समंदर और शहरीकरण के बीच फंसा नागांव

  • 28 मार्च 2014
महाराष्ट्र में रायगढ़ का नागांव

सागरनामा का सफर महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले तक पहुंच चुका है. इस बार कभी मछुआरों का गांव रहे नागांव की कहानी, जो फिलहाल शहरों के विस्तार में फंसकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है.

समुद्रतट पर स्थित रायगढ़ के ज़िला मुख्यालय अलीबाग़ से दस किलोमीटर दक्षिण में है नागांव.

बिल्डर की नज़र

एक ज़माने में ये मछुआरों का नया गाँव था. नागांव अब पुराना पड़ गया है. उसे नई शक़्ल देने के लिए बिल्डर पहुँच गए हैं. प्लॉट बेचे जा रहे हैं.

एक गांव वाले का कहना था कि इस तरह तो कुछ दिन में समूचा नागांव बिक जाएगा.

मछुआरों के घर

पहले नागांव के सारे मकान एक मंज़िला थे. पूरी बस्ती मछुआरों की थी, जो अब तट से निकटता के बावजूद अपने घरों से दूर धकेले जा रहे हैं.

ख़परैल की छतों वाले कुछ कच्चे, कुछ पक्के मकान अपना वजूद बचाने की कशमकश में हैं.

पुराने घरों की जगह नए आलीशान मकानों ने ले ली है. जिनकी खिड़कियाँ समंदर में झांकती हैं. हालांकि अभी अधिकतर नए मकानों में लोग रहने नहीं आए हैं. ये उनकी साप्ताहिक सैरगाह है.

बड़े मकान शायद मछुआरों की पहुँच और उनके सपनों से बाहर हैं. उनकी ज़मीन उन्हीं को बेच देने के प्रयास होर्डिंग और पोस्टरों के रूप में गाँव की सड़कों पर दिखते हैं. सपने सिमटकर वन बीएचके अपॉर्टमेंट हो गए हैं.

साप्ताहिक हाट

गुरुवार को नागांव में साप्ताहिक हाट लगता है. लगभग एक हज़ार की मूल आबादी वाला पूरा नागांव एक एकड़ के बाज़ार में सिमट आता है.

रोज़मर्रा की चीज़ें, अनाज़, मसाले, दाल, फल सब्ज़ियाँ और मछलियाँ ग्राहक ढूंढ़ती हैं.

सफ़ेद प्याज

अलीबाग अपने सफ़ेद प्याज़ के लिए मशहूर है, जिसे आयुर्वेद में उसके औषधीय गुणों के लिए उपयोगी बताया गया है.

एक स्थानीय गाँव खंडाले के नाम पर इस प्याज़ का नाम खंडाले कांदा है.

खंडाले कांदा का स्वाद सामान्य प्याज़ से अलग होता है और जोड़ों का दर्द मिटाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है.

मछलियों का स्वाद

समुद्र का किनारा हो और मछलियाँ न हों, कैसे हो सकता है. साप्ताहिक बाज़ार में ताज़ा मछलियों के अलावा सूखी मछलियाँ भी बिकती हैं, जिन्हें महीने भर तक रखा जा सकता है.

इस बाज़ार में इनकी कीमत 200 रुपए से लेकर 1200 रुपए किलो तक है.

जितनी तरह की मछलियाँ बाज़ार में मिलती हैं, स्थानीय लोग सबके नाम जानते हैं. उन्हें नाम लेकर पुकारा जाता है. दो ख़ास मछलियाँ सोढ़ा और सुरमई हैं. सोढ़ा सबसे महंगी 1200 रुपए किलो है जबकि सुरमई 400 रुपए किलो बिकती है.

आंखों में सपने

सूखी मछलियों की आँखें भले कुछ न देख पाती हों लेकिन उन्हें बेचने वालों की आँखों में सपने होते हैं.

उम्मीद होती है कि शाम तक या फिर अगले गुरुवार के हाट तक ज़िंदगी आसानी से कट जाएगी.

मालामाल

दुनिया की तरह साप्ताहिक हाट भी सबको एक नज़र से नहीं देखता. कुछ होते हैं जिन्हें वो मालामाल कर देता है जबकि कुछ दूसरों के लिए ये साप्ताहिक संघर्ष है.

किशनी नानेश्वर हर महीने 40,000 तक कमा लेती हैं और उनके पाँचों बच्चों स्कूल जाते हैं.

रोटी का संघर्ष

दस क़दम दूर बैठी एक बूढ़ी औरत शायद किशनी की तरह भाग्यशाली नहीं है. उनकी बिक्री कम होती है. लेकिन पैसे तो चाहिए ही इसलिए वो अपना फोटो खींचने के बदले 90 रूपए माँगती है. क्या सोचकर 100 तक नहीं पहुँची, वही जानें.

पूरे देश में चुनावों का रंग है लेकिन नागांव में चुनाव को लेकर न फूलों वाली रंगत है ना खुशबू.

उनसे अपनी ज़िंदगी ही नहीं संभलती, मुल्क़ तो बहुत बाद में आता है. शायद यही वजह है कि चुनावों पर यहाँ कोई बात नहीं करता.

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