सागरनामा-9: भटकल यानी पहचान का आतंक

  • 30 मार्च 2014
भटकल कर्नाटक

पहचान किसी के लिए दायरे नहीं खींचती, दरीचे खोलती है. संभावनाओं का भरा-पूरा संसार लेकिन इसी के साथ इसका एक दूसरा पहलू भी है. पहचान का संसार इतना उलझा हुआ है कि दुनिया के तमाम मुल्क और बेशुमार लोग हर वक़्त उससे दो-चार होते नज़र आते हैं.

सवाल देश का हो या किसी एक व्यक्ति का, संभावना और संकट एक जैसा होता है. बात देशों पर ही नहीं रुकती, बढ़कर महाद्वीपों तक पहुँच जाती है.

इसे गढ़ने में पीढ़ियाँ गुज़र जाती हैं लेकिन बिगड़ने में एक पल नहीं लगता. सिर्फ़ कुछ शब्द इसी पहचान की वजह से एक रूढ़ तस्वीर गढ़ते हैं और दिमाग़ वहीं अटककर रह जाता है.

लेबनानी लेखक अमीन मालूफ़ ने 'इन द नेम ऑफ़ आइडेंटिटी' में इसका हवाला देते हुए अपना उदाहरण दिया है. कहते हैं कि वह लेबनान के एक छोटे क़स्बे में पैदा हुए, ईसाई अल्पसंख्यक हैं.

अरबी, लेबनानी, अंग्रेज़ी और फ्रेंच भाषा बोलते हैं, फ्रांस में रहते हैं तो फिर उनकी असली पहचान क्या हुई? यह कैसे तय होगा कि पहचान भाषा के आधार पर होगी या देश के. उन्हें अल्पसंख्यक माना जाएगा या धर्म उनकी पहचान तय करेगा.

पहचान का संकट

किसी की केवल एक पहचान नहीं हो सकती. हर व्यक्ति में पहचान का एक समूह रहता है, जिसमें से वही पहचान सामने आती है जिसे ख़तरा हो. बाक़ी सब क़तारबद्ध होकर उसके पीछे खड़ी हो जाती हैं. मक़सद होता है पहचान की हिफ़ाज़त.

एक तरह की कई पहचान इकट्ठा हो जाएं तो या तो संभावनाओं के कई दरवाज़े खुलते हैं या सामूहिकता उस संकट को बढ़ा देती है. इसका यह पहलू नकारात्मक पहचान का है. यानी जो आप नहीं चाहते उस तरह देखे जाने का.

भारत के अलग-अलग हिस्से पहचान के संकट से जूझते रहे हैं. अयोध्या की पहचान बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद बने अस्थायी ढांचे और उस पर तने तिरपाल से होती है. आज़मगढ़ को आतंक से जोड़ा जाता है, गोधरा को जली हुई रेल की बोगी से, बस्तर को माओवादियों से और तेलंगाना को क्रूर ज़मींदारों से.

ज़ाहिर है, ये थोपी गई छवियाँ हैं, जिनका असल ज़िंदगी में उन शहरों और वहाँ के लोगों से कोई सरोकार नहीं. यही भटकल के साथ हुआ है.

भटकल की पहचान

कर्नाटक के ख़ूबसूरत तटवर्ती इलाक़े के बीच छह किलोमीटर में फैले भटकल की आबादी सवा लाख है, 80 हज़ार मोटरसाइकिलें और 10 हज़ार कारें, आलीशान होटल जहाँ दो लोगों के खाने का बिल आठ हज़ार तक पहुँच सकता है, बाज़ार का एक हिस्सा जिसे मिनी दुबई कहा जाता है, विशाल, भव्य मकान और चौड़ी सड़कें हैं.

भटकल में बड़े स्कूल हैं और एक इंजीनियरिंग कॉलेज भी. शिक्षा पर ख़ास जोर दिया जाता है. लड़के-लड़कियों की पढ़ाई पर बराबर तवज्जो है. नई से नई क़िस्म के गैजेट तुरंत उपलब्ध हैं. फ़ैशन के मामले में भी शहर पीछे नहीं है. अमरीकी फ़ैशन वाया दुबई एक पखवाड़े में भटकल की सड़कों पर नज़र आने लगता है.

...और पहचान रियाज़ भटकल के नाम पर. यह भटकल नाम का आतंक ही है कि जनता दल यूनाइटेड छोड़कर भाजपा में शामिल हुए साबिर अली को चौबीस घंटे के अंदर पार्टी से निकाल दिया गया है. कारण यह कि वे कथित तौर पर रियाज़ भटकल को जानते हैं.

एक सज्जन ने कहा कि उनका नाम भी रियाज़ भटकल है. उनके ख़ित्ते में 47 रियाज़ भटकल हैं. समुद्र और घाट के बीच में लगभग 18 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला भटकल शहर, जिसे स्थानीय लोग 'अपना गाँव' कहते हैं, इस बात के लिए तैयार नहीं था कि एक दिन उस पर आतंकवादियों की पनाहग़ाह होने की पहचान थोप दी जाएगी.

पहचान का आतंक

स्थानीय लोग अपनी इस नकारात्मक पहचान को ख़ारिज करते हैं. उनका कहना है कि भटकल की आबादी मिली-जुली है और किसी को कोई समस्या नहीं है. सब साथ रहते हैं. यहाँ आतकंवादी बंदूकों लटकाए नहीं घूमते, जैसी उसकी छवि बना दी गई है.

एक सज्जन व्यापार के सिलसिले में अक़सर यात्रा पर होते हैं और हर क़दम पर यह पूछे जाने पर कि वे कहाँ के हैं, उन्हें अपनी पहचान छिपानी पड़ती है. वे ख़ुद को आसपास के किसी गाँव का बता देते हैं. भटकल कहने पर उनके बारे में लोगों की सोच बदल जाती है, ऐसा उन्होंने कई बार महसूस किया है.

भटकल के लिए यह पहचान का संकट नहीं बल्कि पहचान का आतंक है. वे इससे हर हाल में बाहर निकलना चाहते हैं. लेकिन उन्हें रास्ता नहीं सूझता. सागरनामा की टीम को वो अपने वाहन से भटकल घुमाना चाहते थे ताकि सच लोगों के सामने आ सके.

मीडिया

ले-देकर भटकल के निवासियों को बस एक बात समझ में आती है कि इसके लिए किसे ज़िम्मेदार मानें. तब उनके मुँह से केवल एक शब्द निकलता है- मीडिया. उन्हें समझ नहीं आता कि मीडिया ने ऐसा क्यों किया और अगर किया तो अब पलटकर अपनी ग़लती सुधारने क्यों नहीं आता.

हैरानी की बात यह थी कि उनमें से किसी ने भटकल की इस हालत के लिए नेताओं को ज़िम्मेदार नहीं बताया. उन्हें इसमें राजनीति नज़र नहीं आती. हालाँकि राजनीति को लेकर वे चौकस हैं.

चुनाव होने वाले हैं तो वे एक-एक प्रत्याशी को खूब जाँच-परख रहे हैं. हर तरह से पड़ताल. सवाल अगले पाँच साल का है और वे नहीं चाहते कि कोई चूक हो जाए और उन्हें बाद में अफ़सोस हो.

भटकल जिस संसदीय क्षेत्र में आता है, वहाँ मुख्यतः कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ही हैं. उनके पास विकल्प अधिक नहीं हैं. राजनीतिक दलों से वे सिर्फ़ इतना चाहते हैं कि ग़लत वजहों से भटकल ख़बरों में न आए.

हिंदू-मुसलमान और दीगर धर्मों के लोग लगभग एक स्वर में मीडिया को कोसते रहे. तभी किसी को ख़्याल आया कि ये भी तो मीडियावाले हैं. उनका घर पास में ही था, दौड़कर गए और विदेश से आई चॉकलेट ले आए.

उन्होंने कहा, ये भटकल की ओर से आपके लिए है ताकि यहाँ की मिठास आपको याद रहे.

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