बिहार में क्यों नहीं चलता मायावती का जादू

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आम चुनावों के बाद त्रिशंकु लोकसभा आने की स्थिति में जिन नेताओं को संभावित प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जा रहा है, उनमें मायावती भी एक हैं.

इससे राष्ट्रीय राजनीति में उनके क़द का पता चलता है और इसकी वजह है उत्तर प्रदेश में उनके पीछे एकजुट दलित वोट बैंक. मगर उत्तर प्रदेश से सटे बिहार में क्या उनका वैसा ही असर है? इसका जवाब है नहीं.

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बिहार में चुनावों के नतीजे इसका प्रमाण हैं. अब तक बिहार से मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के किसी उम्मीदवार को सांसद नहीं चुना गया है और विधानसभा चुनावों में उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन अक्टूबर 2000 के चुनाव में देखने को मिला, जब पार्टी के पांच उम्मीदवार चुनकर विधानसभा में पहुंचे थे.

मगर साल 2010 में हुए पिछले विधानसभा चुनावों में पार्टी का खाता भी नहीं खुल पाया जबकि उसने कुल 243 सीटों में से 239 पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. वोटों में भी उसकी हिस्सेदारी घटकर 3.21 प्रतिशत रह गई.

बिहार के जिन इलाक़ों में बसपा का कुछ असर समझा जाता है, वो हैं कैमूर, बक्सर, सासाराम, बेतिया और गोपालगंज. ये सभी वो इलाक़े हैं जो उत्तर प्रदेश से लगते हैं.

बिहार के दलित नेता

बिहार में 10 करोड़ से ज़्यादा आबादी में दलितों की संख्या डेढ़ करोड़ से अधिक है. यह बात सही है कि हिंदी पट्टी में चुनावों में जाति सबसे अहम होती है. मगर बिहार में हुए कई आंदोलनों के चलते दलित राजनीतिक रूप से ख़ासे जागरूक मानते जाते हैं.

लंबे समय से वामपंथी आंदोलनों से जुड़े रहे नंद किशोर कहते हैं, “1980 के दशक तक जो बिहार में तीन बड़े आंदोलन देखने को मिले, वह थे वामपंथी आंदोलन, समाजवादी आंदोलन और उसके बाद नक्सल आंदोलन. तीनों ही आंदोलन में जो मुद्दा प्रमुखता से सामने आया, वह है सामाजिक प्रतिष्ठा की लड़ाई और जातीय अपमान और ग़ैरबराबरी के ख़िलाफ़ लड़ाई.”

वो बताते हैं, “वामपंथी आंदोलन में सबसे अहम भूमिका जिन वर्गों की रही, उनमें सबसे ज़्यादा दबे-कुचले वर्ग के लोग हैं. यही लोग खेतों और उद्योगों में मज़दूरी करते हैं, और मेहनतकश कहलाते हैं.”

इसके अलावा कांग्रेस के बाबू जगजीवन राम बिहार में दलितों के बड़े नेता रहे हैं. उनके बाद उनकी बेटी मीरा कुमार ने उनकी विरासत संभाली है. हालांकि केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहने और लोकसभा की स्पीकर बनने के बावजूद मीरा कुमार उतने बड़े जनाधार वाली नेता नहीं कही जा सकती हैं.

भारत में सबसे ज़्यादा दलित आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश को जहां 1995 में मायावती के रूप में पहली दलित मुख्यमंत्री मिली, वहीं बिहार में दलित नेता भोला पासवान शास्त्री 1968 में ही मुख्यमंत्री पद हासिल कर चुके थे. 1972 तक अलग-अलग समय पर उन्होंने तीन बार मुख्यमंत्री पद संभाला.

चेतना

दूसरी तरफ़, समाजवादी आंदोलन से जो एक बड़े दलित नेता बिहार में खड़े हुए, वो हैं रामविलास पासवान. साथ ही लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे नेता भी दलितों और पिछड़ों के संघर्ष के प्रतीक बने रहे.

तो क्या बिहार में मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी के लिए कोई जगह नहीं है? पटना के एएन सिन्हा सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक डी एम दिवाकर मानते हैं कि बिहार के हालात उत्तर प्रदेश से अलग हैं.

वो कहते हैं, “बिहार के दलितों में चेतना का स्तर उत्तर प्रदेश से कहीं ज़्यादा है. उत्तर प्रदेश में दलित सिर्फ़ मायावती के नाम पर वोट देता है. उन्होंने क्या किया, क्या नहीं किया और उनके रहते दलित आंदोलन कहां गया, कहां नहीं, इसकी समीक्षा कर वोट देने की स्थिति में वहां के दलित नहीं हैं.”

दिवाकर कहते हैं, “उत्तर प्रदेश में भले ही मायावती के रूप में दलित मुख्यमंत्री की सरकार रही, लेकिन मेरा अध्ययन बताता है कि दलितों की भलाई के लिए काम कम ही हुए हैं क्योंकि राजनीतिक संरचना दलित परक नहीं है. इसीलिए मायावती के होते हुए भी दलित आंदोलन वहां ठहर गया है.”

सामाजिक सरोकार

लेकिन बहुजन समाज पार्टी के नेता सुधींद्र भदौरिया यह मानने के लिए तैयार नहीं कि उनकी पार्टी सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सिमटी हुई है.

वो कहते हैं, “उत्तर प्रदेश के बाहर अन्य राज्यों में भी बहुजन समाज पार्टी चुनाव लड़ती है. उसके विधायक बनते रहे हैं और कभी-कभी सांसद भी बने हैं. हमें सम्मानजनक वोट भी मिला है. बहरहाल यह एक लंबा रास्ता है.”

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Image caption पासवान भी मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के अभियान में शामिल हैं

वहीं लोक जनशक्ति पार्टी के उपाध्यक्ष रामचंद्र पासवान कहते हैं कि बिहार में न तो बहुजन समाज पार्टी के पास कोई ख़ास संगठन है और न ही वोटों पर उसका असर है क्योंकि मायावती पार्टी के बुनियादी एजेंडे से भटक गई हैं.

वो कहते हैं, “मायावती ने कांशीराम की विचारधारा और एजेंडे से ख़ुद को अलग कर लिया है. रही बात बिहार की, तो दलित वोटों पर मायावती का न तो असर है और न भविष्य में ऐसा होने जा रहा है.”

हालांकि पिछले आम चुनावों में लोक जनशक्ति पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी और इस बार वह भाजपा के साथ मिलकर चुनावी मैदान में है. रामचंद्र पासवान का कहना है कि उनकी पार्टी के एनडीए में जाने के बाद गठबंधन को मिलने वाले दलित वोटों में इज़ाफ़ा होगा.

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हालांकि वामपंथी आंदोलन से जुड़े रहे नंद किशोर कहते हैं कि पासवान हों या मायावती, सत्ता की राजनीति करने वाले लोगों से ये उम्मीद अब बेमानी है कि वो सामाजिक सरोकारों के लिए काम करेंगे.

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