सागरनामा-11: चुनावी सूखे में केरल के रंग

केरल में चुनाव प्रचार

आँखें अपने ढंग से चीज़ें देखने की आदी होती हैं. भटकाव उन्हें असहज बनाता है. वे प्रायः पारंपरिक होती हैं, मन से सर्वथा अलग. वे न भटकती हैं, न भटकना चाहती हैं इसलिए कई बार नयापन उनके लिए अटपटापन बनकर आता है. यात्राओं के दौरान कुछ ज़्यादा.

सागरनामा के लिए पिछले दस दिन में आठ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों से गुज़रते हुए आँखों ने जो देखा, उनके लिए सहज नहीं रहा होगा. अव्वल तो हर इलाक़े में बेहतर या बदतर बेताहाशा बदलाव, जो आर्थिक उदारीकरण के बाद बेहद तेज़ी से हुआ, और दोयम कि माहौल चुनाव का था लेकिन चुनाव कहीं दिख नहीं रहा था.

जब तक आँखें केरल नहीं पहुँचीं, उदास थीं. क़रीब चार हज़ार किलोमीटर सूखे-सूखे निकल गए, सारी हरियाली के बावजूद. परंपरागत चुनाव सिरे से नदारद.

हरियाणा में सड़क पर चुनाव का कोई माहौल नहीं था और 'रंगीलो राजस्थान' में ले देकर एक चुनावी पार्टी मिली, सिरोही में.

गुजरात में भी चुनावी सन्नाटा. मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तक के पोस्टर नहीं. जो थे भी, चुनाव आयोग के डर से हटा लिए गए. बस उनके एक लोकसभा क्षेत्र वडोदरा में बिजली के खंभों से लटकी कुछ छोटी तस्वीरें देखने को मिलीं.

चुनावी सरगर्मी

महाराष्ट्र में भी वही हाल. कोंकण क्षेत्र में रत्नागिरी में एक कार दिखी, जिस पर अरविंद केजरीवाल की तस्वीर का झंडा लहरा रहा था. हाँ, सिंधुदुर्ग में घर-घर जाकर प्रचार करती शिवसैनिकों की एक टोली ज़रूर दिखी.

गोवा में कोई चुनावी सरगर्मी नहीं. एक चौराहे पर रंग-बिरंगी पोशाकों में कुछ बड़े पुतले दिखे लेकिन उन्हें शिगमोत्सव की तैयारी के सिलसिले में लगाया गया था.

कर्नाटक के अंकोला में एक बड़ी प्रचार गाड़ी खड़ी थी, जिस पर नरेंद्र मोदी के साथ अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की तस्वीर थी.

तमिलनाडु में भी अंदरूनी इलाक़ों में सन्नाटा ही था. तीन केंद्र शासित प्रदेशों दमण-दीव, दादरा नगर हवेली और पुड्डुचेरी में कुछ छुटपुट प्रचार था ज़रूर पर चुनाव की नज़र से बिलकुल नाकाफ़ी.

परंपरागत ढांचा

ऐसे माहौल में आँखें पथरा ही गई होतीं अगर रास्ते में केरल न पड़ा होता. अचानक परंपरागत ढंग से चीज़ें देखने की अभ्यस्त आँखों में चमक आ गई. चुनाव, चुनाव जैसा लगने लगा. थोड़ा सुक़ून मिला. पहली बार महसूस हुआ कि वाक़ई चुनाव हो रहे हैं.

मुख्य सड़कों के अलावा अंदरूनी इलाक़ों में भी बैनर-पोस्टर, मोदी और राहुल गाँधी के होर्डिंग, फ़िल्मी सितारों की तरह प्रत्याशियों की तस्वीरें, दीवारों-सड़कों पर नारे और जगह-जगह सौ-दो सौ लोगों की नुक्कड़ सभाएं. कई जगह चे ग्वारा के पोस्टर और बिजली के खंभों पर उनकी तस्वीर.

राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा शिक्षित और संपन्न केरल में सड़कों पर बहस पार्टियों से अधिक प्रत्याशियों और विचारधाराओं पर होती है. ज़्यादातर लोग मानते हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ़ राज्य में बेहतर स्थिति में है. उससे बची सीटें, लोगों के मुताबिक़, वाम मोर्चे एलडीएफ़ को मिल जाएंगी.

ज़मीनी राजनीति

महंगाई उनके लिए विचारधारा के बाद दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा है और भ्रष्टाचार तीसरा.

चाय की दुकान पर चलने वाली अनौपचारिक चर्चाओं में आम आदमी पार्टी शामिल होती है पर अधिकतर लोग उसे गंभीरता से नहीं लेते.

भारतीय जनता पार्टी भी राजनीतिक विमर्श में है लेकिन लोग ज़मीनी राजनीति में उसकी उपस्थिति अगले एक दशक तक नहीं देखते और भाजपा को केरल में एक भी सीट नहीं देते.

धर्मनिरपेक्षता को अंदर तक महसूस करने और उसे सीने पर टांके लोगों की प्रतिक्रियाएँ सुनिश्चित कर देती हैं कि मोदी की लहर इस राज्य में हवा हो जाए.

मोदी तस्वीरों में दिखते हैं, ज़मीन पर नज़र नहीं आते. केरल की आँखें मोदी को देखती हैं, मन नहीं देखता.

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