कांग्रेस के घोषणापत्र से शायद ही हो फ़ायदा..

  • 27 मार्च 2014
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अगर घोषणापत्र चुनावों में जीत की कुंजी होते तो कांग्रेस के घोषणापत्र में जो वायदे किए गए हैं वे ज़रूर इस पुरानी पार्टी को लोकसभा चुनाव में कुछ हद तक फ़ायदा दिलाते लेकिन इससे अपेक्षित परिणाम मिलेंगे, इस पर भारी संदेह है.

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में दो तिहाई आबादी- जो कुशल श्रमिक भारत का निर्माण करते हैं- को मध्य वर्ग में लाने का वायदा किया है.

पार्टी का कहना है कि वह यह काम स्वास्थ्य, पेंशन, घर, सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और काम करने की मानवीय परिस्थितियां प्रदान कर और उद्यमशीलता को बढ़ावा देकर करेगी.

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यह यूपीए-1 और यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल के दौरान लोगों को अधिकार देने के लिए पारित कराए गए विधेयकों के ही दृष्टिकोण पर आधारित होगा.

घोषणापत्र आर्थिक विकास को तीन सालों में आठ से ज़्यादा रखने और फिर छोटे और मध्यम उद्यमों को विशेष प्रोत्साहन देकर विनिर्माण उद्योग में 10 फ़ीसदी की वृद्धि लाने का वायदा, विश्वास जगाता है.

मध्य वर्ग शायद ही प्रभावित हो

घोषणापत्र यूपीए सरकार का रिपोर्ट कार्ड तो पेश करता ही है, यह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव के लिए एक 15-बिंदुओं का एजेंडा भी सामने रखता है.

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कांग्रेस ने अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सकारात्मक प्रयासों पर एक राष्ट्रीय सहमति बनाने के अपने वायदे को निजी क्षेत्र तक ले जाने की बात को दोहराया है.

इसके अलावा घोषणापत्र में अनुसूचित जाति और जनजातियों में उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करने के लिए आसान कर्ज़ और टैक्स छूट जैसे वायदे भी हैं.

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घोषणापत्र में कौशल विकास को रफ़्तार देने और कमज़ोर वर्गों के लिए हर ब्लॉक में उच्च स्तर के नवोदय विद्यालय जैसे स्कूल खोलने का भी वायदा है.

कांग्रेस ने शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण की योजनाओं में आबादी के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों को शामिल करने की बात कर आरक्षण पर बहस को विस्तार देने की कोशिश की है.

आरक्षण नीति

लेकिन पार्टी ने आरक्षण के मौजूदा ढांचे को छेड़ने से इनकार किया है क्योंकि घोषणापत्र में साफ़ कहा गया है कि इससे उन लोगों पर असर नहीं पड़ेगा जिन्हें आरक्षण नीति का फ़ायदा मिल रहा है.

48 पेज का यह घोषणापत्र बेहद मेहनत और उत्साह से तैयार किया गया है लेकिन यह लोगों का ध्यान खींचने में नाकाम है क्योंकि यह बड़े वायदों का पुलिंदा तो हैं लेकिन ज़्यादा रुचि जगाने में नाकाम रहता है क्योंकि कांग्रेस को जीतने वाली पार्टी नहीं माना जा रहा है.

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यह दस्तावेज़ 128 साल पुरानी पार्टी का सबको मिलाकर चलने वाले लोकतंत्र और उदारवादी राष्ट्रवाद को दोहराता है और बीजेपी पर संकीर्ण मानसिकता, सांप्रदायिकता और विघटनकारी अधिनायकवाद का आरोप लगाता है. इससे दोनों पार्टियों से बीच तल्ख़ शब्दों का आदान-प्रदान तय हो गया है.

Image caption फाइल फोटो

हर किसी को कुछ न कुछ देने का वायदा करने वाले घोषणापत्र की कोई एक ख़ास बात नहीं रह जाती और इससे बहुत ज्ञानी लोग तो समझ सकते हैं लेकिन बेहद शंकालु मध्य वर्ग शायद ही समझे जिससे कांग्रेस को दरअसल मतलब है.

सरकार विरोधी भावना

युवाओं, महिलाओं, किसानों, अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों, रक्षा क्षेत्र और पूर्व सैनिकों के बीच घूमते-घूमते यह विस्तृत दस्तावेज़ अपनी पहचान ही खो देता है. यूपीए सरकार के प्रति पिछले 10 साल की सरकार विरोधी भावना के बावजूद कांग्रेस इसके माध्यम से लोगों का विश्वास जीत पाएगा ऐसा नहीं लगता.

इसके बहुत से कसमें, वायदे, प्रतिज्ञाएं यूपीए के शासन के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए खोखले नज़र आते हैं जो भ्रष्टाचार, घोटालों से भरा रहा है.

(क्यों है कांग्रेस बैकफ़ुट पर?)

सिद्धांतरूप से घोषणापत्र राजनीतिक दलों के चुनावी भाग्य में ज़्यादा बड़ी भूमिका नहीं निभाते इसकी कमियां अच्छाइयों के मुक़ाबले ज़्यादा बड़ी भूमिका निभाती हैं.

सही वक़्त में इसी घोषणापत्र से कांग्रेस को चुनाव में ज़्यादा फ़ायदा मिलता 2014 के चुनावों के बजाय.

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