सागरनामा-4: क्या गुजरात में मुसलमान डरे हुए हैं?

गुजरात में मुसलमान

शायद किसी समाजविज्ञानी ने इस पर काम किया हो कि डर के कितने स्वरूप हो सकते हैं.

वो किन रूपों में आपके सामने आ सकता है और उसके अर्थ कितने तरह से खुल सकते हैं.

(पढ़ेंः गुजरात का वाडिया)

अगर किताबों में दर्ज डर की परिभाषाएं अपने में पूर्ण होतीं, तो अगले डर का सामना करने पर इतनी बेचैनी न होती.

संभवतः तब यह समझा जा सकता था कि डर की जो सीमाएं निर्धारित हैं, हम उनसे बाहर नहीं जा रहे हैं. लेकिन ये परिभाषाएं बार-बार टूटती हैं. हैरान करती हैं.

हाल-फ़िलहाल छपी ख़बरों को आधार माना जाए, तो कहा जा सकता है कि गुजरात के मुसलमान कुछ डरे, कुछ सहमे से रहते हैं. पर इससे डर की पूरी शक्ल सामने नहीं आती.

ख़ामोशी

विश्वास करना मुश्किल होता है कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व के इस दावे में दरअसल कई सुराख़ हैं कि गुजरात का मुसलमान बदल गया है, ख़ुशहाल है, बेफ़िक्र है और भाजपा को वोट देता है.

(पढ़ेंः जहाँ सजती है देह की मंडी)

भरूच और सूरत के बीच, अंकलेश्वर से थोड़ा आगे खरोड़ गाँव हैं. आबादी क़रीब पाँच हज़ार. गाँव के मुखिया सिराज भाई हैं.

गाँव में एक बड़ा मदरसा है और यह राष्ट्रीय राजमार्ग से मात्र एक किलोमीटर के दायरे में है.

इस गाँव के पढ़े-लिखे मुसलमानों में भी जिस तरह की ख़ामोशी है, यक़ीन से बाहर है. वे सवालों के जवाब नहीं देना चाहते.

मदरसे में खुलापन

राजनीति पर बात करना वे ग़लत मानते हैं और सवाल पूछने पर लोगों को शक की निगाह से देखते हैं.

एक उग्र प्रतिक्रिया तो यहाँ तक थी कि अगर मुँह खोला तो क्या करेगा, ज़्यादा से ज़्यादा गोली ही मार देगा.

इस सवाल पर कि मदरसे में तो खुलापन होना चाहिए, जैसा देवबंद में है. जवाब मिलता है कि वो देवबंद है ये खरोड़ है.

मदरसे या उसके बाहर तस्वीरें खींचना भी गुनाह है. जैसे ही कैमरा चलाया छात्रों ने चेहरे पर रूमाल बाँध लिए.

पुलिस की इजाज़त

हमारी टीम को किसी से बात नहीं करने दी गई और लगभग हाथ पकड़कर मदरसे से बाहर कर दिया गया.

(अयोध्या वाया गोधरा)

इस दौरान एक व्यक्ति ने पूछा कि क्या आपके पास मदरसे में बच्चों से बात करने की अनुमति है. आप बिना अनुमति के आए हैं और यह सरासर ग़लत है.

यह कहने पर कि बातचीत के लिए किसकी अनुमति की ज़रूरत होगी जवाब मिला- पुलिस की.

मदरसे के एक मुलाज़िम बात करने को तैयार हुए तो लोगों ने कभी हाथ खींचकर तो कभी इशारों में उन्हें ख़ामोश हो जाने के लिए कहा.

गुजरात का सच

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उन्होंने तब भी बात की लेकिन मदरसे के बाहर लगी बेंच पर बैठकर.

(डरे हुए हैं मुसलमान?)

खिचड़ी दाढ़ी वाले उस व्यक्ति ने कहा, "गुजरात का एक सच हाइवे पर रहता है लेकिन उसका दूसरा पहलू गाँव में है."

इन दावों के बरअक्स कि राज्य में चौबीस घंटा बिजली रहती है उसने कहा कि यह सच नहीं है, बिजली आती-जाती रहती है और गर्मियों में हाल बुरा हो जाता है.

उनकी नाराज़गी पानी की उपलब्धता को लेकर भी थी.

मुसलमानों का डर

वह इस बात पर ख़फ़ा थे कि राज्य सरकार भुज और सौराष्ट्र, यहाँ तक की कच्छ को भी पानी मुहैया कराती है लेकिन भरूच और अंकलेश्वर के आसपास के इलाक़ों का उसे ख़्याल नहीं आता.

(अयोध्या टू गोधरा)

हालाँकि खरोड़ के मुसलमानों की सोच और प्रतिक्रिया का सामान्यीकरण नहीं किया जाना चाहिए.

मगर ऐसे दूसरे इलाक़े भी हैं जहाँ मुसलमान इतने ही डरे हुए हैं जितने खरोड़ मे हैं. बात गाँव और शहर की भी नहीं है कि उनकी सोच अलग होती है.

वडोदरा में चर्चित क्रिकेटर इरफ़ान और युसुफ़ पठान के पिता ने भी राजनीति पर बात करने से इनकार कर दिया.

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