वाराणसीः क्या हैं मोदी की राह की दिक़्क़तें?

  • 23 मार्च 2014
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वाराणसी से भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के प्रत्याशी घोषित होने के बाद यह मान लिया गया कि उग्र हिंदुत्व के प्रतीक माने जाने वाले मोदी की जीत सुनिश्चित है. किन्तु मोदी और चुनावी जीत के बीच का फासला कुछ मुश्किलों भरा है. इसलिए उनकी विजय के बारे में अभी से आश्वस्त हो जाना भूल होगी.

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय या बीएचयू के राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्र और विश्वनाथ पांडे यह मानते हैं कि अभी यह कहना की मोदी जीत जाएंगे, जल्दबाज़ी होगी. हालांकि वो मानते हैं कि मोदी का पलड़ा भारी है.

वाराणसी में लोग इस बात से तो सहमत हैं कि ऐसा पहली बार होगा जब यहाँ से जीता हुआ प्रत्याशी प्रधानमंत्री बन सकता है. प्रोफेसर मिश्र कहते हैं कि "यह बड़ी बात होगी."

फिर क्या कारण है कि मोदी की वाराणसी से विजय को सुनिश्चित नहीं कहा जा सकता?

वाराणसी या वडोदरा?

मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है उनका "बाहरी" होना.

बनारस : मोदी के सामने स्थानीय बनाम बाहरी का पेंच

डॉ पांडे और कुछ आम नागरिक, विशेषकर मुस्लिम, साफ़गोई से कहते हैं कि यदि कोई स्थानीय प्रत्याशी मैदान में उतरता है तो उसको ज़्यादा समर्थन मिलेगा. यही बात बनारस ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष कर्नल रणजीत उपाध्याय भी ज़ोर देकर कहते हैं.

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दो स्थानों से चुनाव लड़ना भी मोदी के खिलाफ़ जा सकता है. जीतने पर मोदी वडोदरा से सांसद रहना पसंद करेंगे या वाराणसी से, यह सवाल भी लोगों को मोदी को वोट देने से रोक सकता है.

अंजुमन इंतेज़ामिया मस्जिद के संयुक्त सचिव मोहम्मद यासीन कहते हैं, "दो जगह से चुनाव लड़ने का मतलब किसी एक के साथ विश्वासघात होगा. वह किसके साथ जाएंगे?"

प्रो मिश्र कहते हैं, "आने वाले समय में नरेंद्र मोदी को यह ज़रूर साफ़ करना होगा कि वह किस संसदीय सीट को रखेंगे - वाराणसी को या वडोदरा को."

यदि यहाँ के वोटर के मन में यह संशय रहेगा कि मोदी वाराणसी छोड़ वडोदरा से ही सांसद रहेंगे तो उनकी जीत में कठिनाई हो सकती है.

जाति का गणित

मोदी का पिछड़ी जाति से होना उनके लिए तीसरी चुनौती बन सकता है. यह सही है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में 22 सीटों पर पिछड़ी जातियों का बाहुल्य है. इसके साथ ही बिहार की भी 11 सीट ऐसी हैं, जहां अन्य पिछड़ी जातियों की अधिकता है.

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लेकिन खुद वाराणसी में उनकी संख्या इतनी नहीं है कि मोदी उनके भरोसे चुनाव जीत सकें.

साल 2009 के चुनाव में भाजपा के ब्राह्मण प्रत्याशी मुरली मनोहर जोशी को दो लाख तीन हज़ार 122 वोट मिले थे. मुख़्तार अंसारी को एक लाख 85 हज़ार 911, तो अजय राय को, जो कि जाति से भूमिहार हैं, एक लाख 23 हज़ार 874 वोट, राजेश मिश्र को 66 हज़ार 386 और विजय प्रकाश जायसवाल को 65 हज़ार 912 वोट मिले थे.

विजय प्रकाश जायसवाल अन्य पिछड़ी जाति वाले 'अपना दल' के प्रत्याशी थे.

वोटों के इस गणित से साफ़ है कि यदि मोदी को पिछड़ी और अन्य पिछड़ी जातियों के वोट के साथ पूरा ब्राह्मण वोट नहीं मिला तो भूमिहार, मुस्लिम, थोड़े ब्राह्मण और अन्य जातियां एक साथ आकर मोदी के लिए कैसी समस्या खड़ी कर सकते हैं.

इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद भी मुरली मनोहर जोशी केवल 17 हज़ार वोटों से ही जीत पाए थे.

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