सागरनामा6: राजनीति में रुचि नहीं, वोट पाबंदी से डालते हैं

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दमन के स्थानीय लोग आम चुनावों से ज्यादा तवज्जो स्थानीय मुद्दों को देते हैं.

अमराइयों से घिरा सिलवासा और दमन आसपास हैं. पिछली रात दमन में जिन स्थानीय लोगों से बात हुई, ऐसा लगा कि ज़्यादातर की दिलचस्पी आम चुनावों में नहीं थी.

उनके अपने स्थानीय मुद्दे थे और अपनी परेशानियाँ. राजनीति से उनका सरोकार बस इतना है कि वे पाबंदी से वोट डालते हैं.

अगली सुबह केंद्रशासित प्रदेश दमन के बस अड्डे पर तमाम लोग मिले. उन्हें बात करने में परेशानी नहीं थी और वे अपने स्थानीय प्रतिनिधि से इसलिए ख़ुश थे कि उनसे जब चाहे बात हो जाती है.

सोच का ये ढंग सिर्फ़ लोगों तक सीमित नहीं है. स्थानीय अख़बारों में भी यही सोच दिखाई देती है.

राजनीति से दूर

दमन-दीव और दादरा नगर हवेली अलग इलाक़े हैं लेकिन आमतौर पर यहां के लोग गुजराती और हिंदी बोलते हैं.

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यहां जितने भी अख़बार छपते हैं उनमें इन्हीं दो भाषाओं, गुजराती और हिंदी के अख़बार ज़्यादा बिकते हैं.

सवाल ये उठता है कि जहां लोगों की सोच राजनीति को बहुत तवज्जो नहीं देती वहां के अख़बार राजनीति से अपने पन्ने रंग कर लोगों के बीच लोकप्रिय हो सकते हैं? जवाब है नहीं.

बस अड्डे पर दस अख़बार ख़रीदे, जिनमें से चार दमन में ही छपते हैं. चार में से तीन अख़बारों में पहली लीड राजनीति नहीं थी.

'डॉन ऑफ़ इंडिया' अख़बार की आठ कॉलम में पसरी पहली ख़बर थी- 'खाद्य आपूर्ति विभाग की लापरवाही बनी लोगों की परेशानी का कारण'.

'असली आज़ादी' अख़बार की प्रमुख ख़बर- 'प्रदेश में आने वाले विदेशियों के लिए ऑनलाइन फ़ार्म की शुरुआत' थी. जबकि 'दमन ख़बर' की पहली सुर्खी सोशल मीडिया के बारे में थी.

स्थानीय मुद्दे

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'डॉन ऑफ़ इंडिया', जिसने खाद्य आपूर्ति की ख़बर छापी थी उसकी दूसरी हेडलाइन में 'आम जन' का हवाला दिया गया था.

तस्वीरें भी उसी ख़बर से संबंधित थीं. बाक़ी की ख़बरों में एक सड़क दुर्घटना, एक गाँव में गंदा पानी, आयकर विभाग का छापा और एक साथ 202 लोगों की शादी का ज़िक्र था.

राजनीति की ख़बरें संक्षिप्त समाचारों में थी. पहले पन्ने पर सबसे नीचे. इसके ठीक उलट दोनों केद्र शासित प्रदेशों से बाहर के अख़बारों में राजनीति प्रमुखता से छाई हुई थी.

राजस्थान पत्रिका, गुजरात समाचार, नवभारत, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और इकोनॉमिक टाइम्स ने दमन को दमन की नज़र से नहीं देखा.

उनकी ख़बरों में नरेंद्र मोदी थे, अरविंद केजरीवाल थे, सोनिया गाँधी थीं और बीसीससीआई प्रमुख श्रीनिवासन थे लेकिन दमन-दीव और दादरा नगर हवेली का आम आदमी नहीं था.

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