आधार को ज़रूरी बनाने का आदेश वापस ले सरकार: सुप्रीम कोर्ट

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भारत की सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह सरकारी सुविधाएँ पाने के लिए आधार कार्ड को ज़रूरी बनाए संबंधी सभी आदेशों को निरस्त करे.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह निर्देश भी दिया है कि वह आधार कार्डधारक की सहमति के बिना उसके विवरण को किसी भी एजेंसी के साथ साझा न करे.

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल सितंबर में दिए अंतरिम आदेश को दोहराया है, जिसमें उसने कहा था कि कोई भी व्यक्ति केवल इसलिए परेशान नहीं होना चाहिए कि उसके पास आधार कार्ड नहीं है.

जस्टिस बीएस चौहान और जे चेलेमश्वरम की खंडपीठ ने गोवा के वॉस्को में हुए सामूहिक बलात्कार के एक मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया.

गोवा की एक अदालत ने इस मामले को हल करने के लिए यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (यूआईडीएआई) से वहाँ के निवासियों के बायोमैट्रिक आंकड़ों को साझा करने को कहा था.

इसके ख़िलाफ़ यूआईडीएआई ने मुंबई हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी. हाई कोर्ट ने इस मामले को हल करने में सहयोग करने के लिए यूआईडीएआई को लोगों के बायोमैट्रिक आंकड़ों को सीबीआई के साथ साझा करने करने को कहा. इसी के ख़िलाफ़ यूआईडीएआई ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली.

बायोमैट्रिक आंकड़ा

यूआईडीएआई और सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल मोहन पराशरन से न्यायाधीशों ने कहा कि उन्हें बहुत से ऐसे पत्र मिल रहे हैं, जिनमें यह शिकायत है कि सुप्रीम कोर्ट के सितंबर के आदेश के बाद भी सरकार सुविधाओं के लिए आधार कार्ड पर ज़ोर दे रही है.

अदालत ने उनसे कहा, ''सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए आधार कार्ड को ज़रूरी बनाने वाली अधिसूचनाओं को रद्द करने के लिए दिशा-निर्देश जारी करें.'' इस पर पराशरन ने कहा, ''हम इसे तत्काल करेंगे.''

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मुंबई हाई कोर्ट के आदेश पर स्थगन आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सामूहिक बलात्कार मामले की जांच कर रही केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) को नोटिस जारी कर यूआईडीएआई की याचिका पर जवाब मांगा.

सुप्रीम कोर्ट आधार कार्ड की वैधता को चुनौती देने वाली कुछ याचिकाओं की सुनवाई कर रहा है, जिनकी सुनवाई अभी पूरी नहीं हुई है.

निजता का सवाल

फ़रवरी 2009 में शुरू की गई आधार कार्ड परियोजना पर करीब 15 हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च होंगे.

इस योजना के तहत देश के हर नागरिक को 12 अंकों वाला एक पहचान पत्र देने की योजना है. आधार कार्ड में लोगों के फ़िगरप्रिंट, आंखों की पुतलियों की छाप और फ़ोटो होती है.

यूआईडीएआई ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि यूआईडीएआई को नागरिक कार्यों के लिए बनाया गया है, फ़ारेंसिक जांच-पड़ताल के लिए नहीं.

यूआईडीएआई का कहना है कि अगर बायोमैट्रिक आंकड़ों को उपलब्ध कराया गया तो इस तरह के अनुरोधों की लाइन लग जाएगी.

यूआईडीएआई का कहना है, ''निजता की रक्षा किसी व्यक्ति का बुनियादी मानवाधिकार है और यूआईडीएआई इसकी रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है.''

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