ये रहे 'आँखों देखी' के बाबूजी संजय मिश्रा

संजय मिश्रा

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उनकी माताजी उन्हें छोड़ने आई थीं.

जैसे ही रेलगाड़ी चलने लगी माताजी की आँखें भर आईं. खिड़की की सलाखें पकड़े पकड़े तीन-चार क़दम साथ चलने के बाद वो अपनी रुलाई नहीं रोक पाईं.

शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि बेटा जिन बड़े सपनों को लेकर हिंदी फ़िल्मों की दुनिया में क़दम रखने के लिए बंबई की ट्रेन में सवार है, वो साकार हो पाएँगे.

(फिल्म वालों की सियासी पार्टी)

ये कई साल पहले शायद मार्च की ही एक दोपहर थी और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से एक्टिंग का कोर्स करके निकले संजय मिश्रा को बंबई तक छोड़ने के लिए मैं और उनका छोटा भाई और जनसत्ता में मेरे सहकर्मी सुमित मिश्रा उनके साथ ट्रेन में सवार थे.

और अब इतने बरसों बाद पिछले हफ़्ते बीबीसी के दिल्ली स्टूडियो में संजय मिश्रा एक बार फिर मेरे साथ बैठे थे – पर इस बार यारी दोस्ती में नहीं बल्कि इंटरव्यू देने के लिए. पूरी तरह सफ़ेद झक दाढ़ी, सफ़ेद बाल. ग्लैमर की दुनिया की कोई छाया तक नहीं.

मैं उनसे इसकी वजह पूछता हूँ और फिर मुझे याद आता है कि तमिल फ़िल्मों के सिरमौर रजनीकांत भी सिनेमा के बाहर कभी ग्लैमरस नहीं दिखते - कोई मेकअप नहीं, कोई विग नहीं और साधारण कपड़े.

('संस्कारी वैलेंटाइंस डे')

बनारसी ठाठ

संजय मिश्रा का अंदाज़ बदला नहीं है. वही पुराना बनारसी-बिहारी ठाठ, वही पुराना लहजा. पर अब उनका ये चेहरा अनजाना नहीं है. हाल ही में रिलीज़ हुई रजत कपूर की फ़िल्म 'आँखों देखी' जिन लोगों ने देखी हो वो उन्हें 'बाबूजी' के तौर पर तुरंत पहचान लेंगे.

'आँखों देखी' में संजय ने एक ऐसे अधेड़ उम्र के आदमी की भूमिका निभाई है जो सिर्फ़ उसी बात पर यक़ीन करता है जिसे वो देखता है. ये दार्शनिकता को छूती फ़िल्म है और आम तौर पर हिंदी में ऐसी फ़िल्में नहीं बनतीं.

संजय मिश्रा ने जिस ख़ूबी और संवेदनशीलता के साथ एक अधेड़ व्यक्ति के किरदार को निभाया है उसकी तारीफ़ फ़िल्म समीक्षकों ने खुले दिल से की है. लेकिन संजय मिश्र की पहचान सिर्फ़ 'आँखों देखी' के बाबूजी के तौर पर ही नहीं है.

मीरा रोड के मच्छर

'फँस गए रे ओबामा' जैसी हास्य फ़िल्म में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी. साथ ही टेलीविज़न के दर्शक उन्हें 'ऑफ़िस ऑफ़िस' जैसे सीरियल्स की वजह से भी जानते हैं.

(चरित्र अभिनेताओं का शहंशाह)

संजय कहते हैं, "पूरे नौ बरस तक फ़िल्म इंडस्ट्री ने मुझे एक्टर ही नहीं माना. हमारे यहाँ लोग रिस्क नहीं लेना चाहते. थोड़ा थोड़ा करके मैंने जगह बनाई और लोगों ने चांस देना शुरू किया."

पर शुरुआती दिन आसान नहीं थे. संजय, सुमित और मैं बंबई के बाहरी इलाक़े की एक मध्यवर्गीय बस्ती मीरारोड के एक फ़्लैट में रहते थे जहाँ पंखा नहीं लगा था और गर्मियों की रातें मच्छरों से संघर्ष करते हुए बीतती थीं.

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फिर भी सुबह-सुबह हम तीनों संजय की तस्वीरें और सिफ़ारिशी चिट्ठियाँ लेकर लोकल ट्रेन के ज़रिए फ़िल्म उद्योग के नामी गिरामी लोगों से मिलने निकल पड़ते थे और गए रात लौटते. बंबई हम सबके लिए एक अजनबी शहर था- एक अबूझ पहेली जैसा और हम सब फ़ुरसत में रहते थे.

उन दिनों हमारे साथ बंबई की सड़कों पर टहलने वालों में जनसत्ता अख़बार में उपसंपादक की नौकरी करने वाले संजय निरुपम भी थे. वो बाद में शिवसेना के अख़बार सामना में चले गए और वहाँ से राजनीति की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए शिवसेना के सांसद बने और अब काँग्रेस से सांसद हैं और इस बार भी काँग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं.

एप्पल सिंह

संजय मिश्रा की पहली पहचान तो बनी एप्पल सिंह से. इंग्लैंड में 1999 में हुए क्रिकेट विश्व कप के दौरान एप्पल सिंह मैच के बीच बीच में दर्शकों को अपनी गज्जब अँगरेज़ी से हँसा हँसा कर लोटपोट कर देता है.

(फिल्मी जगत के 'स्वार्थी' रिश्ते)

लेकिन उसके बाद फिर ख़ामोशी का एक लंबा अंतराल आया. संजय याद करते हैं कि एनएसडी जैसे संस्थान से एक्टिंग की ट्रेनिंग लेने के बावजूद कैमरे का सामना करना उनके लिए आसान नहीं रहा.

शुरुआती दिनों में उन्हें टेलीविज़न सीरियल चाणक्य में एक किरदार निभाने का मौक़ा मिला. कैमरे के सामने अपने पहले दिन के कड़वे अनुभव को वो अब तक नहीं भूल पाए हैं.

उन्होंने कहा, "चाणक्य की स्क्रिप्ट मैं एक महीने तक रोज़ाना तीन तीन बार पढ़ता था. जब मैं सेट पर गया तो सबकुछ बिलकुल ही उलटा निकला. मेरे जीवन का पहला टेक था जिसे मैंने 28 बार दिया."

स्थिति ऐसी हो गई कि डाइरेक्टर ने बाक़ी यूनिट का लंच ब्रेक करवा दिया और कहा कि एक एसिस्टेंट कैमरामैन के साथ संजय टेक देते रहें – अगर दे पाए तो.

संजय मिश्र उस दिन को याद करते हुए भावुक हो उठते हैं. उन्होंने कहा, "उस रात मैं बहुत रोया था. मैंने सोचा कि मैं हमेशा इसी लाइन में आना चाहता था और पहले ही दिन 28 टेक." पर उसके बाद से कभी ऐसा मौक़ा नहीं आया.

संजय कहते हैं उसके बाद मैंने हर मौक़े पर चौका लगाना शुरू कर दिया. और अब उन्होंने एक्टर के साथ साथ फ़िल्म निर्देशक के तौर पर भी अपना हाथ आज़माया है. संजय की फ़िल्म 'प्रणाम वालेकुम' बनकर तैयार है और उन्हीं की तरह हमें भी इसके रिलीज़ होने का इंतज़ार है.

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