किस हद तक करें अख़बारों पर भरोसा?

  • 26 मार्च 2014
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भारत में साक्षरता दर में बढ़ोत्तरी और इंटरनेट न्यूज़ के सीमित इस्तेमाल के चलते समाचार पत्रों का प्रसार तेज़ी से बढ़ा है.

भारत के 80 करोड़ मतदाताओं में से ज़्यादातर ख़बरों के लिए समाचार पत्रों पर निर्भर हैं. तो क्या छपे हुए अक्षर वाक़ई महत्व रखते हैं, ख़ासतौर से चुनावी साल में?

अब भारत में कुछ लोग इसे लेकर चिंतित हैं कि जो छपता है, वो हमेशा सच नहीं होता है.

बीते वर्षों के दौरान 'पेड न्यूज़' का चलन बढ़ा है. इसकी शुरुआत क़रीब दस साल पहले भारत के प्रमुख मीडिया घरानों में शामिल बेनेट कोलमैन एंड कंपनी में हुई.

कंपनी ने शोबिज़ इवेंट्स और प्रोडक्ट लॉन्च को कवर करने के लिए सेलेब्रिटी और कारोबारियों से पैसे लेना शुरू किया. यह कवरेज एक अलग सप्लीमेंट के ज़रिए की गई.

'पेड न्यूज़'

बेनेट कोलमैन एंड कंपनी के मुख्य कार्यपालक रवि धारीवाल बताते हैं, "यह इसलिए अनूठा था क्योंकि इसने विज्ञापनदाताओं के सामने एक ऐसी पेशकश की, जो वो चाहते थे. वो चर्चा में आना चाहते थे और वो सहज, विश्वसनीय विज्ञापन माहौल चाहते थे. हमने उन्हें वैसा विज्ञापन माहौल मुहैया कराया."

उन्होंने बताया, "हमने इसे बहुत अधिक पारदर्शी बनाया. विज्ञापन देने वालों को बताया गया कि हम एक फ़ीस लेकर उनके इवेंट या प्रोडक्ट को कवर करेंगे और हम सभी से कहेंगे कि ये एडवरटोरियल और प्रमोशनल फ़ीचर का हिस्सा है. तो इससे उनकी ज़रूरतें भी पूरी हुईं और हमारी भी."

लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ सेलेब्रिटी ही समाचार पत्रों में अपनी ख़बरें चाहते हैं. बड़ी तादद में राजनेता भी ख़बरों के लिए भुगतान कर रहे हैं और ऐसा ज़रूरी नहीं है कि अख़बार हमेशा भुगतान के बारे में बताते हैं.

भारत में 'पेड न्यूज़' को लेकर कोई क़ानून नहीं है.

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चुनाव आयोग

भारत में राजनीतिक दलों के मामले में चुनाव आयोग इसकी निगरानी करता है. लेकिन मोटेतौर पर ये क़वायद चुनाव ख़र्च को क़ाबू में रखने के लिए होती है न कि मतदाताओं को गुमराह होने से रोकने के लिए.

पिछले चार साल में ऐसे 1400 से अधिक मामले सामने आए हैं.

बीते साल दिसंबर में दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले सुशील गुप्ता पर उनको फ़ायदा पहुंचाने वाली ख़बरों के लिए जुर्माना लगाया गया.

वो कहते हैं कि, "मैंने चुनाव आयोग को दो बार लिखा कि इसमें कुछ ग़लत नहीं है. मैं इस इलाक़े में काफ़ी प्रसिद्ध हूं और अगर मैं कहीं जाऊंगा तो कुछ स्थानीय पत्रकार मेरे बारे में ख़बर छापना चाहेंगे. मैंने किसी भी समाचार पत्र को एक पैसा भी नहीं दिया."

बढ़ती चिंताएं

आप चाहें 'पेड न्यूज़' को सही मानें या नहीं, पर सच्चाई यह है कि कई समाचार पत्रों में ऐसी कहानियां मिल जाएंगी, जिनके लिए भुगतान किया गया है.

हालांकि यह ज़रूरी नहीं कि उन कहानियों को पढ़ने के दौरान आप यह समझ पाएं कि उनके लिए भुगतान किया गया है.

यही वजह है कि पेड न्यूज़ बहस का एक बड़ा मुद्दा बन गया है.

चुनाव प्रचार तेज़ होने के साथ ही इस बात को लेकर चिंताएं भी बढ़ रही हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मतदाता अख़बारों पर आंख बंद कर भरोसा नहीं करेगा.

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