीं है.

जाने माने स्तंभकार और इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक सईद नक़वी कहते हैं, ''त्रिवेणी उत्तर प्रदेश में, काशी उत्तर प्रदेश में, मथुरा उत्तर प्रदेश में, अयोध्या उत्तर प्रदेश में.... कहने का मतलब ये कि उत्तर प्रदेश की सरज़मीं प्री-इस्लामिक संस्कृति का गढ़ भी रही है. इसको भारत की सभ्यता और राजनीति का मेल्टिंग पॉट या सैलेड बॉल कहा जा सकता है."

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नक़वी के मुताबिक़, "यहाँ ये उतनी अहम बात नहीं हैं कि यहाँ से भारत की 543 सदस्यों की संसद में 80 लोग जाते हैं, अहम बात है पाँच हज़ार साल पुराने मुल्क के लिए ये एक सिविलिज़ाइनेशनल डेप्थ या सिविलिज़ेशनल पुल की तरह काम करता है.टट

सियासी मायने

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हिंदी हार्टलैंड का केंद्र बिंदु होने के कारण उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम, उससे सटे हुए क्षेत्रों को भी प्रभावित करते हैं.

इलाहाबाद स्थित गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक संस्थान के प्रोफ़ेसर बद्रीनारायण इसके प्रतीकात्मक महत्व की ओर इशारा करते हैं, "उत्तर प्रदेश दो कारणों से महत्वपूर्ण है. एक तो जनतंत्र में अंकों का बहुत महत्व होता है. दूसरा हिंदी क्षेत्र होने के नाते न केवल 80 सीट बल्कि आसपास के चुनावों को भी प्रभावित करता है"

वो बताते हैं, "उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल, उससे लगे बिहार के दस ज़िलों के चुनाव परिणाम को भी प्रभावित करता है. उत्तर प्रदेश तीसरे मोर्चे की राजनीति के एक बड़े पुरोधा मुलायम सिंह यादव का क्षेत्र भी है. कहने का मतलब है कि विपक्ष की राजनीति में भी उत्तर प्रदेश का दख़ल बनता है."

बाहरी दुनिया को अगर दरकिनार कर भी दिया जाए और भारत के अंदर अन्य राज्यों से उत्तर प्रदेश की तुलना की जाए तो उत्तर प्रदेश की छवि एक ऐसे राज्य की उभरती है जहाँ सभी पूर्व और वर्तमान सरकारों के लिए गवर्नेंस कभी भी प्राथमिकता नहीं रही.

क़रीब एक दशक पहले चेन्नई में एक सेमिनार के दौरान भारत की चोटी की कंपनी के एक सीईओ ने कहा था, "मैं जब उत्तर प्रदेश के राजनेताओं से बात करता हूँ तो वो कहते हैं कि अगर वो सत्ता में आए तो अयोध्या में एक शानदार मंदिर बनाएंगे. अगर आप कर्नाटक के किसी राजनेता से यही सवाल पूछें तो उसका संभावित जवाब होगा कि वो बंगलौर की तरह वहाँ कई सिलिकॉन वैलीज़ बनाना चाहेगा."

अंक गणित

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अगर तथ्यों पर नज़र दौड़ाई जाए तो राज्य की क़रीब 19 करोड़ आबादी में से क़रीब 30 फ़ीसदी लोग ग़रीबी रेखा से नीचे रहते हैं जबकि राष्ट्रीय औसत 24 फ़ीसदी का है. 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य के सिर्फ़ 68 फ़ीसदी लोग पढ़े लिखे हैं जबकि राष्ट्रीय औसत 73 फ़ीसदी का है.

राज्य में प्रति हज़ार पुरुषों पर 898 महिलाएं हैं जो कि भारत के राज्यों में नीचे से चौथे नंबर पर है. अपराधों के लिए कुख्यात इस राज्य में प्रति एक लाख आबादी के लिए मात्र 74 पुलिसकर्मी हैं.

सुनने में ये बात अजीब सी लग सकती है लेकिन उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ 32 फ़ीसदी घरों में बिजली कनेक्शन है और प्रति व्यक्ति आमदनी में उसका स्थान भारत में नीचे से चौथा है.

राज्य की 63 फ़ीसदी आबादी को शौचालय की सुविधा प्राप्त नहीं है. लेकिन इसका एक सकारात्मक पहलू भी है कि इतनी बड़ी आबादी के साथ उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था, महाराष्ट्र के बाद भारत की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है.

क़रीब तीस सालों से कांग्रेस उत्तर प्रदेश में लगातार हाशिए पर जाती रही है. उन्होंने आख़िरी बार 1984 में यहाँ चुनावी जीत दर्ज की थी. मंडल और मंदिर के दो समानान्तर आंदोलनों ने राज्य में कांग्रेस की ईंट से ईंट बजा कर रख दी है.

क्षेत्रीय दल

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गवर्नेंस नाऊ के संपादक अजय सिंह इसके लिए क्षेत्रीय दलों के उदय को ज़िम्मेदार मानते हैं.

उनके मुताबिक़, "क्षेत्रीय दलों का जहाँ-जहाँ उदय हुआ है, वहाँ राष्ट्रीय दल साइडलाइन हो गए हैं. दक्षिण में भी ऐसा हुआ है. बिहार में हुआ है. जहाँ एक समय में इनका स्ट्रॉंगहोल्ड हुआ करता था. धीरे-धीरे कांग्रेस का संगठन कमज़ोर होता चला गया और ये ऊँची जातियों और ख़ासकर शहरी क्षेत्र का दल हो कर रह गया. ये बात कांग्रेस के लिए जितनी सच है बीजेपी के लिए भी उतनी ही सही है."

कांग्रेस के पतन का एक और कारण उच्च जातियों का कांग्रेस से मुंह मोड़कर भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ आकर्षित होना है.

सईद नक़वी की नज़र इसके समाजशास्त्रीय पहलू पर गई है, "उत्तर प्रदेश के सवर्णों में ब्राह्मणों की बहुत ही अनूठी जगह रही है. वो इस पूरे पिरामिड में सबसे ऊपर रहा है. लेकिन बिहार में ऐसा नहीं है. उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्रियों की लिस्ट उठा लीजिए. गोविंद वल्लभ पंत से लेकर हेमवतीनंदन बहुगुणा और नारायणदत्त तिवारी, सभी ब्राह्मण समुदाय से आते हैं."

नक़वी आगे बताते हैं, "मंडल आयोग के बाद से जब बराबरी पर आधारित समाज को बढ़ावा दिया जाने लगा और नीची जातियों को भी समझ में आने लगा कि वो भी राजनीतिक नियंत्रण लेने की ताक़त रखते हैं, तो मुलायम सिंह यादव और मायावती का उदय हुआ. ये जातियाँ संख्या में ब्राह्मणों से कहीं ज़्यादा थीं, इसलिए पिरामिड का नियंत्रण कांग्रेस से जाता रहा. ब्राह्मणों ने देखा कि कांग्रेस डूब रही है तो उन्होंने सोचा कि बीजेपी का हाथ थामा जाए."

भाजपा की ज़मीन

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मंदिर आंदोलन की वजह से बीजेपी फ़र्श से अर्श तक पहुंचने में सफल रही. लेकिन 1999 के चुनावों के बाद से बीजेपी में जो गिरावट शुरू हुई उसने रुकने का नाम नहीं लिया.

2012 के विधानसभा चुनाव में तो पार्टी का वोट शेयर घटकर सिर्फ़ 15 फ़ीसदी रह गया. पिछले तीन महीनों में ऐसे संकेत मिले हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा खोई हुई ज़मीन को दोबारा प्राप्त करने की कोशिश कर रही है.

गवर्नेंस नाऊ के संपादक अजय सिंह हाल ही में उत्तर प्रदेश से होकर आए हैं. उनका कहना है, "हमें दिखाई दे रहा था कि लोगों में व्यवस्थित दलों के प्रति एक अजीब सी उदासीनता या नाराज़गी है. इसके साथ-साथ कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि उनमें मोदी को लेकर एक सपना है. उस सपने के साथ वो अपने को जुड़ते हुए देख रहे हैं."

प्रोफ़ेसर बदरी नारायण कहते हैं, "पूरे देश में भाजपा का जो रिवाइवल हुआ है वो बीजेपी का नहीं मोदी का रिवाइवल है. जो एक टेलिविज़न समाज या सोशल मीडिया के ज़रिए हमारे गांवों तक फैलने लगा है. बहुत योजनाबद्ध तरीक़े से जिस तरह मोदी और उनकी टीम ने गुजरात मॉडल की पैकेजिंग की, उससे आधा झूठ भी सच लगने लगा है. दूसरी तरफ़ सवर्ण जातियाँ भी बहुत दिनों से इंतज़ार कर रही थीं कि भाजपा का रिवाइवल हो. लेकिन एक बात कि ओर आंकड़े जुटाने वालों का ध्यान नहीं गया है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का संगठन अभी भी कमज़ोर है और उनमें आपसी लड़ाई भी बहुत ज़्यादा है."

मायावती की माया

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क़ायदे से समाजवादी पार्टी के सत्ता में रहने और मुज़फ़्फ़रनगर जैसे संवेदनशील मुद्दों के ढ़ंग से हैंडिल न कर पाने का सीधा लाभ विपक्ष में बैठी बहुजन समाज पार्टी को जाना चाहिए था लेकिन वो उनकी तरफ़ न जाकर भाजपा की तरफ़ जा रहा है. लेकिन अजय सिंह का मानना है कि ये कहना ग़लत है कि बहुजन समाज पार्टी कमज़ोर हुई है.

उन्होंने कहा, "हमने देखा है कि उनमें से कोई भी पार्टी छोड़कर भागा नहीं है और उनके साथ और भी वोट आ रहे हैं. मैं तो कहूंगा कि बसपा पहले की तुलना में मज़बूत हुई है. भाजपा को छोड़कर अगर किसी पार्टी में इस चुनाव को लेकर थोड़ा सा उत्साह है तो वो यही पार्टी है.''

संकेत इस बात के ही मिल रहे हैं कि इस चुनाव के बाद हिंदी हार्टलैंड की भूमिका पहले के मुक़ाबले अधिक महत्वपूर्ण होगी. अगर भाजपा उत्तर प्रदेश से चालीस सीटें नहीं ला पाती है तो राष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी भूमिका बहुत सीमित हो जाएगी.

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