बंगालः ख़त्म हुआ दीवार पर लिखने का वक़्त

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अपने चुटीले नारों और चुभते कार्टूनों की वजह से मशहूर पश्चिम बंगाल की दीवार लेखन कला अब दम तोड़ रही है. सोशल मीडिया के बढ़ते असर और चुनाव प्रचार के दूसरे साधनों की बाढ़ ने इस कला को पीछे धकेल दिया है.

ब्रिटिश शासनकाल से लेकर अस्सी-नब्बे के दशक तक राज्य में तमाम मुद्दे इन दीवारों पर उभर आते थे. वह चाहे ट्रेड यूनियन की हड़ताल हो या जूट मिलों का मामला या फिर केंद्र के ख़िलाफ़ तब की सीपीएम सरकार के व्यंग्यबाण हों.

चुनावों के समय तो कहना ही क्या! दीवारों पर ऐसे एक से बढ़कर एक चुभते नारे और व्यंग्य लिखे जाते थे जिनसे विपक्षी दल तिलमिलाने और आम लोग बरबस मुस्कराने को मजबूर हो जाते थे. उस समय इसके लिए बाक़ायदा कलाकारों की एक जमात होती थी.

लेकिन अब दीवार लेखन का रंग पिछले कुछ चुनावों से लगातार फीका पड़ता जा रहा है. यह कहना ज़्यादा सही होगा कि कोलकाता ने अपनी इस विरासत से मुंह मोड़ लिया है.

'प्रचार के दूसरे तरीक़े'

दीवार लेखन की कला यहां बहुत पुरानी है. नब्बे के दशक के शुरुआती दौर तक हज़ारों लोग इससे जुड़े थे. चुनाव हो या कोई राजनीतिक रैली, तमाम दल इन दीवारों का ही सहारा लेते थे.

चुनावों के दौरान तो तमाम दीवारें सतरंगी हो जाती थीं. 2006 के विधानसभा चुनावों के दौरान चुनाव आयोग ने दीवार लेखन पर पाबंदी लगा दी थी.

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आयोग ने तब वेस्ट बंगाल प्रिवेंशन ऑफ़ प्रॉपर्टी डिफ़ेसमेंट एक्ट-1976 के तहत यह पाबंदी लगाई थी. बाद में इस क़ानून को कुछ शिथिल बनाया गया. 2009 के लोकसभा और दो साल बाद विधानसभा चुनावों के दौरान दीवार लेखन कुछ हद तक पुराने रंग में तो लौटा, लेकिन उसकी धार कुंद हो चुकी थी.

आख़िर यह कला फीकी क्यों पड़ रही है? इस पर लोग इसके लिए सोशल मीडिया के बढ़ते असर को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. आसानी से ज़ुबान पर चढ़ने वाले नारों और चुभते कार्टूनों के लिए मशहूर वामपंथी पार्टियों का जादू भी कहीं खो गया है.

सीपीएम नेता अशोक भट्टाचार्य कहते हैं, "समय के साथ बदलना ज़रूरी है. अब सोशल मीडिया दीवार लेखन से ज़्यादा असरदार है."

कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य कहते हैं, "अब यह कला धीरे-धीरे ख़त्म हो रही है. दीवार पर चुनाव प्रचार तो अब भी हो रहा है. लेकिन यह सांकेतिक ही है."

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तृणमूल कांग्रेस के नेता सौगत राय कहते हैं, "अब सोशल मीडिया का असर और पहुंच तेज़ी से बढ़ी है. गांवों में भी लगभग सबके पास मोबाइल है. दीवार लेखन के मुक़ाबले सोशल मीडिया के ज़रिए प्रचार सस्ता भी है और उसमें समय भी नहीं लगता."

कहां तो पहले चुनावों से महीनों पहले ही राजनीतिक दलों में दीवारों पर कब्ज़ा करने की होड़ लग जाती थी और कहां अब महज़ कुछ उम्मीदवारों को वोट डालने की अपील ही नज़र आती है.

तृणमूल कांग्रेस की ही उम्मीदवार काकोली घोष दस्तीदार कहती हैं, "अब इंटरनेट और सोशल मीडिया ने काम आसान कर दिया है."

भाजपा उम्मीदवार और जाने-माने जादूगर पीसी सरकार (जूनियर) कहते हैं, "वक़्त के साथ चीज़ें तो बदलती ही हैं. चुनाव प्रचार के दूसरे तरीक़े दीवार लेखन पर हावी हो गए हैं."

'इंटरनेट ने किया धंधा चौपट'

2006 में आयोग की ओर से लगी पाबंदियों के बाद ही राज्य में दीवार लेखन काफी कम हो गया है. पहले हर राजनीतिक दल में कुछ ऐसे लोग होते थे, जिनका काम ही था पूरे साल ताज़ातरीन मुद्दों पर नारे और व्यंग्य लिखना. अब किसी भी पार्टी में ऐसे लोग नहीं बचे हैं.

सत्तर से नब्बे के दशक तक महानगर कोलकाता की तमाम दीवारें ताज़ातरीन मुद्दों पर राजनीतिक दलों की टिप्पणियों से भरी होती थीं. तब कांग्रेस की ओर से दीवारों पर लिखे गए उस नारे को भला कौन भूल सकता है-"ज्योति बसुर दुई कन्या, खरा आर वन्या (ज्योति बसु की दो बेटियां हैं, सूखा और बाढ़)."

बसु सरकार तब लगातार केंद्र के ख़िलाफ़ राज्य की उपेक्षा का आरोप लगाती रहती थी. कांग्रेस ने इसके जवाब में लिखा था-"राज्येर हाथे आरो मोमबाती आर केरोसीन चाई (राज्य को और अधिक मोमबत्तियां और मिट्टी का तेल चाहिए)."

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उन दिनों राज्य बिजली कटौती के भयावह दौर से गुज़र रहा था. राजधानी कोलकाता में रोज़ाना आठ-नौ घंटे की कटौती आम थी.

वाममोर्चा उस दौर में जहां दीवार लेखन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनकी नीतियों को निशाना बनाता था, वहीं अपनी नीतियों का भी प्रचार-प्रसार करता था.

वियतनाम युद्ध के दौर में कोलकाता की दावारों पर उसका एक नारा काफ़ी मशहूर हुआ था-"आमरा नाम तोमार नाम, वियतनाम, वियतनाम."

तब राजनीतिक दल जटिल राजनीतिक मुद्दों को भी सरलता से दीवारों पर उकेर देते थे ताकि आम लोग उनको आसानी से समझ सकें.

कलाकार नहीं

महानगर के एक कार्टूनिस्ट शोभन सिन्हा कहते हैं, "पहले ऐसे कलाकार थे, जो हमारे कार्टूनों को जस का तस दीवारों पर उतार देते थे. अब ऐसे लोग ग़ायब ही हो गए हैं."

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दीवार लेखन का काम करने वाले ज़्यादातर कलाकार अब पोस्टर-बैनर और झंडे बनाने के धंधे में लग गए हैं.

कलाकारों के इलाके चितपुर में शमीक दास कहते हैं, "अब दीवार लेखन का ज़्यादा काम नहीं मिलता. इंटरनेट ने हमारा धंधा चौपट कर दिया है."

शमीक और उनकी तरह के सैकड़ों कलाकार अब प्रचार सामग्री और नेताओं के कटआउट बनाते हैं.

अब बरसों पहले आयोग की ओर से लगाई गई पाबंदी का असर हो, सोशल मीडिया की पहुंच हो या फिर ऐसे लोगों और कलाकारों की ग़ायब होती पीढ़ी की वजह से ऐसा हो, इस बार लोकसभा चुनावों में बंगाल में कम से कम दीवारों पर चुभते-चुटीले नारों और कार्टूनों की कमी तो खल ही रही है.

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