'दक्षिण भारत में लहर नहीं सिर्फ़ भौकाल है'

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दक्षिण भारत के मतदाता उत्तरी भारत के मुक़ाबले हमेशा अलग क़िस्म का फ़ैसला देते रहे हैं. जब केंद्र में पहली ग़ैर कांग्रेसी सरकार बनी थी तब भी दक्षिण, देश के मिजाज़ के विपरीत ग़ैर-कांग्रेसी लहर के ख़िलाफ़ खड़ा रहा.

ऐसा लगता है कि 2014 के चुनावों में भी दक्षिण में यही परंपरा क़ायम रहने वाली है.

तमिलनाडु के कुछ शहरी क्षेत्रों में एक अंदरूनी लहर हो सकती है लेकिन आंध्र प्रदेश और केरल में वह भी मौजूद नहीं है. कर्नाटक का मामला अलग है क्योंकि एक साल पहले तक बीजेपी वहां पांच साल तक सत्ता में रही है.

'लहर से ज़्यादा भौकाल'

जैन विश्वविद्यालय के कुलपति और राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर संदीप शास्त्री कहते हैं, "साफ़ है कि दक्षिण भारत में ऐसी कोई लहर नहीं है जैसी कुछ लोग उत्तर में बता रहे हैं. दरअसल दक्षिण में कभी भी राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी वाला मामला नहीं रहा. हर राज्य में मुद्दे अलग हैं."

साल 1971 में जब इंदिरा गांधी ने भारी जीत हासिल की थी तब भारतीय राजनीति के शब्दकोष में "लहर" शब्द को लाने वाले केरल के एक वरिष्ठ पत्रकार बीआरपी भास्कर थे. (उन्होंने लिखा था, "इंदिरा की लहर पर सवार कांग्रेस आसानी से सत्ता में वापस आ गई.")

वह कहते हैं, "ऐसा लगता है कि यह लहर से ज़्यादा भौकाल बनाया हुआ है. सबसे अच्छी स्थिति में बीजेपी का वोट प्रतिशत छह फ़ीसदी से 10 फ़ीसदी तक जा सकता है लेकिन यह सीटें नहीं जितवा सकता."

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केरल विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान के भूतपूर्व प्रोफ़ेसर और सेफ़ोलॉजिस्ट डॉक्टर जी गोपाकुमार कहते हैं, "केरल में एक सामाजिक सुधार आंदोलन रहा है जो वोटों के ध्रुवीकरण को रोकता है. अल्पसंख्यक, ईसाई और मुसलमान दोनों, हर विधानसभा में क़रीब 44 फ़ीसदी हैं. मोदी फ़ैक्टर, भौकाल के कारण, दरअसल कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ़) को ही फ़ायदा पहुंचाएगा."

आंध्र प्रदेश तो राज्य के दो टुकड़ों, सीमांध्र और तेलंगाना, में विभाजन में डूबा हुआ है. प्रचार नए राज्यों तेलंगाना के पक्ष में हो रहा है या विरोध में. तेलंगाना वाले इससे ख़ुश हैं और सीमांध्र वाले नाराज़, बल्कि ग़ुस्से में हैं.

हैदराबाद के पूर्व प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक मदभुशी श्रीधर कहते हैं, "कुछ शहरी इलाक़ों में वोट प्रतिशत बढ़ सकता है. बीजेपी का चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के साथ गठबंधन उसे फ़ायदा पहुंचा सकता है. बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ सकता है. लेकिन यह साफ़ है कि तेलंगाना और सीमांध्र में मोदी की कोई लहर नहीं है."

वह कहते हैं, "सीमांध्र में जगन मोहन रेड्डी वंचित तबक़ों- जिनमें अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक शामिल हैं उनके समर्थन से बीजेपी को टक्कर दे रहे हैं. इन तबक़ों को जगन के पिता वाई एस राजशेखर रेड्डी की लोकप्रिय योजनाओं से फ़ायदा मिला था."

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शास्त्री कहते हैं, "तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) और कांग्रेस आमने-सामने हैं. सीमांध्र में मुक़ाबला जगन की वाईएसआर कांग्रेस बनाम टीडीपी है. यहां भी कोई मोदी फ़ैक्टर नहीं है."

'अंडर करंट है'

तमिलनाडु में बीजेपी ने विजयकांत की डीएमडीके, वाइको की एमडीएमके और रामदास की पीएमकी के साथ गठबंधन किया है. दो पार्टियों के साथ डीएमके का गठजोड़ वह दूसरा गठबंधन है जो मुख्यमंत्री जयललिता की एआईडीएमके से लड़ने के लिए बना है.

शास्त्री कहते हैं, "तमिलनाडु में पहले की लहरें गठबंधन के गणित का ही फल रही हैं. जो भी पार्टी अलग-अलग सामाजिक समूहों को साथ ले आती है उसी को ज़्यादा सीटें मिलती हैं. ताज़ा स्थिति से मज़ेदार परिस्थितियां बन रही हैं लेकिन कोई मोदी लहर नहीं है."

वहीं, राजनीतिक विश्लेषक एम आर वेंकटेश कहते हैं, "ग्रामीण इलाक़ों में मोदी के बारे में चर्चा है और शहरी इलाक़ों में युवाओं के एक वर्ग के बीच उनकी अपील है. पहले बीजेपी का मत प्रतिशत सिर्फ़ तीन फ़ीसदी रहा है. लेकिन मोदी को अब भी उत्तर भारतीय नेता ही माना जाता है. हो सकता है कि कोई अंडर करंट हो लेकिन यह लहर नहीं है."

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दक्षिण में कर्नाटक ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां बीजेपी का आधार है. पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और बी श्रीरामुलु की पार्टी में वापसी ने यक़ीनन कांग्रेस के ख़िलाफ़ उसकी संभावनाएं बेहतर की हैं जिसने पिछला विधानसभा चुनाव जीता था.

राजनीतिक विश्लेषक मदन मोहन कहते हैं, "राजनीतिक अहसास जो पिछले विधानसभा चुनाव में नज़र आया था वही दोहराया जा सकता है. इसके अतिरिक्त एक बड़ी वजह नए कारण मतदाता हो सकते हैं, जो खेल की दिशा बदल सकते हैं. वह मोदी के साथ जाएंगे क्योंकि वह रोमांच की भावना पैदा करता है. मोदी के पक्ष में अंडर करंट है लेकिन लहर नहीं."

लहर है क्या

जाने-माने सेफ़ोलॉजिस्ट और राजनीतिक विश्लेषक, डॉ संजय कुमार मानते हैं कि अगर कोई राजनीतिक दल अपने मत प्रतिशत में 10 से 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर लेता है तो इसे लहर माना जाता है.

वह कहते हैं, "हम दो या तीन मानदंडों को आधार बनाते हैं. पहला तो यह है कि सामान्य चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल का मत प्रतिशत 10-12 फ़ीसदी या ज़्यादा नहीं बढ़ता है. अगर बढ़ता है तो यह लहर है."

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वह कहते हैं, "हमारे सर्वेक्षणों में हम साफ़ देख सकते हैं कि बीजेपी के मत प्रतिशत में 10-12 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. उत्तर प्रदेश और बिहार में यह 12 फ़ीसदी से ज़्यादा है. हालिया चुनावों में बीजेपी का उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन बिल्कुल भी अच्छा नहीं रहा है. यह एक क़िस्म की लहर है. इसमें शक की गुंजाइश नहीं है. लेकिन यह दक्षिण भारतीय राज्यों के बारे में नहीं कहा जा सकता."

संजय कुमार कहते हैं, "तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश या केरल में हो सकता है कि बीजेपी को सीट न मिले लेकिन उसका मत प्रतिशत बढ़ सकता है. मत प्रतिशत का 10 फ़ीसदी हासिल करना पार्टी के लिए अच्छा रहेगा. हालांकि सीट जीतने लायक नहीं."

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