'पाकिस्तानियों को रहता था चुटकुलों का इंतजार'

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ख़ुशवंत सिंह जितने लोकप्रिय हिंदुस्तान में थे उतने ही पाकिस्तान में. उनकी लेखनी के कायल आम से लेकर ख़ास लोग तक थे. भारत-पाक विभाजन जैसे गंभीर मुद्दों से लेकर चुटकुलों तक बहुत हल्के-फुल्के अंदाज़ में अपनी बात कहने में उन्हें महारत हासिल थी. बीबीसी उर्दू सेवा के संवाददाता आरिफ़ वक़ार ने उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को यहां उजागर किया.

ख़ुशवंत सिंह का सबसे बड़ा संबंध लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से रहा है.

विभाजन के बाद जो लोग सरहद की दूसरी ओर चले गए और जिनके बच्चे आज 90 या 80 साल के हो रहे हैं, वो इस कॉलेज से बहुत अच्छी तरह वाकिफ़ हैं.

ख़ुशवंत सिंह भी इसी कॉलेज के छात्र थे. चूंकि पंजाब से उनका ताल्लुक था इसलिए उनकी लेखनी में भी इसकी साफ़ झलक दिखाई देती है.

उनकी जो पुस्तक युवावस्था में हमने पढ़ी वो थी 'ट्रेन टू पाकिस्तान'. उस समय यह काफ़ी लोकप्रिय हुई. उसका उर्दू और पंजाबी में भी अनुवाद हुआ.

यह पुस्तक थी तो अंग्रेज़ी में, लेकिन इसमें पंजाबी के शब्दों और यहां तक कि गालियों का भी शब्दशः इस्तेमाल हुआ है.

उनकी सभी पुस्तकें पाकिस्तान में उपलब्ध हैं सिवाय 'ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर' के, क्योंकि यह हिंदी में प्रकाशित हुई और इसका किसी वजह से उर्दू में अनुवाद नहीं हो पाया.

'खूब नकल हुई'

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उनकी पुस्तकों के कुछ अंश के पाकिस्तान में हूबहू नकल करने के भी मामले सामने आए. जैसे उनकी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ सिख्स' से कई हिस्सों का इस्तेमाल कुछ लोगों ने अपनी पीएचडी की थीसिस में किया.

एक सज्जन ने तो इसमें थोड़ा फेरबदल कर पूरी किताब ही उर्दू में अपने नाम से छपवा ली.

यह उनका बहुत महत्वपूर्ण काम था. इसलिए जब उन्हें इसका पता चला तो उन्होंने आवाज़ भी उठाई.

यहां लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता उनके उपन्यास और शोधपरक कार्यों की वजह से भी खूब थी.

वो बहुत ही ख़ुशमिज़ाज व्यक्ति थे और उनके हास्यबोध में ख़ास पंजाबियत की झलक दिखती थी.

इसीलिए यहां उनके चुटकुले काफी लोकप्रिय थे.

इलस्ट्रेटेड वीकली में जो भी चुटकुले प्रकाशित होते वे यहां भी पहुंच जाते. बाद में इन चुटकुलों का संकलन प्रकाशित हुआ, जो काफी लोकप्रिय हुआ.

दिलचस्प है कि वो स्वयं सिखों पर चुटकुले सुनाया करते थे.

चुटकुले

उदाहरण के लिए उनका पहला चुटकला जो पाकिस्तान में काफी लोकप्रिय हुआ, वो था एक टैक्सी ड्राइवर के बारे में.

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चुटकुला कुछ ऐसे था- वो एक बार टैक्सी से साकेत जा रहे थे. सफ़र लंबा था सो ड्राइवर ने सोचा कुछ बात ही की जाए. उसने पूछा आप क्या काम करते हैं. इस सवाल पर ख़ुशवंत सिंह पसोपेश में पड़ गए कि इलस्ट्रेटेड वीकली ड्राइवर के समझ में आएगा भी की नहीं. काफ़ी सोच विचार के बाद उन्होंने कहा, 'मैं बिड़ला का मुलाज़िम हूं.' ड्राइवर ने कहा, 'अगर बिड़ला का मुलाज़िम मैं होता तो आपसे ज़्यादा कमाता.' उन्होंने पूछ लिया वो कैसे? ड्राइवर का जवाब था, 'जो बिड़ला की आमदनी होती वो तो मेरी होती ही, साथ में मैं टैक्सी भी चलाए रखता.'

इसके बाद लोगों को उनके चुटकलों का इंतजार रहने लगा. जब इनके संकलन आने शुरू हुए तो वो बहुत लोकप्रिय हुए.

एक शोध के दौरान लंदन में बीबीसी कार्यालय में मुझे उनके कुछ ऐसे पत्र मिले, जो 40 या 50 के दशक में लिखे गए थे. मैं मान सकता हूं कि उनके बारे में शायद ही किसी को पता हो.

उन पत्रों से मुझे पता चला कि साल 1947 में भारतीय विदेश सेवा में अपने कैरियर की शुरुआत उन्होंने कनाडा से की थी. उसके बाद लंदन में भारतीय उच्चायोग में आ गए थे. वे यहां तीन साल तक रहे.

देसी अंदाज़

उन्हीं दिनों बीबीसी की हिंदुस्तानी सेवा से कश्मीर को लेकर एक रिपोर्ट प्रसारित हुई जो भारत के पक्ष में नहीं थी. इसलिए भारत सरकार भी इससे खुश नहीं थी.

भारत सरकार ने उन्हें निर्देश दिया कि इस बारे में वो कुछ करें. इसपर ख़ुशवंत सिंह ने बीबीसी हिंदी सेवा को एक पत्र लिखा, बिल्कुल देसी स्टाइल में.

उनके पत्र का मजमून कुछ यूं था, ''देखो जी मैं एक सरकारी नौकर हूं, हिंदुस्तान सरकार का और आप भी सरकारी नौकर हैं इंग्लिशतान सरकार के. इस तरह हम दोनों भाई-भाई हुए. इसलिए हमें एक दूसरे के हितों का ध्यान रखना चाहिए.''

इसके जवाब में बीबीसी हिंदी सेवा के इंचार्ज ने बहुत कड़ा पत्र लिखा, ''आप सरकारी नौकर हो सकते हैं, मैं तो नहीं हूं. बीबीसी एक स्वतंत्र संस्था है.''

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हालांकि यह ख़त कभी बाहर नहीं आएगा और न ही प्रकाशित होगा, लेकिन उनके लिखे अन्य ख़त भी इसी तरह काफ़ी मज़ेदार हैं.

इन ख़तों में उनकी खांटी पंजाबी मानसिकता की झलक दिखती है और ये इस बात की बानगी हैं कि उन्होंने सरकारी कामकाज में भी अपने हास्यबोध नहीं छोड़ा.

क़रीब दस साल पहले जब कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की बात चल रही थी तो मैंने ख़ुशवंत सिंह का विचार जानने के लिए संपर्क किया.

कई बार समय लेने के बाद भी मैं व्यक्तिगत साक्षात्कार नहीं ले सका. वो एक ऐसी ख़्वाहिश थी जो अधूरी रह गई.

पंजाबी अंग्रेज़ी

ख़ुशवंत सिंह के अंग्रेज़ी लेखन की खास बात यह थी कि वो आम लोगों को आसानी से समझ में आ जाती थी.

अंग्रेज़ी एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है और दुनिया भर में अलग अलग तरह से बोली-लिखी जाती है.

ख़ुशवंत सिंह की अंग्रेजी हिंदुस्तानी ढर्रे की थी, वो भी पंजाबी किस्म की. इसलिए लोगों को उनका लेखन काफ़ी पसंद आता था.

उनके लेखन में पंजाबी के मुहावरे पर्याप्त मात्रा में मिलते थे और पंजाबी की कई चीजों का शब्दशः अनुवाद होता था.

उनका यह बड़ा योगदान है कि उन्होंने अंग्रेज़ी को बहुत आसान लहजे में स्थापित किया और लोकप्रिय बनाया.

इलस्ट्रेटेड वीकली में भी वे अपने लेख में इसी देसी अंग्रेज़ी का इस्तेमाल करते थे. उन्होंने कभी भी ब्रिटिश अंग्रेज़ी लिखने की कोशिश नहीं की.

पाकिस्तान में उनके खासे लोकप्रिय होने के पीछे भी यही कारण है.

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