सागरनामा 13: मैं, हम और आप की जंग में फंसे कार्टूनिस्ट

  • 3 अप्रैल 2014
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किसी तस्वीर के सारे पहलू न कभी देखे जा सके हैं, ना देखे जाएंगे. हर कोशिश में कि मुकम्मल तस्वीर दिख जाए, कुछ न कुछ छूट जाता है. ये आने वाली नस्लों पर होता है कि वे उसे नए सिरे से देखें, नए पहलू के साथ.

नया पहलू तलाश कर नया रंग भरना एक बार फिर हो रहा है, आम चुनाव के संदर्भ में. ये ज़िम्मा इस बार, दीगर लोगों के साथ, नए-पुराने व्यंग्यचित्रकारों ने उठाया है, जिन्हें पहले से इस काम में महारत हासिल रही है.

हालांकि उनकी राह आसान नहीं है, वे वक्री रेखाओं की डगर से हटने को तैयार नहीं हैं. बल्कि इस दफ़ा वे जोश में हैं और उनकी अचानक बाढ़ आ गई है.

(दलितों के लिए जारी है पानी पर पाबंदी)

अख़बारों में तो कार्टून छप ही रहे हैं, इंटरनेट पर भी भरमार है. इतने कार्टूनिस्ट देश ने एक साथ कभी नहीं देखे होंगे.

बेंगलुरु के चर्चित कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य की एक सप्ताह पहले प्रकाशित किताब के हवाले से कहें तो सब 'मैं', 'हम' और 'आप' के फेर में हैं.

उसी के इर्द-गिर्द. भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी 'मैं' हैं. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी 'हम' और 'आप' तो आप ही हैं-आम आदमी पार्टी यानी अरविंद केजरीवाल.

कार्टून नहीं प्रचार

समस्या की जड़ें इन्हीं तीन शब्दों में हैं, जिन्होंने पूरा एजेंडा बदल दिया. चर्चा के विषय उलट-पुलट दिए. तमाम बड़े दावे ताक़ पर हैं.

बहुत तामझाम से शुरू हुई बात कि इस बार चुनाव के मुद्दे विकास और भ्रष्टाचार होंगे, दोनों हाशिए पर चले गए. कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग कहते हैं कि इन शब्दों ने सारे मुद्दों को गौण बना दिया और व्यक्तित्व चुपके से खिसककर बहस के केंद्र में आ गए.

रही-सही कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी. अख़बार जो कर रहे थे, कर ही रहे थे. इंटरनेट उससे भी चार हाथ आगे चला गया.

ऐसे कार्टूनिस्ट आ गए जिनसे कार्टून बना तो बना, नहीं बना तो टेढ़ी-मेढ़ी चार लकीरों पर 'मैं', 'हम' या 'आप' की फ़ोटो चिपका दी. मक़सद कार्टून बनाना नहीं, अपनी बात कहना था.

व्यंग्य ग़ायब हो गया, उसकी जगह राजनीतिक नारों ने ले ली. यहाँ तक भी चल जाता लेकिन इसके बाद व्यंग्य के नाम पर अभद्र और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की जाने लगीं. सीधे हमले.

जोख़िम भरा काम

'मैं' पर टिप्पणी हुई तो 'आप' चढ़ बैठे. 'हम' ने कुछ कहा तो 'मैं' डंडा लेकर दौड़ पड़ा.

तैंलग का मानना है कि सोशल मीडिया पर जो हो रहा है उसमें से ज़्यादातर को कार्टून नहीं कचरा कहा जा सकता है. बकौल उनके, 'नेटवीरों' के इस द्वंद्व में राजनीति इस क़दर हावी है कि ईमानदारी से टिप्पणी करना ज़ोख़िम भरा काम हो गया है.

एक अन्य कार्टूनिस्ट इरफ़ान कहते हैं कि जब इंटरनेट पर कार्टूनिस्ट मोदी समर्थक नहीं हुए तो मोदी समर्थक कार्टूनिस्ट हो गए.

(चुनावी सूखे में केरल के रंग)

सोशल मीडिया इन कार्टूनों को देखता और पसंद करता है, शेयर भी करता है. इतना उनका मनोबल बढ़ाने के लिए काफ़ी होता है.

ग़नीमत होती अगर बात यहीं रुक जाती, लेकिन वो इससे आगे जाती है. प्रतिकूल टिप्पणियों पर अपशब्दों की बौछार और गाली-गलौज तक. वे इंटरनेट की आभासी दुनिया से निकलकर वास्तविक दुनिया में फ़ोन तक आ जाते हैं. क्या पता किसी दिन घर तक पहुँच जाएं.

इत्तेफ़ाक़

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Image caption इंटरनेट पर कार्टूनों की भरमार है.

कार्टूनिस्ट मंसूर नक़वी, तैलंग और इरफ़ान से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं और मानते हैं कि इंटरनेट के नब्बे प्रतिशत कार्टून, कार्टून नहीं प्रचार हैं, उन्हें लगता है कि चुनाव में, जब कार्टूनिस्टों को समाज और राजनीति को नए पहलू से देखना चाहिए था, उन्हें बेमतलब विवाद में उलझाया जा रहा है.

स्थितियाँ कठिन हैं पर ऐसा भी नहीं है कि पूरा कार्टून जगत विवाद में उलझा है और लट्ठमार ढंग से व्यक्ति केंद्रित हो गया है.

(रफ़्तार नहीं है लहर मोदी में)

बीच-बीच में, ख़ासकर अख़बारों में संवेदनशीलता के साथ भद्र तीखापन नज़र आता है तो आँखें उन पर ख़ुद-ब-ख़ुद ठहर जाती हैं.

मसलन सुरेंद्रन का 'द हिंदू' के कोच्चि संस्करण में छपा कार्टून, जो कहीं से व्यक्ति केंद्रित नहीं है. कार्टून में भाषण देकर मंच से उतरते नेताजी से उनका सेक्रेट्री कहता है, 'सर!, आपने बहुत घटिया भाषण दिया, मज़ा आ गया. अब चुनाव आयोग नोटिस जारी करेगा और हमारा मुफ़्त में प्रचार हो जाएगा.'

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