जसवंत की बगावत के बाद बाड़मेर में कमल खिलेगा?

जसवंत सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह (फाइल फोटो) इमेज कॉपीरइट AFP

रेगिस्तानी इलाकों में रेत के बबूले उठना आम बात है और रेत के धोरों का रातों-रात जगह बदलना भी. पर देश के सबसे बड़े संसदीय क्षेत्र बाड़मेर की राजनीति में जो भँवर इस बार आया है वो अपनी तरह का पहला है.

राजनीतिक जीवन की संध्या में अपना 'आखिरी चुनाव' लड़ने को घर लौटे वरिष्ठ नेता 76 वर्षीय जसवंत सिंह के लिए तो यह अपनी जड़ों से जुड़ने का पहला और आखिरी मौका है. बाड़मेर में इस बार त्रिकोणीय संघर्ष है जिसमें उनका मुख्य मुकाबला कुछ ही दिनों पहले कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए जाट नेता कर्नल सोना राम से है.

('कांग्रेस की परछाई')

यह भी एक विचित्र संयोग ही है कि जसवंत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र सिंह ने भी अपना पहला चुनाव 1999 में कर्नल सोना राम के ख़िलाफ़ ही लड़ा था, हालांकि तब मानवेन्द्र जीत नहीं पाए थे. वैसे पांच साल बाद दो लाख से अधिक मतों से जीत दर्ज कर मानवेन्द्र ने इस सरहदी लोकसभा सीट पर पहली बार भाजपा का परचम लहरा दिया था.

अब माहौल कुछ और है. जसवंत सिंह भाजपा से निष्कासन के बाद स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं तो जीवन भर कांग्रेस में रहे कर्नल अब भाजपा में. कांग्रेस की तरफ़ से वर्तमान सांसद हरीश चौधरी प्रत्याशी बनाए गए हैं.

'जातिगत प्रतिष्ठा'

इमेज कॉपीरइट AP

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए भी यह प्रतिष्ठा की लड़ाई है और वो कर्नल सोनाराम की जीत सुनिश्चित करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही हैं. भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए बाड़मेर में आगामी 12 अप्रैल को पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की सभा भी आयोजित की गई है.

(जसवंत सिंह भाजपा से निष्कासित)

वैसे जसवंत सिंह इस चुनाव को 'जातिगत प्रतिष्ठा' का सवाल नहीं मानते और न ही ये उनके लिए जाट और राजपूत के बीच का संघर्ष है. उनका कहना है, "मैंने अपने राजनीतिक जीवन में कभी जाति आधारित राजनीति नहीं की." हालांकि उनके मन में इसे लेकर बड़ी पीड़ा है कि जो कभी 'पराए' थे अब वो 'अपने' हो गए और जो 'अपने' थे वो 'पराए'.

जिस पार्टी में इतना लम्बा सफ़र तय किया उसमें किसी और के अपना बन जाने और ख़ुद के बेगाना बन जाने का उन्हें बहुत दर्द है. बीबीसी से बातचीत में भाजपा से निकाले जाने पर अपनी कसक और भावना उन्होंने यूँ बयां की, "मैं बैरी सुग्रीव पियारा, अवगुन कौन नाथ मोहि मारा?"

वो यह भी स्वीकार करते हैं कि पार्टी के कांग्रेस से आए व्यक्ति को टिकट देने से बाड़मेर की जनता का अपमान हुआ है. इस संसदीय क्षेत्र के बहुत से लोग भी इस बात से सहमत हैं.

मतदाताओं की सहानुभूति

इमेज कॉपीरइट AP

बाड़मेर शहर में एक चश्मे की दुकान के मालिक गिरीश कुमार सोनी कहते हैं, "जनता का रुझान जसवंत सिंह जी की तरफ़ है. इतने 'सीनियर लीडर को लास्ट प्वॉयंट पर किक आउट' करके भाजपा ने ठीक नहीं किया. मतदाताओं की सहानुभूति जसवंत सिंह जी के साथ है और अभी कोई चुनावी मुद्दा नहीं बल्कि उनकी प्रतिष्ठा की बात ही मुख्य है."

(जसवंत की बगावत)

इस शहर में एक गन्ने के रस की दुकान चलाने वाले कुम्हार चंद का भी यही मानना है, "निर्दलीय प्रत्याशी ही आगे हैं. उनका ही माहौल है. और कोई मुद्दा फ़िलहाल नहीं है."

बाड़मेर में टैक्सी चलाने वाले किशनराम देवासी का कहना है, "वो जातिवाद के आधार पर वोट नहीं देंगे. वो आदमी और काम देखते हैं, पार्टी नहीं. इसलिए जसवंत सिंह को वोट देंगे. उन्होंने विकास के काम किए हैं और अब भी करेंगे."

वैसे इस सरहदी रेगिस्तानी प्रदेश का विकास सभी चाहते हैं चाहे वो महाबार पीथल गाँव की अनपढ़ महिला हो या गुड़ीसर की पारु. बच्चों के पढ़ने को स्कूल, बिजली और पानी, की कमी हर किसी को खलती है. मोहनलाल जीनगर मनिहारी का ठेला लगाते हैं और उन्हें नेताओं के झूठे वादों पर कोई ऐतबार नहीं.

मरू प्रदेश की आवाज़

'छोटी-मोटी दुकान' चलाने वाले नारायण जोशी को सरहद के नज़दीक होने की वजह से क्षेत्र की सुरक्षा की भी चिंता है तो पानी और शिक्षा की कमी भी इन्हें बहुत सालती है. स्वयं जसवंत सिंह का मन भी मरुभूमि की प्यास बुझाने का है पर अभी तक यह 'अधूरा सपना' ही है.

('बागी' जसवंत सिंह ने दाखिल किया पर्चा)

इसके अलावा बाड़मेर की राजस्थान की राजधानी जयपुर से बढ़ती दूरी भी उन्हें बहुत नागवार लगती है. वो पूछते हैं, "न केवल भौगोलिक बल्कि वैचारिक, व्यावहारिक, बोलचाल सब कुछ निरंतर दूर होता जा रहा है. जब छोटे-छोटे नए प्रदेश बनाए जा रहे हैं तो मरू प्रदेश की आवाज़ क्यों नहीं सुनी जाए."

पिछला चुनाव देश के पश्चिमी छोर दार्जीलिंग से जीतने वाले जसवंत सिंह पूरब के अपने रेगिस्तानी अंचल में मिल रहे मान-सम्मान, स्नेह-समर्थन से अभिभूत हैं. वैसे वे इसे अपना सौभाग्य मानते हैं कि चाहे चित्तौड़ हो या जोधपुर या दार्जीलिंग, लोगों ने उन्हें अपार स्नेह दिया है.

उधर भाजपा में भी कर्नल सोना राम को टिकट दिए जाने की वजह से कार्यकर्ताओं में ज्यादा ख़ुशी नहीं है. हालांकि पार्टी अनुशासन से बंधे हुए कोई भी खुलकर अपनी नाराज़गी का इज़हार नहीं करता.

'जातिवाद' की राजनीति

Image caption जसवंत सिंह के चुनाव प्रचार की कमान उनकी पुत्रवधु चित्रा सिंह के हाथ में है.

एक स्थानीय कार्यकर्ता ने नाम न बताने की शर्त के साथ कहा कि यह दरअसल जसवंत सिंह और सोना राम के बीच की नहीं बल्कि असली और नकली भाजपा के बीच की लड़ाई है. कुछ और लोग कहते हैं, "कर्नल सोना राम ने सदा जातिवाद की राजनीति की है और उन्हें समूचे बाड़मेर के विकास का नहीं बल्कि अपने बायतु क्षेत्र का ही अधिक ख्याल रहता है."

('आरएसएस भर रहा भाजपा में कूड़ा')

यह भी कहा जा रहा है कि कर्नल सोना राम के आक्रामक तेवरों से दुखी कांग्रेस उनके पाला बदल लेने से राहत की सांस ले रही है. जब मुक़ाबला वाकई असली और नकली भाजपा के बीच दिखाई दे रहा है तो विधान सभा के नतीजों से निराश कांग्रेस अभी भी कोई ख़ास उत्साह के मूड में नहीं है.

पार्टी समर्थक मुकेश माहेश्वरी कहते हैं कि पार्टी कार्यकर्ताओं को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी का इंतज़ार है. यदि उनकी एक बड़ी रैली हो जाए तो निराश कार्यकर्ता सक्रिय हो सकते हैं. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे कर्नल सोना राम को जिताने के लिए पूरी एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं.

जसवंत सिंह के चुनाव प्रचार की कमान संभाल रही उनकी पुत्रवधू चित्रा सिंह का कहना है कि राजपूत नेताओं पर भाजपा की तरफ़ से बहुत दवाब डाला जा रहा है कि वे उनके ससुर का साथ न दें. छोटे-बड़े सभी कार्यकर्ताओं को भी बार-बार चेतावनी दी जा रही है.

धरती पुत्र

भौगोलिक दृष्टिकोण से देश के सबसे बड़े संसदीय निर्वाचन क्षेत्र बाड़मेर संसदीय क्षेत्र में आठ विधान सभा क्षेत्र हैं जिसमे एक जैसलमेर ज़िले का भी है.

चूँकि मानवेन्द्र सिंह वर्तमान में बाड़मेर के ही शिव विधान सभा क्षेत्र से भाजपा विधायक हैं और आधिकारिक रूप से अपने पिता के चुनाव प्रचार में हिस्सा नहीं ले सकते, चित्रा सिंह पूरी मेहनत और समर्पण से अपने ससुर की जीत पक्की करने में लगी है.

(संघ को आँख दिखाकर बच पाते जसंवत?)

उनके मुताबिक, "सिंह को मुस्लिम मतदाताओं का भी पूरा समर्थन मिल रहा है और अन्य जातियों का भी. उनका कहना है "लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं और सब समुदाय के लोग हमारे साथ हैं."

जो लोग अमल (अफीम) के शौक़ीन हैं वो अपने नए सांसद से डोडा पोस्त का सरकारी कोटा बढ़ाने की उम्मीद भी करते हैं. बाड़मेर में 'रियाण' की संस्कृति भी है और कर्नल सोना राम ने जनता की इसी नब्ज़ को पकड़ते हुए अपनी एक सभा में मुख्यमंत्री से डोडा पोस्त की समस्या का ज़िक्र किया और आग्रह किया कि सरकारी कोटा बढ़ाया जाए.

कर्नल सोना राम और जसवंत सिंह दोनों ही बाड़मेर के धरती पुत्र हैं और इत्तेफ़ाकन दोनों पूर्व फौजी भी. दोनों के लिए ही यह चुनाव एक नई पहचान का सवाल भी है. कुल मिलाकर बाड़मेर पर पूरे राजस्थान की निगाहें हैं कि इस दिलचस्प त्रिकोणीय संघर्ष में उलझी सीट पर ऊँट किस करवट बैठेगा?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार