'निर्भीक' से लैस कल्पना पाण्डेय

कानपुर फील्ड गन फैक्टरी से निर्भीक प्राप्त करने वाली महिलाएँ

कम वज़न की और ख़ासतौर पर महिलाओं के बनी रिवॉल्वर है 'निर्भीक'. इसे पाने वाली पहली महिला बनी हैं कल्पना पाण्डेय जो बाराबंकी की रहने वाली हैं.

करीब 500 ग्राम के इस रिवॉल्वर की कीमत 1.20 लाख रुपए रखी गई है.

('सिस्टम' और बढ़ा देता है दर्द)

कल्पना के पति जज हैं और वो ख़ुद एक गृहणी और दो छोटे बच्चों की माँ हैं.

कानपुर में बुधवार को फ़ील्ड गन फैक्ट्री में उन्हें यह रिवॉल्वर सौंपी गई.

कल्पना पाण्डेय का कहना है, "आज छोटी लड़कियों के साथ भी पता नहीं क्या-क्या हो रहा है? आज अगर माँ सुरक्षित है और अपनी सुरक्षा के बारे में सोचती है तो वह अपनी बच्ची और समाज को भी आगे बढ़ा सकती है."

टाइटेनियम एलॉय

कल्पना पाण्डेय ने कहा कि रिवॉल्वर उन्हें ठीक से चलानी नहीं आती, लेकिन वे इसे सीख लेंगी.

रिवॉल्वर हल्की क्यों बनाई गई है?

इस बारे में ऑर्डनेन्स फ़ैक्ट्री बोर्ड के महानिदेशक एमसी बंसल कहते हैं, "देश में महिलाओं के साथ हो रही बर्बर घटनाएं देखते हुए हमने महिलाओं की सुरक्षा को ख़ास प्राथमिकता दी है. महिलाओं के इस्तेमाल लायक एक रिवॉल्वर 'निर्भीक' निर्मित किया गया है."

आमतौर पर रिवॉल्वर स्टील की बनती हैं, पर 'निर्भीक' को ख़ासतौर पर हल्का बनाने के लिए इसमें टाइटेनियम एलॉय का इस्तेमाल हुआ है.

फ़ील्ड गन फ़ैक्ट्री के जनरल मैनेज़र अब्दुल हमीद ने कहा, "हम 'मार्क थ्री' नाम से एक रिवॉल्वर बना रहे थे पर फ़ीडबैक मिल रहा था कि वह भारी थी. तो हमने एक हल्का रिवॉल्वर बनाने का प्रयास किया. इस काम में तीन साल लगे. रिवॉल्वर बनाने के लिए स्टील की जगह टाइटेनियम एलॉय का इस्तेमाल किया गया."

महिला सुरक्षा

हमीद आगे कहते हैं, "टाइटेनियम एलॉय के प्रयोग से रिवॉल्वर का वज़न 750 ग्राम से 500 ग्राम हो गया. महिलाएँ इसे चला चुकी हैं. उन्हें आसानी है क्योंकि इसका वज़न कम है."

(शक्ति मिल बलात्कार मामला)

हमीद कहते हैं कि 'निर्भीक' नाम दिल्ली में हुए निर्भया काण्ड से प्रेरित है. उन्होंने बताया, "ये रिवॉल्वर ऑर्डनेन्स फ़ैक्ट्री बोर्ड की तरफ से सभी महिलाओं को समर्पित है."

'निर्भीक' पाने वाली दूसरी महिला बनने का मौक़ी दिल्ली की हीरा व्यापारी सीमा खरबंदा को मिला.

उन्होंने कहा, "मेरे पास एक रिवॉल्वर पहले से है. अब मैंने दूसरी ली है. मीडिया के ज़रिए मुझे इसके बारे में पता चला था."

आत्मरक्षा के लिए

खरबंदा हीरों की व्यापारी हैं तो क्या उन्हें आत्मरक्षा के लिए रिवॉल्वर के इस्तेमाल की कभी ज़रूरत पड़ी है?

उनका जवाब था, "नहीं." फिर उन्होंने 'निर्भीक' क्यों ख़रीदी?

(वो अकेली औरत)

इस सवाल पर सीमा खरबंदा कहती हैं, "सुरक्षा के लिए. ये हल्की है. रखना आसान है. बंदा बेधड़क होकर कहीं भी जा सकता है लेकिन ख़ास बात यह है कि इससे आत्मविश्वास आता है."

वे कहती हैं , "मैं रिवॉल्वर चलाती तो हूँ पर सिर्फ दीवाली में."

तो क्या रिवॉल्वर खरीदना ही महिलाओं के लिए उनकी सुरक्षा का एकमात्र तरीक़ा है? महिला मंच नाम से एक सामाजिक संस्था चलाने वाली नीलम चतुर्वेदी इस पर जवाब देती हैं, "नहीं."

उनके अनुसार, "हथियार होना या मार्शल आर्ट सीखना महिलाओं के लिए ठीक तो है, पर कुछ हद तक. समाज को महिलाओं के प्रति अपनी सोच बदलनी पड़ेगी."

रिवॉल्वर या पेप्पर स्प्रे

कानपुर के एक पब्लिक स्कूल की प्रिंसीपल ऋतु चित्रांशी कहती हैं, "अगर ज़रूरत पड़ी तो रिवॉल्वर के बदले मैं पेप्पर स्प्रे रखूंगी.

एक आम महिला के लिए रिवॉल्वर संभालकर रखना आसान नहीं है. दूसरी बात, कोई महिला अपने बचाव के लिए भी रिवॉल्वर इस्तेमाल करेगी तो क़ानून के घेरे में आ सकती है."

मगर सवाल यह उठता है कि इस पर पुलिस का क्या रुख़ है?

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी यशस्वी सिंह कहते हैं, "मैं इस बात के सख़्त ख़िलाफ़ हूं कि 'निर्भीक' या किसी भी रिवॉल्वर को आम आदमी को आँख बंद करके मुहैया करा दिया जाए. एक रिवॉल्वर चलाने के लिए आदमी को प्रशिक्षित होना चाहिए. हर आदमी को रिवॉल्वर या पिस्टल नहीं दिया जाना चाहिए."

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