सोशल मीडिया पर तस्वीर बनी हथियार

  • 21 मार्च 2014

क्या आपने कभी सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीर किसी के नाम की है? क्या आपकी प्रोफ़ाइल तस्वीर आपके असली चेहरे के बजाय किसी मुद्दे, किसी आंदोलन या किसी उद्देश्य की कहानी कहती है? अगर हां तो जान लीजिए कि आप एक अघोषित पिक्टिविस्ट बन चुके हैं.

फ़ेसबुक और ट्विटर पर लोग दिनरात अपने दिल की बात कह रहे हैं और दुनिया के अलग-अलग कोनों में लोग इसे सुनने को बैठे हैं.

ऐसे में अपनी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने और किसी मुद्दे के हक़ में आवाज़ उठाने के लिए लोग अब फ़ेसबुक स्टेटस और ट्वीट का ही नहीं बल्कि 'पिक्टिविज़म' यानी 'पिक्चर एक्टिविज़म' का सहारा ले रहे हैं.

समर अनार्य एक मानवाधिकार संस्था में काम करते हैं और फ़ेसबुक पर बेहद सक्रिय हैं.

जब भी वह किसी मुद्दे पर विमर्श या बहस चाहते हैं डेढ़ हज़ार से ज़्यादा लोगों की अपनी मित्रमंडली के बीच उस मुद्दे को फ़ेसबुक पर डाल देते हैं. समर अब तक तीन बार पिक्टिविज़म का इस्तेमाल कर चुके हैं.

देशद्रोह का आरोप

छत्तीसगढ़ में एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और डॉक्टर के तौर पर काम करने वाले बिनायक सेन को जब देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया तो उन्होंने उनकी तस्वीर को अपनी प्रोफ़ाइल इमेज की जगह दी.

वह कहते हैं, ''अरब देशों में अपने साथ लोगों को जोड़ने के लिए एक नारा दिया जाता है, 'अयेहुन्नास (कोई है?)' जिसके जवाब में कहा जाता है, ‘लब्बैक (हम सब हैं- लब एक हैं, आवाज़ें एक हैं)’ पिक्टिविज़म लोगों को एकजुट करने और इस ताक़त को प्रदर्शित करने का एक ज़रिया है. किसी एक ख़ास मुद्दे पर फ़ेसबुक पर जब आप लगातार एक के बाद एक तस्वीरें एक रंग में रंगते देखते हैं तो आंदोलन की ताक़त का एहसास होता है.''

पिक्टिविज़म की इसी ताक़त को आज़माने के लिए दिल्ली में हुए बर्बर बलात्कार मामले के बाद फ़ेसबुक पर एक पन्ने की शुरुआत हुई.

‘चेंज योर डीपी फ़ॉर निर्भया’ नाम के इस पन्ने के ज़रिए भारत में कई हज़ार लोगों ने अपनी प्रोफ़ाइल तस्वीर को एक लौ में बदल दिया.

पिक्टिविज़म की राह

एसिड अटैक की शिकार लड़कियों के संघर्ष से लोगों को रूबरू कराने के लिए राकेश कुमार सिंह ने एक पीड़ित लड़की की तस्वीर के ज़रिए पिक्टिविज़म की राह पकड़ी.

बीबीसी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा, ''प्रोफ़ाइल तस्वीर हमारी पहचान का हिस्सा होती है. इसके ज़रिए मैं अपनी पसंद, अपने नज़रिए को दुनिया के सामने ज़ाहिर करता हूं."

उन्होंने कहा, "अगर मैं अपने प्रोफ़ाइल की इस ख़ास जगह को किसी के नाम करता हूं तो लोगों में ये संदेश जाता है कि वो मुद्दा मेरे लिए बेहद ख़ास है और मैं चाहता हूं कि मुझसे जुड़े लोग मेरे इस नज़रिए को जानें और हो सके तो मेरा साथ दें.''

सोशल मीडिया मॉनिटरिंग कंपनी सायसोमोस के मुताबिक़ ट्विटर पर मौजूद 70 फ़ीसदी से ज़्यादा ट्वीटस पर न कोई ध्यान देता है न वो कभी पढ़े जाते हैं.

स्टेटस मैसेज और ट्वीट आती-जाती बयार की तरह हैं लेकिन अगर आप अपनी प्रोफ़ाइल तस्वीर यानी डिस्प्ले पिक्चर किसी उद्देश्य के नाम करते हैं तो वो लंबे समय तक लोगों के ज़ेहन में रहती है.

चुनाव के माहौल में राजनीतिक पार्टियां भी अब इस ट्रेंड का फ़ायदा उठा रही हैं. आम आदमी पार्टी ने अपने सोशल मीडिया प्रचार के तौर पर आम लोगों से अपनी प्रोफ़ाइल तस्वीर 'आप' के लिए डोनेट करने की अपील की है.

सचिन के दीवाने

लेकिन ये मामला केवल जागरुकता तक सीमित नहीं बल्कि भावनाओं से भी जुड़ा है.

एक निजी कंपनी के फ़ाइनेंस विभाग का ज़िम्मा संभाल रहे अमित अग्रवाल क्रिकेट से बढ़कर सचिन तेंदुलकर के दीवाने हैं.

पांच साल पहले उन्होंने जब फ़ेसबुक पर अपना अकाउंट बनाया तब से कभी अपनी डिस्पले तस्वीर नहीं बदली. लेकिन सचिन रिटायर हुए तो उन्होंने अगले कई महीने अपनी प्रोफ़ाइल तस्वीर को उनके नाम कर दिया.

वह कहते हैं, ''सोशल मीडिया की ज़िंदगी अब निजी ज़िंदगी से किसी मायने में कम नहीं है. यही वजह है कि कुछ ख़ास लोगों के लिए सोशल मीडिया के ख़ास अंदाज़ में कुछ करना अब लगभग ज़रूरी है.''

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