चुनावी हलचल: संघ की पत्रिका में राहुल 'दावेदार'

  • 1 अप्रैल 2014

भ्रष्टाचार इस चुनाव का मुद्दा है? यूपीए2 के काल में कई गंभीर घोटाले सामने आए. लेकिन आम आदमी पार्टी के इलावा कोई और पार्टी इस मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाने में अब तक नाकाम रही है.

भारतीय जनता पार्टी भी भ्रष्टाचार विरोधी नारे लगा रही है लेकिन स्क्रॉल डॉट कॉम के अनुसार इसने बीएस येदियुरप्पा जैसे नेताओं को मैदान में उतारा है जिनके दामन पर भ्रष्टाचार के दाग़ लगे हैं.

इसी वजह से पहले येदियुरप्पा को पार्टी से निकाला गया था, लेकिन पिछले साल उनकी ग़ैरहाज़िरी में पार्टी विधानसभा का चुनाव बुरी तरह से हार गई, जो पार्टी में उनकी वापसी का कारण बनी. अब उन्हें एक बार फिर चुनाव में खड़ा किया गया है. उम्मीद की जा रही है कि उनकी जीत होगी.

सभी पार्टियों ने भ्रष्टाचार के इल्ज़ाम में फंसे लोगों को टिकट दिए हैं. कांग्रेस में आदर्श घोटाले के इल्ज़ाम से घिरे अशोक चौहान हों या डीएमके के ए राजा या फिर आंध्रप्रदेश के जगनमोहन रेड्डी- इन सभी नेताओं पर भ्रष्टाचार के इल्ज़ाम लगे हैं.

रेड्डी और राजा तो एक साल से अधिक समय तक जेल में भी गुज़ार चुके हैं.

स्क्रॉल डॉट कॉम में छपे इस लेख में कहा गया है कि पार्टियाँ भ्रष्टाचार के इल्ज़ाम में फंसे उम्मीदवारों को टिकट देते समय ये देखती हैं कि ये चुनाव प्रचार में कितना पैसा खर्च कर सकते हैं. भ्रष्टाचार के कारण इन उम्मीदवारों की छवि पर कोई ख़ास असर नहीं देखने को मिला है. असल में ऐसे उम्मीदवारों के जीतने की उम्मीद अधिक होती है.

चुनावी प्रचार से इनकार

भ्रष्ट लोगों को टिकट देने के मुद्दे पर एनडीटीवी पर एक बहस में हिस्सा लेते हुए फिल्म अभिनेता आमिर खान ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी पार्टी के लिए चुनावी प्रचार में भाग लेने से साफ़ इनकार क्यों करते हैं.

वह इस बात से मायूस हैं कि लगभग सभी पार्टियों ने दागदार लोगों को चुनाव में उतारा है. लेकिन आमिर पार्टियों से भी अधिक मतदाताओं से मायूस हैं जो ऐसे लोगों को चुनाव में वोट देते हैं.

उनका तर्क ये है कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कानून बनाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी अगर मतदाता दाग़दार लोगों को वोट न दें. अगली बार से सियासी पार्टियां ऐसे लोगों को टिकट देने की मूर्खता नहीं करेगी.

फिलहाल आमिर को कोई पार्टी रास नहीं आती. वह उस पार्टी का आज भी इंतज़ार कर रहे हैं जो उनके दिल को छू जाए और वह पार्टी उनके विचार में देश और जनता के हित में काम करने वाली पार्टी हो. वह उस पार्टी के लिए प्रचार करने को तैयार होंगे.

महिलाओं की भागीदारी

भारत ने एक महिला प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दिया है जबकि कई राज्यों में महिला मुख्यमंत्री भी हो चुकी हैं. लेकिन संसद में महिलाओं की संख्या उनकी आबादी के हिसाब से काफी कम है.

हैरानी की बात यह है कि जिन राज्यों में महिला आबादी का अनुपात बेहतर है वहां से सबसे कम महिलाएं संसद में चुन कर आती हैं. जबकि जहाँ उनकी आबादी मर्दों के मुकाबले में कम है वहां से सब से अधिक महिलाएं चुन कर संसद में प्रवेश करती हैं.

दैनिक अख़बार मिंट ने इंडियास्पेंड्स नामक एजेंसी से कराए सर्वे के बाद पंजाब का उदाहरण देकर कहा कि वहां हर 1,000 मर्दों पर 893 महिलाएं हैं लेकिन इसके बावजूद संसद में 31 प्रतिशत के साथ पंजाब की औरतों की संख्या सबसे अधिक है.

पिछले आम चुनाव में 11.4 प्रतिशत महिलाएं चुन कर संसद में आई थीं जो बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों से भी ख़राब उदाहरण है.

अचार संहिता का उल्लंघन

चुनाव आयोग ने एक सप्ताह पहले गैस के दाम बढ़ाने की सरकार की योजना को भी लागू करने पर रोक लगा दी. अख़बार के अनुसार आयोग का पिछले दस सालों में सफलतापूर्वक चुनाव कराने का रिकॉर्ड सराहनीय है लेकिन गैस और बैंक के इन मुद्दों पर आयोग ने अपने अधिकारों की सरहदें पार कर दी हैं.

अख़बार के तर्क में काफ़ी दम है और इस लेख को पढ़कर तेल और गैस की बड़ी कंपनियां काफ़ी खुश होंगी.

दैनिक अखबार इकॉनामिक टाइम्स के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की साप्ताहिक पत्रिका ऑर्गेनाइज़र ने एक सर्वेक्षण कराया है जिसमें नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए लोगों का सब से पसंदीदा उम्मीदवार पाया है. राहुल गाँधी दूसरे नंबर पर जबकि अरविंद केजरीवाल तीसरे नंबर पर इन दोनों नेताओं से काफी पीछे हैं.

हो सकता है कि इस सर्वेक्षण के नतीजे सही साबित हों लेकिन क्या आरएसएस की अपनी पत्रिका में राहुल गाँधी को नंबर वन उम्मीदवार घोषित किया जाता?

लेकिन ऑर्गेनाइज़र की इस बात के लिए तारीफ़ करनी होगी कि इसने काफी बड़ा सर्वे कराया. इस सर्वे का सैंपल साइज़ एक लाख 14 हज़ार लोगों से इंटरव्यू पर आधारित था. इन लोगों के लिए लोकसभा की 380 सीटों में सर्वे किया गया था.

ऑर्गेनाइज़र ने सर्वे के हवाले से यह भी उजागर किया कि दक्षिण भारत में राहुल गाँधी प्रधानमंत्री पद पर सबसे लोकप्रिय उम्मीदवार हैं, नरेन्द्र मोदी से भी अधिक लोकप्रिय.

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